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6 साल से गुरु द्रोण बन गांव की बेटियों को निशुल्क कुश्ती का दे रहे प्रशिक्षण
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Haresh kushti coach
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गुरु द्रोण बन हरीश गांव की बेटियों को पिछले 10 साल से कुश्ती का निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। आज गांव बड़ौता की पहचान पहलवान बेटियों के नाम पर है इसका श्रेय हरीक्ष उर्फ ऋषिपाल पुनिया को ही जाता है। जिस गांव में कभी स्कूल के बाद बेटियां चूल्हे चौके तक सिमट जाती थीं, आज वहां की लड़कियां कुश्ती में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन कर रही हैं। हरीश ने ही गांव की बेटियों को एक नई राह दिखाई।
हरीश खुद भी नेशनल स्तर पर गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। कुश्ती का अभ्यास करते करते उन्हें लगा कि वह गांव के लिए कुश्ती के बेहतर खिलाड़ी तैयार कर सकते हैं तो 2009 में गांव के पास ही थोड़ी जी जगह में कुश्ती का अखाड़ा खोला और गांव के पांच सात लड़कों और लड़कों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। लेकिन धीरे धीरे कारवां बढ़ा और बढ़ता ही गया। आज उनके पास करीब 60 से 70 आस पास के 10 गांवों से लड़के और लड़कियां प्रशिक्षण लेने आते हैं। वर्ष 2009 में शुरू हुई इस मुहिम ने बेटियों का जीवन ही बदल दिया। राष्ट्रीय स्तर पर 25 से अधिक मेडल यहां की लड़कियों ने जीते। अखाड़े की अन्नु और सुजाता तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अखाड़े की मिट्टी का दम दिखा चुकी हैं। सुजाता 2016 में एशियन चैंपियनशिप फिलीपींस में सिल्वर और सिंगापुर में गोल्ड जीत चुकी है। वहीं अन्नु भी 2016 में ऑल इंडिया इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में पार्टिसिपेट कर चुकी है।
सबसे पहले गांव की अन्नु ने की कुश्ती की शुरुआत
हरीश बताते हैं कि अखाड़ा खुलने के बाद 2010 में सबसे पहले गांव की बेटी अन्नु कुश्ती के दांव पेच सीखने के लिए आई। बेटियों को अखाड़े में देख लोगों ने कहा कि बेटियां और अखाड़े में? कोच व लड़कियों का भी मजाक उड़ाया गया। लेकिन कोच हरीश उर्फ ऋषिपाल पुनिया ने हार नहीं मानी। एक साल की उनकी और लड़कियों की कड़ी मेहनत रंग लाई और बेटियों ने जिलास्तर, स्टेट स्तर व नेशनल स्तर पर मेडल जीतने शुरू कर दिये। आज गांव के ही नहीं आस पास के गांवों से भी लड़कियां हरीश के पास कुश्ती की बारीकियां सीखने के लिए आती हैं।
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सृष्टि ने लगातार जीते 6 नेशनल गोल्ड
हरीश बताते हैं कि उनके अखाड़े की पहलवान सृष्टि ने लगातार नेशनल स्तर पर 6 गोल्ड मेडल जीते हैं। 7 गोल्ड जीतने पर खिलाड़ी भीम अवार्ड के लिए आवेदन कर सकता है। बिहार में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेने गई सृष्टि की तबियत खराब हो गई और वहा इस प्रतियोगिता में गोल्ड नहीं जीत सकी। सृष्टि एक पायदान से इस अवार्ड से चुक गई। उन्हाेंने बताया कि 10 सालों में उन्होंने अब तक अपने निजी कार्यों के लिए 10 छुट्टियां ही ली होंगी। खिलाड़ियों के अखाड़े में पहुंचने से पहले ही हरीश वहां पर पहुंच जाते हैं। वह खिलाड़ियों को सुबह और शाम तीन तीन घंटे अभ्यास करवाते हैं।
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हरीश खुद भी नेशनल स्तर पर गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। कुश्ती का अभ्यास करते करते उन्हें लगा कि वह गांव के लिए कुश्ती के बेहतर खिलाड़ी तैयार कर सकते हैं तो 2009 में गांव के पास ही थोड़ी जी जगह में कुश्ती का अखाड़ा खोला और गांव के पांच सात लड़कों और लड़कों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। लेकिन धीरे धीरे कारवां बढ़ा और बढ़ता ही गया। आज उनके पास करीब 60 से 70 आस पास के 10 गांवों से लड़के और लड़कियां प्रशिक्षण लेने आते हैं। वर्ष 2009 में शुरू हुई इस मुहिम ने बेटियों का जीवन ही बदल दिया। राष्ट्रीय स्तर पर 25 से अधिक मेडल यहां की लड़कियों ने जीते। अखाड़े की अन्नु और सुजाता तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अखाड़े की मिट्टी का दम दिखा चुकी हैं। सुजाता 2016 में एशियन चैंपियनशिप फिलीपींस में सिल्वर और सिंगापुर में गोल्ड जीत चुकी है। वहीं अन्नु भी 2016 में ऑल इंडिया इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में पार्टिसिपेट कर चुकी है।
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सबसे पहले गांव की अन्नु ने की कुश्ती की शुरुआत
हरीश बताते हैं कि अखाड़ा खुलने के बाद 2010 में सबसे पहले गांव की बेटी अन्नु कुश्ती के दांव पेच सीखने के लिए आई। बेटियों को अखाड़े में देख लोगों ने कहा कि बेटियां और अखाड़े में? कोच व लड़कियों का भी मजाक उड़ाया गया। लेकिन कोच हरीश उर्फ ऋषिपाल पुनिया ने हार नहीं मानी। एक साल की उनकी और लड़कियों की कड़ी मेहनत रंग लाई और बेटियों ने जिलास्तर, स्टेट स्तर व नेशनल स्तर पर मेडल जीतने शुरू कर दिये। आज गांव के ही नहीं आस पास के गांवों से भी लड़कियां हरीश के पास कुश्ती की बारीकियां सीखने के लिए आती हैं।
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सृष्टि ने लगातार जीते 6 नेशनल गोल्ड
हरीश बताते हैं कि उनके अखाड़े की पहलवान सृष्टि ने लगातार नेशनल स्तर पर 6 गोल्ड मेडल जीते हैं। 7 गोल्ड जीतने पर खिलाड़ी भीम अवार्ड के लिए आवेदन कर सकता है। बिहार में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेने गई सृष्टि की तबियत खराब हो गई और वहा इस प्रतियोगिता में गोल्ड नहीं जीत सकी। सृष्टि एक पायदान से इस अवार्ड से चुक गई। उन्हाेंने बताया कि 10 सालों में उन्होंने अब तक अपने निजी कार्यों के लिए 10 छुट्टियां ही ली होंगी। खिलाड़ियों के अखाड़े में पहुंचने से पहले ही हरीश वहां पर पहुंच जाते हैं। वह खिलाड़ियों को सुबह और शाम तीन तीन घंटे अभ्यास करवाते हैं।