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झूठे केस बनाकर जबरन जेलों में डाला, आज तक नहीं भरे जख्म
ब्यूरो/अमर उजाला/कैथ्ाल
Updated Wed, 20 Jan 2016 10:56 PM IST
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सरकार ने इमरजेंसी के दौरान जेल जाने वाले लोगों को सम्मानित करने का फैसला लिया है। आपातकाल के दौरान जेल गए लोगों और उनके परिजनों ने सरकार के इस निर्णय पर खुशी जताई है। मालूम हो कि 26 जनवरी को इन लोगों को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया जाएगा।
कैथल में ऐसे 28 लोग हैं जिनमें से कुछ का देहांत हो चुका है। उस समय जिले से 43 लोग जेल गए थे लेकिन इनमें से 28 लोगों को ही सम्मानित किया जाएगा। जिनके नाम सूची में शामिल नहीं हैं, उनके परिजनों ने रोष जताया है।
जो लोग जिंदा है उन्होंने इमरजेंसी को जबरन थोपा गया फैसला बताया। इन लोगों का कहना है कि उस समय आपातकाल के दौरान लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा। झूठे केस बनाकर जेलों में डाला गया, उस समय के जख्म आज तक नहीं भरे हैं।
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इमरजेंसी के दौरान जिले से करीब 43 लोग जेल गए थे लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उस समय जेल जाने वाले व्यक्ति और उसकी पत्नी में यदि दोनों की मौत हो चुकी है तो उन्हें यह सम्मान नहीं दिया जा रहा। ऐसे में जिले में 28 लोगों को 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में ताम्रपत्र दिया जाएबा।
मैं उस समय करीब 43 साल का था। इमरजेंसी में लोगों को जबरन जेलों में डाला जा रहा था। जबरन नसबंदी करवाई जा रही थी। मेरी दुकान के सामने ही सिपाही एक गांव के 50 वर्षीय बुजुर्ग को जबरन जीप में डालने का प्रयास कर रहे थे, जिसे किसी ने नहीं बचाया। इस दौरान जीप की कील से उस बुजुर्ग के पांव से खून भी बहने लगा। मैंने पुलिस कर्मियों से उसे छुड़वाकर उसको उपचार देने की कोशिश की। इसके बाद मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में कैथल थाना सिटी में बनाई गई कच्ची जेल में रखा गया। करीब तीन माह तक जेल में रहने के कारण मेरे 16 साल के बेटे को कपड़े की दुकान संभालनी पड़ी। परिवार को काफी तकलीफें हुई थीं। अब यदि सरकार ने याद किया है तो अच्छी बात है।
नरंजन दास, कपड़ा विक्रेता, पुरानी अनाज मंडी, कैथल।
मैं उस समय 31 साल का था। उस समय हमारे ऊपर झूठा मामला बनाया गया था जिसमें सीएम के खिलाफ नारेबाजी का आरोप लगाया गया था। हम उस समय दर्पण समाचार पत्र जरूर बांटते थे लेकिन किसी प्रकार की अनर्गल बयानबाजी नहीं करते थे। सरकार ने झूठा केस बनाया था। मुझे दुकान से उठाकर छात्रावास के निकट सीएम के खिलाफ नारे लगाते हुए दिखाया गया था। झूठे गवाह बनाए गए थे। गिरफ्तारी के बाद थाना शहर में बनाए गई जेल में रखा गया। कुछ को अंबाला भेज दिया गया। करीब तीन माह यहां जेल में बिताए। उस समय मैं कपड़े सिलाई का काम करता था। अचानक जेल चले जाने के कारण परिवार को परेशानियों का सामना करना पड़ा। अब पता लगा है सरकार जेल जाने वालों को ताम्रपत्र देगी। अच्छी बात है।
माई लाल सैनी, प्रधान, ग्यारह रुद्री शिव मंदिर, कैथल।
मैं उस समय 23 साल का था। उस समय मैं रोहतक मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की इंटर्नशिप कर रहा था। 25 व 26 जून की रात को इमरजेंसी लगी। उस समय मैंने इमरजेंसी के खिलाफ लड़ाई के लिए अपना कैरियर छोड़कर आरएसएस में बतौर प्रचारक काम करने का फैसला लिया। मुझे रोहतक शहर में सत्याग्रह की जिम्मेदारी दी गई। मैंने लोगों के साथ मिलकर रोहतक में कई बार सत्याग्रह के लिए जत्थे निकले। इसके बाद 23 जनवरी, 1976 में मैंने भी सत्याग्रह किया। मुझे डिफेंस ऑफ इंडिया रूल के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद मैं रोहतक जेल में रहा। उस समय जेल में कई राजनीतिक बंदियों से मुलाकात हुई। जेल में भी राष्ट्रवादी विचारधारा की मुहीम जारी रखी। जेल से रिहा होने पर मुझे पांच जिलों सोनीपत, रोहतक, महेंद्रगढ़, गुड़गांव और फरीदाबाद में इमरजेंसी के विरोध में अंडरग्राउंड गतिविधियां चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी। मेरे पिता चमन लाल सर्राफ को कैथल में जेल में रखा गया था।
डॉ. अशोक कुमार गर्ग, संपादक, शुभ्र ज्योत्सना ग्रंथ, हरियाणा सरकार।
उस समय सही थी पीड़ा, अब सम्मान न मिलना और भी पीड़ादायक
मैं उस समय 11वीं कक्षा में था। मेरे बड़े भाई बीए द्वितीय वर्ष में थे। घर में कोई कमाने वाला नहीं था। पिता जी के जेल में जाने के कारण परिवार सड़क पर आ गया था। डर के कारण पड़ोसी और घनिष्ठ लोगों ने भी मिलने-जुलने से किनारा कर लिया था। मैं माता जी के साथ करनाल जेल में पिता जी से मिलने के लिए बस में जाता था। उस समय हालात ऐसे हो गए थे कि इस पीड़ादायक समय से निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। न ही कोई उम्मीद ही बची थी। इस समय जब पिता जी के साथ जेल जाने वालों को सम्मान मिल रहा है, ऐसे में पिता जी के बलिदान की अनदेखी उससे भी ज्यादा पीड़ादायक है। यह अनदेखी वही लोग कर रहे हैं, जिन्हें उस समय पिता जी ने एक तरह से उंगली पकड़ कर चलना सिखाया था। सरकार को चाहिए कि उन सभी महापुरुषों को सम्मान दें, जो उस समय जेल गए थे। वे या उनकी पत्नी जीवित हैं या नहीं। इस बात के बजाय उस समय के जेल जाने वाले सभी को सम्मान मिलना चाहिए।
हरेश वशिष्ठ, वरिष्ठ पत्रकार एवं पुत्र स्व. प्रो. दामोदर वशिष्ठ, आरकेएसडी कॉलेज कैथल।
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कैथल में ऐसे 28 लोग हैं जिनमें से कुछ का देहांत हो चुका है। उस समय जिले से 43 लोग जेल गए थे लेकिन इनमें से 28 लोगों को ही सम्मानित किया जाएगा। जिनके नाम सूची में शामिल नहीं हैं, उनके परिजनों ने रोष जताया है।
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जो लोग जिंदा है उन्होंने इमरजेंसी को जबरन थोपा गया फैसला बताया। इन लोगों का कहना है कि उस समय आपातकाल के दौरान लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा। झूठे केस बनाकर जेलों में डाला गया, उस समय के जख्म आज तक नहीं भरे हैं।
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इमरजेंसी के दौरान जिले से करीब 43 लोग जेल गए थे लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उस समय जेल जाने वाले व्यक्ति और उसकी पत्नी में यदि दोनों की मौत हो चुकी है तो उन्हें यह सम्मान नहीं दिया जा रहा। ऐसे में जिले में 28 लोगों को 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में ताम्रपत्र दिया जाएबा।
मैं उस समय करीब 43 साल का था। इमरजेंसी में लोगों को जबरन जेलों में डाला जा रहा था। जबरन नसबंदी करवाई जा रही थी। मेरी दुकान के सामने ही सिपाही एक गांव के 50 वर्षीय बुजुर्ग को जबरन जीप में डालने का प्रयास कर रहे थे, जिसे किसी ने नहीं बचाया। इस दौरान जीप की कील से उस बुजुर्ग के पांव से खून भी बहने लगा। मैंने पुलिस कर्मियों से उसे छुड़वाकर उसको उपचार देने की कोशिश की। इसके बाद मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में कैथल थाना सिटी में बनाई गई कच्ची जेल में रखा गया। करीब तीन माह तक जेल में रहने के कारण मेरे 16 साल के बेटे को कपड़े की दुकान संभालनी पड़ी। परिवार को काफी तकलीफें हुई थीं। अब यदि सरकार ने याद किया है तो अच्छी बात है।
नरंजन दास, कपड़ा विक्रेता, पुरानी अनाज मंडी, कैथल।
मैं उस समय 31 साल का था। उस समय हमारे ऊपर झूठा मामला बनाया गया था जिसमें सीएम के खिलाफ नारेबाजी का आरोप लगाया गया था। हम उस समय दर्पण समाचार पत्र जरूर बांटते थे लेकिन किसी प्रकार की अनर्गल बयानबाजी नहीं करते थे। सरकार ने झूठा केस बनाया था। मुझे दुकान से उठाकर छात्रावास के निकट सीएम के खिलाफ नारे लगाते हुए दिखाया गया था। झूठे गवाह बनाए गए थे। गिरफ्तारी के बाद थाना शहर में बनाए गई जेल में रखा गया। कुछ को अंबाला भेज दिया गया। करीब तीन माह यहां जेल में बिताए। उस समय मैं कपड़े सिलाई का काम करता था। अचानक जेल चले जाने के कारण परिवार को परेशानियों का सामना करना पड़ा। अब पता लगा है सरकार जेल जाने वालों को ताम्रपत्र देगी। अच्छी बात है।
माई लाल सैनी, प्रधान, ग्यारह रुद्री शिव मंदिर, कैथल।
मैं उस समय 23 साल का था। उस समय मैं रोहतक मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की इंटर्नशिप कर रहा था। 25 व 26 जून की रात को इमरजेंसी लगी। उस समय मैंने इमरजेंसी के खिलाफ लड़ाई के लिए अपना कैरियर छोड़कर आरएसएस में बतौर प्रचारक काम करने का फैसला लिया। मुझे रोहतक शहर में सत्याग्रह की जिम्मेदारी दी गई। मैंने लोगों के साथ मिलकर रोहतक में कई बार सत्याग्रह के लिए जत्थे निकले। इसके बाद 23 जनवरी, 1976 में मैंने भी सत्याग्रह किया। मुझे डिफेंस ऑफ इंडिया रूल के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद मैं रोहतक जेल में रहा। उस समय जेल में कई राजनीतिक बंदियों से मुलाकात हुई। जेल में भी राष्ट्रवादी विचारधारा की मुहीम जारी रखी। जेल से रिहा होने पर मुझे पांच जिलों सोनीपत, रोहतक, महेंद्रगढ़, गुड़गांव और फरीदाबाद में इमरजेंसी के विरोध में अंडरग्राउंड गतिविधियां चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी। मेरे पिता चमन लाल सर्राफ को कैथल में जेल में रखा गया था।
डॉ. अशोक कुमार गर्ग, संपादक, शुभ्र ज्योत्सना ग्रंथ, हरियाणा सरकार।
उस समय सही थी पीड़ा, अब सम्मान न मिलना और भी पीड़ादायक
मैं उस समय 11वीं कक्षा में था। मेरे बड़े भाई बीए द्वितीय वर्ष में थे। घर में कोई कमाने वाला नहीं था। पिता जी के जेल में जाने के कारण परिवार सड़क पर आ गया था। डर के कारण पड़ोसी और घनिष्ठ लोगों ने भी मिलने-जुलने से किनारा कर लिया था। मैं माता जी के साथ करनाल जेल में पिता जी से मिलने के लिए बस में जाता था। उस समय हालात ऐसे हो गए थे कि इस पीड़ादायक समय से निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। न ही कोई उम्मीद ही बची थी। इस समय जब पिता जी के साथ जेल जाने वालों को सम्मान मिल रहा है, ऐसे में पिता जी के बलिदान की अनदेखी उससे भी ज्यादा पीड़ादायक है। यह अनदेखी वही लोग कर रहे हैं, जिन्हें उस समय पिता जी ने एक तरह से उंगली पकड़ कर चलना सिखाया था। सरकार को चाहिए कि उन सभी महापुरुषों को सम्मान दें, जो उस समय जेल गए थे। वे या उनकी पत्नी जीवित हैं या नहीं। इस बात के बजाय उस समय के जेल जाने वाले सभी को सम्मान मिलना चाहिए।
हरेश वशिष्ठ, वरिष्ठ पत्रकार एवं पुत्र स्व. प्रो. दामोदर वशिष्ठ, आरकेएसडी कॉलेज कैथल।