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हैप्पी और सुपर सीडर से करें फसल प्रबंधन
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कैथल। प्योदा रोड स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में शुक्रवार को पराली प्रबंधन पर अमर उजाला किसान चौपाल जागरुकता शिविर का आयोजन किया गया। इसमें मुख्य वक्ता कृषि विज्ञान केंद्र के मुख्य समन्यवक रमेश चंद्र ने किसानों को जीरो टिल ड्रिल, हैप्पी सीडर, सुपर सीडर से फसल प्रबंधन की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इनसे किसान पराली प्रबंधन कर सकते हैं। इससे जहां समय व पैसे की बचत होती है, वहीं पैदावार भी अच्छी होती है।
उन्होंने बताया कि फसल अवशेष जलाने से पर्यावरण खराब होता है। जमीन में मौजूद लाभदायक पोषक तत्व भी नष्ट हो जाते हैं। जमीन की उपजाऊ शक्ति खत्म हो रही है। किसानों से आह्वान किया कि फसल अवशेष को काट कर खेत में ही मिलाएं। आधुनिक कृषि यंत्रों से किसान आसानी से धान कटाई के बाद खड़े फसल अवशेष में सीधे अगली फसल की बिजाई कर सकते हैं। ये कृषि यंत्र सरकार की ओर से अनुदान पर दिए जा रहे हैं।
किसान रघुबीर लांबा खेड़ी ने बताया कि वह हर वर्ष धान की छह एकड़ से ज्यादा फसल की रोपाई करता है। वह पिछले करीब चार साल से फसल अवशेष नहीं जला रहे हैं। जिसका नतीजा यह है कि इससे जमीन की उर्वरता शक्ति कम नहीं होती है। यदि हम अपने खेतों में पराली जलाएंगे तो जमीन की उर्वरता शक्ति कम होगी।
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किसान सुरजीत सिंह ने बताया कि खेतों में फसल अवशेष जलाने पर जमीन के उपजाऊपन पर विपरीत असर पड़ता है। फसल अवशेष कभी भी नहीं जलाना चाहिए। वह खेत में चार साल से धान के फसल अवशेष नहीं जला रहा है। दो कट्टे खाद के खेत में कम डालने पड़ते हैं।
किसान साधु राम ने बताया कि वह अपने खेतों में मशीनों के माध्यम से फसल का अवशेष प्रबंधन करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम अपने खेतों में धान के अवशेषों को जलाएंगे तो पर्यावरण प्रदूषण होगा। यदि फसल अवशेष को न जलाकर बेलर मशीन के माध्यम से पराली की गांठें बनाकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
किसान वजीर सिंह ने बताया कि हमें फसल अवशेषों का सदुपयोग करना चाहिए। किसान धान की पराली के अवशेषों को जलाने की बजाय उसका कंपोस्ट खाद बनाने से लेकर गत्ता बनाने में प्रयोग कर सकते हैं। इससे आमदनी के साथ जलाने पर पर्यावरण प्रदूषित होने वाली समस्या भी दूर होगी।
किसान अजित ने बताया कि तीन साल पहले तक वह फसल अवशेष जला रहा था। इससे उसकी खेत की उर्वरता शक्ति कमजोर होनी शुरू हो गई तो उसने निर्णय लिया है कि आगे से कभी भी खेत में फसल अवशेष नहीं जलाएगा। अवशेष नहीं जलाने से 10 क्विंटल फसल ज्यादा हो रही है।
किसान राकेश कुमार ने बताया कि पिछले पांच सालों से फसल अवशेष नहीं जला रहा है। इससे उसके खेत की मिट्टी में सुधार हुआ है। पानी की खपत भी कम हो रही है। पराली का खाद के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। ससे उसको खेत में यूरिया डालने की जरूरत नहीं पड़ती है। जमीन की पैदावार भी बढ़ रही है।
किसान भीखू राम ने बताया कि वह छह सालों से फसल अवशेष नहीं जला रहा है। इस कारण लागत के अनुसार उसकी हर बार फसल निकल रही है। पेस्टीसाइड का भी कम प्रयोग करना पड़ता है।
किसान खुशी राम ने बताया कि वह आग लगाकर अपनी ही जमीन को बंजर बना रहे थे। अब इस समस्या से निजात मिलना शुरू हो गई है। सात-आठ साल पहले तक किसानों की समस्या थी कि उनके पास इस समस्या से बचने के विकल्प नहीं है, लेकिन पिछले आठ वर्ष में हुए शोधों व नए कृषि उपकरणों का इस्तेमाल कर अवशेष जलाने से बचाने शुरू किए हैं।
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उन्होंने बताया कि फसल अवशेष जलाने से पर्यावरण खराब होता है। जमीन में मौजूद लाभदायक पोषक तत्व भी नष्ट हो जाते हैं। जमीन की उपजाऊ शक्ति खत्म हो रही है। किसानों से आह्वान किया कि फसल अवशेष को काट कर खेत में ही मिलाएं। आधुनिक कृषि यंत्रों से किसान आसानी से धान कटाई के बाद खड़े फसल अवशेष में सीधे अगली फसल की बिजाई कर सकते हैं। ये कृषि यंत्र सरकार की ओर से अनुदान पर दिए जा रहे हैं।
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किसान रघुबीर लांबा खेड़ी ने बताया कि वह हर वर्ष धान की छह एकड़ से ज्यादा फसल की रोपाई करता है। वह पिछले करीब चार साल से फसल अवशेष नहीं जला रहे हैं। जिसका नतीजा यह है कि इससे जमीन की उर्वरता शक्ति कम नहीं होती है। यदि हम अपने खेतों में पराली जलाएंगे तो जमीन की उर्वरता शक्ति कम होगी।
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किसान सुरजीत सिंह ने बताया कि खेतों में फसल अवशेष जलाने पर जमीन के उपजाऊपन पर विपरीत असर पड़ता है। फसल अवशेष कभी भी नहीं जलाना चाहिए। वह खेत में चार साल से धान के फसल अवशेष नहीं जला रहा है। दो कट्टे खाद के खेत में कम डालने पड़ते हैं।
किसान साधु राम ने बताया कि वह अपने खेतों में मशीनों के माध्यम से फसल का अवशेष प्रबंधन करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम अपने खेतों में धान के अवशेषों को जलाएंगे तो पर्यावरण प्रदूषण होगा। यदि फसल अवशेष को न जलाकर बेलर मशीन के माध्यम से पराली की गांठें बनाकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
किसान वजीर सिंह ने बताया कि हमें फसल अवशेषों का सदुपयोग करना चाहिए। किसान धान की पराली के अवशेषों को जलाने की बजाय उसका कंपोस्ट खाद बनाने से लेकर गत्ता बनाने में प्रयोग कर सकते हैं। इससे आमदनी के साथ जलाने पर पर्यावरण प्रदूषित होने वाली समस्या भी दूर होगी।
किसान अजित ने बताया कि तीन साल पहले तक वह फसल अवशेष जला रहा था। इससे उसकी खेत की उर्वरता शक्ति कमजोर होनी शुरू हो गई तो उसने निर्णय लिया है कि आगे से कभी भी खेत में फसल अवशेष नहीं जलाएगा। अवशेष नहीं जलाने से 10 क्विंटल फसल ज्यादा हो रही है।
किसान राकेश कुमार ने बताया कि पिछले पांच सालों से फसल अवशेष नहीं जला रहा है। इससे उसके खेत की मिट्टी में सुधार हुआ है। पानी की खपत भी कम हो रही है। पराली का खाद के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। ससे उसको खेत में यूरिया डालने की जरूरत नहीं पड़ती है। जमीन की पैदावार भी बढ़ रही है।
किसान भीखू राम ने बताया कि वह छह सालों से फसल अवशेष नहीं जला रहा है। इस कारण लागत के अनुसार उसकी हर बार फसल निकल रही है। पेस्टीसाइड का भी कम प्रयोग करना पड़ता है।
किसान खुशी राम ने बताया कि वह आग लगाकर अपनी ही जमीन को बंजर बना रहे थे। अब इस समस्या से निजात मिलना शुरू हो गई है। सात-आठ साल पहले तक किसानों की समस्या थी कि उनके पास इस समस्या से बचने के विकल्प नहीं है, लेकिन पिछले आठ वर्ष में हुए शोधों व नए कृषि उपकरणों का इस्तेमाल कर अवशेष जलाने से बचाने शुरू किए हैं।