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हाथ पैर बेजान, दिव्यांगों के लिए आयुषी है मिसाल
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हारता वो नहीं जो गिर जाता है, बल्कि हारता वो है जो गिरकर उठता नहीं। इन पंक्तियों को चरितार्थ किया है घरौंडा की रहने वाली आयुषी ठकराल ने। दिव्यांग बच्चों को कमजोर समझने वालों के लिये भी आयुषी एक मिसाल है। आवश्यकता है कि दिव्यांगजनों को कमजोर नहीं बल्कि उनकी प्रतिभाओं को समझ कर उन्हें आगे बढ़ने में उनकी मदद करें।
आयुषी बताती हैं कि जब वह पैदा हुईं तो उनके हाथ और पैर शरीर के साथ पूरी तरह से चिपके हुए थे। सात साल तक टांगों पर पट्टी बंधी रही। शरीर की आठ सर्जरी हुई। तब जाकर शरीर से हाथ और पैर अलग हुए, लेकिन उन्हें व्हील चेयर का सहारा लेना पड़ा। चलने फिरने और खाने पीने में असमर्थ आयुषी ने तैराकी को जीवन का मुकाम बनाया। 2017 में उन्होंने जब तैराकी का ट्रायल मधुबन में दिया तो उन्हें 102 डिग्री बुखार था। बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कड़ी मेहनत की तो चार माह बाद ही राजस्थान के उदयपुर में आयोजित नेशनल तैराकी चैंपियनशिप में दो गोल्ड मेडल अपने नाम किये। उसके बाद आयुषी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और हर वर्ष मेडल की संख्या बढ़ती गयी। वह अब तक राज्यस्तर पर चार गोल्ड जीत चुकी हैं। करीब 12 वर्षीय आयुषी डीएवी स्कूल मधुबन में पढ़ाई करती हैं।
बेटी का हर कदम पर दिया साथ
घरौंडा के अनिल ठकराल और पत्नी मुस्कान ने भी अपनी बेटी आयुषी के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिये हर कदम पर उसका साथ दिया। बेटी को तैराकी के अभ्यास के लिये कर्ण स्टेडियम या फिर मधुबन आना पड़ता था। उन्हें लाने और ले जाने की जिम्मेदारी माता मुस्कान के कंधों पर थी। वह 20 किलोमीटर स्कूटी चलाकर बेटी को तैराकी का प्रशिक्षण दिलाने के लिये साथ आती थीं। फिलहाल कोरोना वायरस संक्रमण के चलते तैराकी प्रशिक्षण पूरी तरह से बंद है तो बेटी को घर पर शारीरिक फिटनेस करवा रही हैं।
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बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ की है ब्रांड एम्बेसडर
पिता अनिल ठकराल ने बताया कि जब बेटी ने राजस्थान में गोल्ड मेडल जीता था तो विधायक हरविंद्र कल्याण ने उसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ को ब्रांड एम्बेसडर नियुक्त किया था। यहीं नहीं शहर की कई सामाजिक संस्थाएं भी आयुषी को उसकी बहादुरी के लिये सम्मानित कर चुकी हैं। पिता ने बताया कि यह सब कर्ण स्टेडियम के तैराकी कोच कंवलजीत संधू और रविंद्र संधू के मार्गदर्शन से संभव हो पाया है।
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आयुषी बताती हैं कि जब वह पैदा हुईं तो उनके हाथ और पैर शरीर के साथ पूरी तरह से चिपके हुए थे। सात साल तक टांगों पर पट्टी बंधी रही। शरीर की आठ सर्जरी हुई। तब जाकर शरीर से हाथ और पैर अलग हुए, लेकिन उन्हें व्हील चेयर का सहारा लेना पड़ा। चलने फिरने और खाने पीने में असमर्थ आयुषी ने तैराकी को जीवन का मुकाम बनाया। 2017 में उन्होंने जब तैराकी का ट्रायल मधुबन में दिया तो उन्हें 102 डिग्री बुखार था। बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कड़ी मेहनत की तो चार माह बाद ही राजस्थान के उदयपुर में आयोजित नेशनल तैराकी चैंपियनशिप में दो गोल्ड मेडल अपने नाम किये। उसके बाद आयुषी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और हर वर्ष मेडल की संख्या बढ़ती गयी। वह अब तक राज्यस्तर पर चार गोल्ड जीत चुकी हैं। करीब 12 वर्षीय आयुषी डीएवी स्कूल मधुबन में पढ़ाई करती हैं।
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बेटी का हर कदम पर दिया साथ
घरौंडा के अनिल ठकराल और पत्नी मुस्कान ने भी अपनी बेटी आयुषी के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिये हर कदम पर उसका साथ दिया। बेटी को तैराकी के अभ्यास के लिये कर्ण स्टेडियम या फिर मधुबन आना पड़ता था। उन्हें लाने और ले जाने की जिम्मेदारी माता मुस्कान के कंधों पर थी। वह 20 किलोमीटर स्कूटी चलाकर बेटी को तैराकी का प्रशिक्षण दिलाने के लिये साथ आती थीं। फिलहाल कोरोना वायरस संक्रमण के चलते तैराकी प्रशिक्षण पूरी तरह से बंद है तो बेटी को घर पर शारीरिक फिटनेस करवा रही हैं।
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बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ की है ब्रांड एम्बेसडर
पिता अनिल ठकराल ने बताया कि जब बेटी ने राजस्थान में गोल्ड मेडल जीता था तो विधायक हरविंद्र कल्याण ने उसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ को ब्रांड एम्बेसडर नियुक्त किया था। यहीं नहीं शहर की कई सामाजिक संस्थाएं भी आयुषी को उसकी बहादुरी के लिये सम्मानित कर चुकी हैं। पिता ने बताया कि यह सब कर्ण स्टेडियम के तैराकी कोच कंवलजीत संधू और रविंद्र संधू के मार्गदर्शन से संभव हो पाया है।