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13 साल में सूर्यकुंड मंदिर की तस्वीर बदलने वाले महंत कोरोना संक्रमित होकर ब्रह्मलीन
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mahant dies
- फोटो : Kaithal
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13 साल में माता गेट स्थित डेरा बाबा परमहंसपुरी माता मंदिर सूर्यकुंड कैथल की तस्वीर बदलने वाले महंत राजेश्वपुरी बुधवार को कोरोना संक्रमित होने के चलते ब्रह्मलीन हो गए। जिससे मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं को गहरा आघात पहुंचा है। जिला प्रशासन से विशेष अनुमति के बाद महंत राजेश्वरपुरी जी महाराज को समाधीलीन किया गया। जिसमें हरिद्वार, बनारस, जयपुर सहित कई शहरों से संतों ने भाग लिया।
रोहतक से आए महंत मछेंद्रपुरी महाराज ने बताया कि वर्ष 2007 में महंत राजेश्वरपुरी महाराज कैथल में सूर्यकुंड मंदिर आए थे। पिछले कुछ समय से वे बीमार थे। रोहतक पीजीआई में उन्होंने शरीर का त्याग किया और कोरोना महामारी के कारण प्रशासनिक निर्देशानुसार सीमित संख्या में पहुंचे संतों की मौजूदगी में उन्हें समाधि देने की प्रक्रिया पूरी की गई है। महंत राजेश्वरपुरी ने अपने कार्यों से संत समाज का गौरव बढ़ाया है। वे इससे पूर्व बिहार के लालगंज में रहे। वहां इसी तरह एक भव्य स्थान बनाकर आए। वहां वे 23 साल तक शहर के मेयर रहे। इसके बाद वे यहां आए थे। वे वीतराग त्यागी थे। जो केवल एक कपड़े में रहते थे। उनका जाना अपूर्णनीय क्षति है।
सेवादार मास्टर रामपाल, सुरेंद्र अरोड़ा, सतपाल गुप्ता सहित मंदिर से जुड़े श्याम बंसल ने कहा कि महंत राजेश्वरपुरी जी महाराज ने सूर्यकुंड मंदिर जो उपेक्षा का शिकार था, उसे स्वर्ग बना दिया। कई-कई फुट गहरे पड़े तालाब का जीर्णोद्धार करवाया। एक तालाब को पाट कर भव्य वाटिका बनाई है। जिसमें हजारों की संख्या में पेड़-पौधे हैं। मा. रामपाल ने बताया कि महंत बायोलॉजी में एमएससी थे। जिस कारण प्रकृति से गहरा लगाव था। यहां वाटिका, सभी मंदिरों का जीर्णोद्धार करने के साथ-साथ अब वे पक्षी विहार बना रहे थे। लेकिन कोरोना संकट के चलते यह अधूरा रह गया। मंदिर में हमेशा भोजन, दूध, चाय श्रद्धालुओं के लिए अनवरत सेवा के तौर पर जारी रखना, गाय की सेवा, पशु-पक्षियों की सेवा, यहां ठहरने के लिए अत्याधुनिक सुध सुविधाओं से लैस कमरे, मेलों में श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाएं जुटाने की बात हो या फिर चारों ओर भव्य संगमरामर के पत्थरों, रंग बिरंगी लाइटों से सुसज्जित डेरा, सब उनकी देन है। वे मूल रुप से नैनीताल के रहने वाले बताए गए हैं।
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28 को हुए थे कोरोना पॉजिटिव: सेवादार रामपाल ने बताया कि महंत जी 28 अगस्त को कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। इसके बाद उन्हें कैथल जिला अस्पताल, फिर अग्रोहा अस्पताल, फिर दिल्ली के मेदांता अस्पताल और वहां से पीजीआई रोहतक में दाखिल करवाया गया। जहां बुधवार सुबह के समय उन्होंने शरीर का त्याग किया। इसके बाद कैथल जिला प्रशासन से विशेष अनुमति लेकर समाधि की प्रक्रिया पूरी करवाई गई।
महंत के समाधि प्रक्रिया में रोहतक व जूना अखाड़ा से मछेंद्रपुरी महाराज, जयपुर से श्रीमहंत हीरापुरी जी, बनारस से उमाशंकर भारती सभापति, हिसार से मोहन भारती सचिव महंत, सचिव शैलेंद्रगिरी शामली से धीरज गिरी, हरिद्वार से महेश पुरी श्रीमहंत, जुलाना से शिवानंद, रोहतक से कर्णपुरी जी, कमलपुरी श्रीमहंत, महंत महेशगिरी, महंत निरंजनपुरी, महंत रामहरिदास सहित काफी गणमान्य संतों ने नमन किया।
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रोहतक से आए महंत मछेंद्रपुरी महाराज ने बताया कि वर्ष 2007 में महंत राजेश्वरपुरी महाराज कैथल में सूर्यकुंड मंदिर आए थे। पिछले कुछ समय से वे बीमार थे। रोहतक पीजीआई में उन्होंने शरीर का त्याग किया और कोरोना महामारी के कारण प्रशासनिक निर्देशानुसार सीमित संख्या में पहुंचे संतों की मौजूदगी में उन्हें समाधि देने की प्रक्रिया पूरी की गई है। महंत राजेश्वरपुरी ने अपने कार्यों से संत समाज का गौरव बढ़ाया है। वे इससे पूर्व बिहार के लालगंज में रहे। वहां इसी तरह एक भव्य स्थान बनाकर आए। वहां वे 23 साल तक शहर के मेयर रहे। इसके बाद वे यहां आए थे। वे वीतराग त्यागी थे। जो केवल एक कपड़े में रहते थे। उनका जाना अपूर्णनीय क्षति है।
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सेवादार मास्टर रामपाल, सुरेंद्र अरोड़ा, सतपाल गुप्ता सहित मंदिर से जुड़े श्याम बंसल ने कहा कि महंत राजेश्वरपुरी जी महाराज ने सूर्यकुंड मंदिर जो उपेक्षा का शिकार था, उसे स्वर्ग बना दिया। कई-कई फुट गहरे पड़े तालाब का जीर्णोद्धार करवाया। एक तालाब को पाट कर भव्य वाटिका बनाई है। जिसमें हजारों की संख्या में पेड़-पौधे हैं। मा. रामपाल ने बताया कि महंत बायोलॉजी में एमएससी थे। जिस कारण प्रकृति से गहरा लगाव था। यहां वाटिका, सभी मंदिरों का जीर्णोद्धार करने के साथ-साथ अब वे पक्षी विहार बना रहे थे। लेकिन कोरोना संकट के चलते यह अधूरा रह गया। मंदिर में हमेशा भोजन, दूध, चाय श्रद्धालुओं के लिए अनवरत सेवा के तौर पर जारी रखना, गाय की सेवा, पशु-पक्षियों की सेवा, यहां ठहरने के लिए अत्याधुनिक सुध सुविधाओं से लैस कमरे, मेलों में श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाएं जुटाने की बात हो या फिर चारों ओर भव्य संगमरामर के पत्थरों, रंग बिरंगी लाइटों से सुसज्जित डेरा, सब उनकी देन है। वे मूल रुप से नैनीताल के रहने वाले बताए गए हैं।
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28 को हुए थे कोरोना पॉजिटिव: सेवादार रामपाल ने बताया कि महंत जी 28 अगस्त को कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। इसके बाद उन्हें कैथल जिला अस्पताल, फिर अग्रोहा अस्पताल, फिर दिल्ली के मेदांता अस्पताल और वहां से पीजीआई रोहतक में दाखिल करवाया गया। जहां बुधवार सुबह के समय उन्होंने शरीर का त्याग किया। इसके बाद कैथल जिला प्रशासन से विशेष अनुमति लेकर समाधि की प्रक्रिया पूरी करवाई गई।
महंत के समाधि प्रक्रिया में रोहतक व जूना अखाड़ा से मछेंद्रपुरी महाराज, जयपुर से श्रीमहंत हीरापुरी जी, बनारस से उमाशंकर भारती सभापति, हिसार से मोहन भारती सचिव महंत, सचिव शैलेंद्रगिरी शामली से धीरज गिरी, हरिद्वार से महेश पुरी श्रीमहंत, जुलाना से शिवानंद, रोहतक से कर्णपुरी जी, कमलपुरी श्रीमहंत, महंत महेशगिरी, महंत निरंजनपुरी, महंत रामहरिदास सहित काफी गणमान्य संतों ने नमन किया।