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Karnal News: महाराष्ट्र के इंजीनियरों ने सीखी एसएसडी की डिजाइनिंग
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1007 सीएसएसआरआई में एसएसडी प्रणाली की बारीकियां सीखते महाराष्ट्र के इंजीनियर। संवाद
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) में उपसतही जल निकास प्रणाली (एसएसडी) का प्रशिक्षण लेने पहुंचे महाराष्ट्र के सिंचाई अनुसंधान और विकास निदेशालय के तकनीकी अधिकारियों ने दूसरे दिन प्रणाली की बारीकियों को समझा। वैज्ञानिकों ने बताया कि ये प्रणाली जलभराव वाली जमीन के प्रबंधन के सर्वोत्तम साबित हो रही है।
प्रशिक्षण के दूसरे दिन तकनीकी अधिकारियों (इंजीनियरों) को एसएसडी प्रणाली की डिजाइनिंग की जानकारी दी गई। विभागाध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. सत्येंद्र कुमार ने बताया गया कि प्रणाली एक विशेष डिजाइन पर निर्भर हैं। जिसके जरिये ऐसी भूमि जहां लंबे समय तक जलभराव रहा है, भूमिगत जलस्तर ऊपर तक आ गया है। सतह पर पानी के कारण जमीन से हवा निकल जाती हैं, जिससे पौधा अपना भोजन तैयार नहीं कर पाता है, इस कारण फसल की पैदावार बंद हो जाती है, इस प्रणाली के जरिए उप सतह में पाइप डालकर वहां पाइप और जमीन में मिला नमक बाहर निकाल दिया जाता है। इस लवणीय पानी को किसी नदी या नाले में डाल दिया जाता है और संबंधित जमीन पर फसल की पैदावार होने लगती है। प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. डीएस. बुंदेला ने महाराष्ट्र राज्य में उप-सतही जल निकासी प्रौद्योगिकी को कैसे सफल किया जा सकता है, इसके तरीके समझाए। वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. सागर विभूते, वरिष्ठ वैज्ञानिक भास्कर नर्जरी व अन्य वैज्ञानिक ने भी जानकारी दी।
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करनाल। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) में उपसतही जल निकास प्रणाली (एसएसडी) का प्रशिक्षण लेने पहुंचे महाराष्ट्र के सिंचाई अनुसंधान और विकास निदेशालय के तकनीकी अधिकारियों ने दूसरे दिन प्रणाली की बारीकियों को समझा। वैज्ञानिकों ने बताया कि ये प्रणाली जलभराव वाली जमीन के प्रबंधन के सर्वोत्तम साबित हो रही है।
प्रशिक्षण के दूसरे दिन तकनीकी अधिकारियों (इंजीनियरों) को एसएसडी प्रणाली की डिजाइनिंग की जानकारी दी गई। विभागाध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. सत्येंद्र कुमार ने बताया गया कि प्रणाली एक विशेष डिजाइन पर निर्भर हैं। जिसके जरिये ऐसी भूमि जहां लंबे समय तक जलभराव रहा है, भूमिगत जलस्तर ऊपर तक आ गया है। सतह पर पानी के कारण जमीन से हवा निकल जाती हैं, जिससे पौधा अपना भोजन तैयार नहीं कर पाता है, इस कारण फसल की पैदावार बंद हो जाती है, इस प्रणाली के जरिए उप सतह में पाइप डालकर वहां पाइप और जमीन में मिला नमक बाहर निकाल दिया जाता है। इस लवणीय पानी को किसी नदी या नाले में डाल दिया जाता है और संबंधित जमीन पर फसल की पैदावार होने लगती है। प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. डीएस. बुंदेला ने महाराष्ट्र राज्य में उप-सतही जल निकासी प्रौद्योगिकी को कैसे सफल किया जा सकता है, इसके तरीके समझाए। वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. सागर विभूते, वरिष्ठ वैज्ञानिक भास्कर नर्जरी व अन्य वैज्ञानिक ने भी जानकारी दी।
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