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Karnal News: पाक के पूर्व पीएम की कोठी बनी शिक्षा का मंदिर
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गगन तलवार
करनाल। भारत से अलग हुए पाकिस्तान को पहला प्रधानमंत्री देने वाला करनाल शहर कई ऐतिहासिक एवं पौराणिक तथ्य समेटे हुए है। पाक के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का परिवार भले ही देश के विभाजन के बाद यहां नहीं आया हो, लेकिन यहां के लोग उनका प्यार आज भी संजोये हुए हैं। इन्हीं में से एक वह इमारत है, जिसमें आज दयाल सिंह कॉलेज चल रहा है।
खान परिवार के नवाब इस हवेली से ही समाज हित में कार्य करते थे। दयाल सिंह कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. रामजी लाल के अनुसार, कॉलेज की जिस इमारत में पुस्तकालय चल रहा है। एक जमाने में लियाकत अली खान के भाई नवाबजादा श्योकत अली का यहां दरबार सजता था। ‘’उम्र मंजिल’’ कहलाने वाले इस भवन में वे सभी के हितों में फैसले सुनाया करते थे। समाज को नई दिशा देने का काम आज भी उस जगह से बदस्तूर जारी है।
इस पुस्तकालय में विभिन्न विषयों, इतिहास समेत 50 हजार से ज्यादा किताबें हैं। जिनसे यहां पढ़ने वाली युवा पीढ़ी के भविष्य की नींव मजबूत हो रही है। इसके अलावा यहां लिखी कुरान की आयतें सभी को नेक नियत और इबारत का संदेश देती है। उर्दू में लिखी यह आयतें भले ही नई पीढ़ी को समझ में न आएं, लेकिन पुस्तकालय की दीवारों पर अंकित ये उर्दू के अक्षर उन्हें कुछ होने का आभास जरूर कराते हैं।
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करनाल। भारत से अलग हुए पाकिस्तान को पहला प्रधानमंत्री देने वाला करनाल शहर कई ऐतिहासिक एवं पौराणिक तथ्य समेटे हुए है। पाक के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का परिवार भले ही देश के विभाजन के बाद यहां नहीं आया हो, लेकिन यहां के लोग उनका प्यार आज भी संजोये हुए हैं। इन्हीं में से एक वह इमारत है, जिसमें आज दयाल सिंह कॉलेज चल रहा है।
खान परिवार के नवाब इस हवेली से ही समाज हित में कार्य करते थे। दयाल सिंह कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. रामजी लाल के अनुसार, कॉलेज की जिस इमारत में पुस्तकालय चल रहा है। एक जमाने में लियाकत अली खान के भाई नवाबजादा श्योकत अली का यहां दरबार सजता था। ‘’उम्र मंजिल’’ कहलाने वाले इस भवन में वे सभी के हितों में फैसले सुनाया करते थे। समाज को नई दिशा देने का काम आज भी उस जगह से बदस्तूर जारी है।
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इस पुस्तकालय में विभिन्न विषयों, इतिहास समेत 50 हजार से ज्यादा किताबें हैं। जिनसे यहां पढ़ने वाली युवा पीढ़ी के भविष्य की नींव मजबूत हो रही है। इसके अलावा यहां लिखी कुरान की आयतें सभी को नेक नियत और इबारत का संदेश देती है। उर्दू में लिखी यह आयतें भले ही नई पीढ़ी को समझ में न आएं, लेकिन पुस्तकालय की दीवारों पर अंकित ये उर्दू के अक्षर उन्हें कुछ होने का आभास जरूर कराते हैं।
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