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मानसून रूठा, सूखे की चपेट में कैथल
नसीब सैनी/अमर उजाला, कैथ्ाल
Updated Tue, 22 Jul 2014 12:35 AM IST
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मानसून की बेरुखी के कारण जिला सूखे की चपेट में आ गया है। खेतों में बैठे किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं, वहीं पानी न मिलने के कारण मजबूरी में किसान अब धान को उखाड़ने लगे हैं। अब तक जिले में सिर्फ 35 एमएम बरसात हुई है।
कैथल ब्लॉक में सबसे खतरनाक स्थिति
जुलाई में हुई बारिश में कैथल, कलायत एवं गुहला-चीका में से कैथल ब्लॉक में सबसे खतरनाक स्थिति है। जुलाई माह में अब तक कैथल में 17 एमएम, गुहला में 46 व कलायत में 42 एमएम बरसात हुई है।
औसतन 35 एमएम बरसात के कारण जिले में सूखे की स्थिति बन गई है। पिछले साल जुलाई महीने में कैथल ब्लॉक में 47, गुहला में 70 व कलायत में 53 एमएम बरसात दर्ज की गई थी। जो इस बार काफी कम हुई है।
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वर्ष 2013 में जून में कैथल में 111, गुहला में 92 व कलायत में 142 एमएम बरसात हुई थी। जबकि इस वर्ष जून भी लगभग सूखा बीत गया।
जून में कैथल में 41, गुहला में 41 तो कलायत में केवल 13 एमएम बरसात दर्ज की गई है।
रोहेड़ियां गांव के किसान रामकुमार ने बताया कि वे जमीन ठेके पर लेकर खेती करते हैं।
बरसात न होने के कारण उन्होंने 10 एकड़ में रोपे गए धान की सिंचाई बंद कर दी है। ताकि शेष धान को बचा सकें।
उन्होंने कहा कि बरसात नहीं हुई तो शेष धान को भी बचा पाना मुश्किल हो जाएगा।
धान का रकबा प्रभावित होगा
बरसात न होने के कारण इस बार धान का उत्पादन क्षेत्र प्रभावित होगा। विशेष रूप से कैथल ब्लॉक, राजौंद व कुछ इलाका कलायत ब्लॉक का पूरी तरह से सूखा रह सकता है।
डेढ़ लाख हेक्टेयर से ज्यादा धान के रकबे में से करीब 20 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। जिसका असर अनाज मंडी में आने वाली धान की मात्रा, यहां काम करने वाले लाखों मजदूरों के रोजगार एवं इसके बाद धान से चावल बनाने के लिए लगे राईस मिलों एवं चावल निर्यात उद्योग में लगे लाखों लोगों का रोजगार प्रभावित हो सकता है।
जुलाई के बचे दिनों में बारिश की संभावनाएं कम
मौसम विशेषज्ञ डॉ. चंद्रशेखर डागर का कहना है कि जुलाई में 22 व 23 जुलाई को कुछ संभावनाएं थीं, लेकिन अब ये भी कम रह गई हैं। अब कुछ योग 26 व 27 को बनता नजर आ रहा है, लेकिन निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। जुलाई में बरसात नहीं हुई तो धान की रोपाई का समय भी निकल जाएगा।
एक बार सिंचाई के लिए चाहिए 70 एमएम पानी
विशेषज्ञों के अनुसार धान की फसल में एक बार सिंचाई के लिए 70 एमएम बरसात की जरूरत होती है। पूरे सीजन में कई बार धान में ऐसी सिंचाई करनी पड़ती है। अब जब बरसात ही महज 35 एमएम दर्ज हुई है तो ट्यूबवेल एवं नहरों की सहायता से कैसे धान की फसल पक पाएगी, यह चिंता किसानों को खाए जा रही है।
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कैथल ब्लॉक में सबसे खतरनाक स्थिति
जुलाई में हुई बारिश में कैथल, कलायत एवं गुहला-चीका में से कैथल ब्लॉक में सबसे खतरनाक स्थिति है। जुलाई माह में अब तक कैथल में 17 एमएम, गुहला में 46 व कलायत में 42 एमएम बरसात हुई है।
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औसतन 35 एमएम बरसात के कारण जिले में सूखे की स्थिति बन गई है। पिछले साल जुलाई महीने में कैथल ब्लॉक में 47, गुहला में 70 व कलायत में 53 एमएम बरसात दर्ज की गई थी। जो इस बार काफी कम हुई है।
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वर्ष 2013 में जून में कैथल में 111, गुहला में 92 व कलायत में 142 एमएम बरसात हुई थी। जबकि इस वर्ष जून भी लगभग सूखा बीत गया।
जून में कैथल में 41, गुहला में 41 तो कलायत में केवल 13 एमएम बरसात दर्ज की गई है।
रोहेड़ियां गांव के किसान रामकुमार ने बताया कि वे जमीन ठेके पर लेकर खेती करते हैं।
बरसात न होने के कारण उन्होंने 10 एकड़ में रोपे गए धान की सिंचाई बंद कर दी है। ताकि शेष धान को बचा सकें।
उन्होंने कहा कि बरसात नहीं हुई तो शेष धान को भी बचा पाना मुश्किल हो जाएगा।
धान का रकबा प्रभावित होगा
बरसात न होने के कारण इस बार धान का उत्पादन क्षेत्र प्रभावित होगा। विशेष रूप से कैथल ब्लॉक, राजौंद व कुछ इलाका कलायत ब्लॉक का पूरी तरह से सूखा रह सकता है।
डेढ़ लाख हेक्टेयर से ज्यादा धान के रकबे में से करीब 20 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। जिसका असर अनाज मंडी में आने वाली धान की मात्रा, यहां काम करने वाले लाखों मजदूरों के रोजगार एवं इसके बाद धान से चावल बनाने के लिए लगे राईस मिलों एवं चावल निर्यात उद्योग में लगे लाखों लोगों का रोजगार प्रभावित हो सकता है।
जुलाई के बचे दिनों में बारिश की संभावनाएं कम
मौसम विशेषज्ञ डॉ. चंद्रशेखर डागर का कहना है कि जुलाई में 22 व 23 जुलाई को कुछ संभावनाएं थीं, लेकिन अब ये भी कम रह गई हैं। अब कुछ योग 26 व 27 को बनता नजर आ रहा है, लेकिन निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। जुलाई में बरसात नहीं हुई तो धान की रोपाई का समय भी निकल जाएगा।
एक बार सिंचाई के लिए चाहिए 70 एमएम पानी
विशेषज्ञों के अनुसार धान की फसल में एक बार सिंचाई के लिए 70 एमएम बरसात की जरूरत होती है। पूरे सीजन में कई बार धान में ऐसी सिंचाई करनी पड़ती है। अब जब बरसात ही महज 35 एमएम दर्ज हुई है तो ट्यूबवेल एवं नहरों की सहायता से कैसे धान की फसल पक पाएगी, यह चिंता किसानों को खाए जा रही है।