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Karnal News: फर्जी दस्तावेजों के जरिये जमीन हड़पने का प्रयास
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कोर्ट के आदेश पर मामला दर्ज
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। इंद्री क्षेत्र में एक तीन दशक पुराने भूमि विवाद ने गंभीर रूप ले लिया है। इसमें फर्जी दस्तावेजों और जाति परिवर्तन के जरिये जमीन हड़पने के प्रयास का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता ने गांव काछवा के पिता और बेटे पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने साजिश के तहत न केवल फर्जी दस्तावेज तैयार किए बल्कि उन्हें अदालत में असली बताकर खुद को असल भूमि स्वामी का वारिस भी घोषित कर दिया। अब अदालत ने थाना इंद्री को मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया, जिसके बाद पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
शिकायतकर्ता अशोक के अनुसार उन्हें वर्ष 1992 में राम दिव्या समेत अन्य लोगों से पावर ऑफ अटॉर्नी प्राप्त हुई थी और 1993 में उन्होंने विधिवत बिक्री वासिका के माध्यम से जमीन का सौदा कर लिया था। वहीं, आरोपियों का दावा है कि उनके दादा राम दिव्या की मृत्यु 1975 में हो चुकी थी। जिससे पावर ऑफ अटॉर्नी को फर्जी करार देने की कोशिश की गई। हालांकि वर्ष 2018 में कोर्ट ने यह दावा खारिज कर अशोक कुमार के पक्ष में फैसला सुनाया था।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने खुद को दूसरी जाति का बताते हुए दूसरी जाति के असल भू मालिक का वारिस दिखाने की कोशिश की है। तहसील कार्यालय से मांगी गई जानकारी में स्पष्ट हुआ कि राम दिव्या भाटिया जाति से थे, जिससे आरोपियों का कोई संबंध नहीं बनता। यह भी सामने आया है कि वर्ष 2005-06 में बदर और इंतकाल से भूमि पर कब्जा करने का प्रयास किया जा चुका है। इसे तहसीलदार ने 2010 में निरस्त कर दिया था। इस बार जब उन्होंने बदर के जरिए फिर से फर्जी एंट्री करवा ली तो अशोक कुमार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
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माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। इंद्री क्षेत्र में एक तीन दशक पुराने भूमि विवाद ने गंभीर रूप ले लिया है। इसमें फर्जी दस्तावेजों और जाति परिवर्तन के जरिये जमीन हड़पने के प्रयास का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता ने गांव काछवा के पिता और बेटे पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने साजिश के तहत न केवल फर्जी दस्तावेज तैयार किए बल्कि उन्हें अदालत में असली बताकर खुद को असल भूमि स्वामी का वारिस भी घोषित कर दिया। अब अदालत ने थाना इंद्री को मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया, जिसके बाद पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
शिकायतकर्ता अशोक के अनुसार उन्हें वर्ष 1992 में राम दिव्या समेत अन्य लोगों से पावर ऑफ अटॉर्नी प्राप्त हुई थी और 1993 में उन्होंने विधिवत बिक्री वासिका के माध्यम से जमीन का सौदा कर लिया था। वहीं, आरोपियों का दावा है कि उनके दादा राम दिव्या की मृत्यु 1975 में हो चुकी थी। जिससे पावर ऑफ अटॉर्नी को फर्जी करार देने की कोशिश की गई। हालांकि वर्ष 2018 में कोर्ट ने यह दावा खारिज कर अशोक कुमार के पक्ष में फैसला सुनाया था।
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शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने खुद को दूसरी जाति का बताते हुए दूसरी जाति के असल भू मालिक का वारिस दिखाने की कोशिश की है। तहसील कार्यालय से मांगी गई जानकारी में स्पष्ट हुआ कि राम दिव्या भाटिया जाति से थे, जिससे आरोपियों का कोई संबंध नहीं बनता। यह भी सामने आया है कि वर्ष 2005-06 में बदर और इंतकाल से भूमि पर कब्जा करने का प्रयास किया जा चुका है। इसे तहसीलदार ने 2010 में निरस्त कर दिया था। इस बार जब उन्होंने बदर के जरिए फिर से फर्जी एंट्री करवा ली तो अशोक कुमार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
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