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कैथल: फल्गु तीर्थ में श्रद्धालुओं ने किया तर्पण व स्नान
Tue, 21 Feb 2023 01:51 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Tue, 21 Feb 2023 01:51 AM IST
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पूंडरी। ऐतिहासिक महातीर्थ फल्गु में सोमवार को दूर-दराज से पहुंचे सैंकड़ों श्रद्धालुओं ने अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए पिडंदान तर्पण करवाकर स्नान किया। इस मौके पर फल्गु तीर्थ कमेटी ने तीर्थ स्थल पर श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारा भी लगाया। इसमें श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
गौरतलब है कि फल्गु तीर्थ का उल्लेख महाभारत, वामन पुराण, मतस्य पुराण तथा नारद पुराण में स्पष्ट मिलता है। महाभारत व पौराणिक काल में इस तीर्थ का महत्व अपने चरमोत्कर्ष पर था। महाभारत एवं वामन पुराण में इस तीर्थ का उल्लेख देवताओं की विशेष तपोस्थली के रूप में मिलता है। इस तीर्थ का महात्म्य विस्तार से आगे लिखा है कि जो व्यक्ति एक लाख अश्वमेध यज्ञ करता है। वह भी इतना फल प्राप्त नहीं करता जितना मनुष्य फल्गु तीर्थ में स्नान करने के बाद मनुष्य को तर्पण एवं पिंडदान श्राद्ध करने से मिलता है।
फल्गु तीर्थ की मान्यता
फल्गु तीर्थ, नामक यह तीर्थ कैथल से लगभग 21 किमी दूर फरल नामक ग्राम में स्थित है। फरल ग्राम का नामकरण भी संभवतः फलकी वन से ही हुआ प्रतीत होता है जहां फल्गु ऋर्षि निवास करते थे। वामन पुराण में काम्यक वन, अदिति वन, व्यास वन, सूर्यवन, मधुवन एवं शीत वन के साथ फलकीवन का भी उल्लेख हुआ है। यह सभी सात वन प्राचीन कुरुक्षेत्र भूमि के प्रमुख वन थे। इस तीर्थ का वर्णन महाभारत, वामन पुराण, मत्स्य पुराण तथा नारद पुराण में भी मिलता है। महाभारत एवं वामन पुराण दोनों में यह तीर्थ देवताओं की तपस्या की विशेष स्थली के रूप में उल्लिखित है।
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गौरतलब है कि फल्गु तीर्थ का उल्लेख महाभारत, वामन पुराण, मतस्य पुराण तथा नारद पुराण में स्पष्ट मिलता है। महाभारत व पौराणिक काल में इस तीर्थ का महत्व अपने चरमोत्कर्ष पर था। महाभारत एवं वामन पुराण में इस तीर्थ का उल्लेख देवताओं की विशेष तपोस्थली के रूप में मिलता है। इस तीर्थ का महात्म्य विस्तार से आगे लिखा है कि जो व्यक्ति एक लाख अश्वमेध यज्ञ करता है। वह भी इतना फल प्राप्त नहीं करता जितना मनुष्य फल्गु तीर्थ में स्नान करने के बाद मनुष्य को तर्पण एवं पिंडदान श्राद्ध करने से मिलता है।
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फल्गु तीर्थ की मान्यता
फल्गु तीर्थ, नामक यह तीर्थ कैथल से लगभग 21 किमी दूर फरल नामक ग्राम में स्थित है। फरल ग्राम का नामकरण भी संभवतः फलकी वन से ही हुआ प्रतीत होता है जहां फल्गु ऋर्षि निवास करते थे। वामन पुराण में काम्यक वन, अदिति वन, व्यास वन, सूर्यवन, मधुवन एवं शीत वन के साथ फलकीवन का भी उल्लेख हुआ है। यह सभी सात वन प्राचीन कुरुक्षेत्र भूमि के प्रमुख वन थे। इस तीर्थ का वर्णन महाभारत, वामन पुराण, मत्स्य पुराण तथा नारद पुराण में भी मिलता है। महाभारत एवं वामन पुराण दोनों में यह तीर्थ देवताओं की तपस्या की विशेष स्थली के रूप में उल्लिखित है।
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