कलायत। पितृपक्ष के अवसर पर श्री कपिल मुनि मंदिर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ हुआ। कथा से पहले श्रीमद्भागवत की नगर फेरी और कलश यात्रा निकाली गई। वृंदावन से पहुंचे कथा व्यास आचार्य बसंत जी महाराज ने श्रद्धालुओं को भक्ति और भागवत कथा के महत्व से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि भक्ति की व्याख्या नहीं की जा सकती, व्याख्या ज्ञान की होती है। भागवत का स्मरण ही जीवन का सार है। जब जीव कर्मकांड और योग मार्ग की कठिनाइयों से ऊब जाता है तो भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करता है। भगवान की कृपा से भक्ति का सहज मार्ग खुल जाता है।
कथा के प्रथम दिन आचार्य ने श्रीमद्भागवत की उत्पत्ति का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत सबसे पहले भगवान नारायण के पास थी। इसके बाद ब्रह्मा, नारद मुनि और वेदव्यास के माध्यम से यह ग्रंथ आगे पहुंचा। वेदव्यास ने चार श्लोकों को विस्तार देते हुए 18 हजार श्लोकों में श्रीमद्भागवत की रचना की और इसे अपने पुत्र सुखदेव को प्रदान किया। सुखदेव ने राजा परीक्षित को कथा सुनाई। आचार्य ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा परमात्मा का अक्षर स्वरूप है। पितृपक्ष में कथा श्रवण का विशेष महत्व माना गया है। कथा मनुष्य को भय से मुक्त कर मुक्ति का मार्ग दिखाती है। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।

श्रीमद्भागवत पुराण की नगर परिक्रमा लगवाते आयोजक व कथा व्यास। संवाद

श्रीमद्भागवत पुराण की नगर परिक्रमा लगवाते आयोजक व कथा व्यास। संवाद

श्रीमद्भागवत पुराण की नगर परिक्रमा लगवाते आयोजक व कथा व्यास। संवाद