{"_id":"5cbcb3f8bdec2276d05c22be","slug":"41555870712-kaithal-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"खुद की व सगे संबंधियों की जरूरतें पूरा करने के लिए कर रहे जैविक खेती","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खुद की व सगे संबंधियों की जरूरतें पूरा करने के लिए कर रहे जैविक खेती
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कैथल। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी के पास समय का अभाव है। यही कारण है कि अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी बाजार पर निर्भर हैं। लेकिन कैथल में आईएमए के पूर्व महासचिव डॉ. राजेश गोयल व व्यवसायी सुशील बंसल ने नई राह अपनाई है। उन्होंने अपने खेतों में जैविक तरीके से खेती करके अपनी व सगे संबंधियों की जरूरत का अनाज, फल, सब्जियां व फूलों का उत्पादन किया है। पांच साल से दोनों अपने खेतों में सुबह के समय हर रोज दो से तीन घंटे का समय देते हैं और सहयोगियों की मदद से खेतों में सभी तरह के उत्पाद के लिए अत्याधुनिक मशीनों की मदद से जैविक खेती कर रहे हैं। अब उनका कहना है कि यह प्रयोग सफल रहा। अब इन उत्पादों को बाजार में भी बेचा जा सकता है।
ग्योंग रोड पर दोनों ने अपने खेतों में करीब 6 साल पहले खुद खेती करने की ठानी। इसके लिए लंबे समय से खेतों में प्रयोग किए जा रहे रसायनिक कीटनाशकों व खरपतवार नाशकों सहित खाद का प्रयोग बंद किया और जीवामृत जो देसी गाय का गोबर, गाय के मूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी से घोल बनता है, यह तैयार किया। पूरे खेत मेें मिलाया। इसके बाद इसमें खेती शुरू की। जिसके अब सुखद परिणाम मिल रहे हैं।
जहरीले रसायनों से मुक्ति के लिए किया प्रयास : डॉ. राजेश गोयल ने बताया कि खाना लगातार जहरीला होता जा रहा है। खेती में पेस्टीसाइड की मात्रा ज्यादा रहती है। जो सेहत के लिए बहुत ही हानिकारक है। इससे कैंसर, किडनी व लीवर के रोग होने की संभावना रहती है। इसलिए जहर मुक्त खेती का आइडिया आया और अपने दोस्त सुशील बंसल के साथ मिलकर जहर मुक्त खेती का रास्ता अपनाया। जिसमें अब सब्जियों, फलों, अनाज, दूध व दालों आदि की जरूरत न केवल खुद की बल्कि सगे संबंधियों की भी पूरी हो जाती हैं।
विज्ञापन
एग्रीकल्चर के साथ हॉर्टिकल्चर, फ्लोरिकल्चर : डॉ. राजेश गोयल ने बताया कि उनके खेतों में इस समय जैविक तरीके से हर तरह की खेती की जा रही है। बिना खाद की गेहूं, सब्जियों में मौसम अनुसार आलू, प्याज, गाजर, गोभी, मटर, बैंगन, लहसून, सरसों, ब्रॉकली, शलजम, चुकंदर, मूली, पालक, फलों में संतरे, अमरूद, आम, चीकू सहित कई अन्य फल, फूलों में सजावट के अलावा गेंदे सहित कई तरह के फूलों का उत्पादन किया है। अनाज में पहले धान अब गेहूं जैविक तरीके से उगाई है। दूध के लिए साहीवाल नसल की गाय रखी है। जिसके लिए जैविक तरीके से हरा चारा उगाया जाता है। साथ ही 4 एकड़ में सफेदे लगाए हुए हैं। जिसमें गाय खुद चरकर शाम को दूध देती है। वही दूध घर में प्रयोग किया जाता है।
सौर ऊर्जा से चलाया जाता है सबमर्सीबल, पूरे खेत में टपका सिंचाई : खेत में सबमर्सीबल को सौर ऊर्जा से चलाया जाता है। जिसके लिए सौर ऊर्जा उपकरण लगाए गए हैं। पूरे खेत में टपका सिंचाई से काम किया जा रहा है। सामान्य सिंचाई के मुकाबले महज 10 प्रतिशत ही पानी खर्च होता है। पूरी खेती प्राकृतिक तरीके से की जा रही है।
सुबह हर रोज लगाते हैं दो से तीन घंटे : डॉ. गोयल ने बताया कि खेती शारीरिक तौर पर काफी मुश्किल काम है। किसान छह माह तक खेतों में कड़ी मेहनत करता है। इसके बाद कहीं जाकर मेहनत का फल मिलता है। वे हर रोज सुबह दो से तीन घंटे खेत में लगाते हैं। साथ में सहयोगियों के साथ खुद भी मेहनत करते हैं। तभी जाकर अच्छा उत्पादन होता है। 5 सालों में काफी कुछ सीखने को मिला है। अब जरूरत हुई तो अपने जैविक उत्पादों को बाजार में भी बेचा जाएगा। अभी तक इसकी खुद की व सगे संबंधियों की जरूरतें पूरी हो रही हैं।
तकनीक का भी सहारा : कृषि कार्यों को आसान बनाने वाली खेती संबंधी मशीनरी की मदद से खेती की जा रही है। तकनीकी मदद में शारीरिक श्रम कम लगता है। साथ ही इसमें समय की भी बचत होती है। इनसे एक आदमी कई लोगों के बराबर काम कर सकता है। उनका प्रयास रहेगा कि जैविक खेती को बढ़ावा दें।
विज्ञापन
ग्योंग रोड पर दोनों ने अपने खेतों में करीब 6 साल पहले खुद खेती करने की ठानी। इसके लिए लंबे समय से खेतों में प्रयोग किए जा रहे रसायनिक कीटनाशकों व खरपतवार नाशकों सहित खाद का प्रयोग बंद किया और जीवामृत जो देसी गाय का गोबर, गाय के मूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी से घोल बनता है, यह तैयार किया। पूरे खेत मेें मिलाया। इसके बाद इसमें खेती शुरू की। जिसके अब सुखद परिणाम मिल रहे हैं।
विज्ञापन
जहरीले रसायनों से मुक्ति के लिए किया प्रयास : डॉ. राजेश गोयल ने बताया कि खाना लगातार जहरीला होता जा रहा है। खेती में पेस्टीसाइड की मात्रा ज्यादा रहती है। जो सेहत के लिए बहुत ही हानिकारक है। इससे कैंसर, किडनी व लीवर के रोग होने की संभावना रहती है। इसलिए जहर मुक्त खेती का आइडिया आया और अपने दोस्त सुशील बंसल के साथ मिलकर जहर मुक्त खेती का रास्ता अपनाया। जिसमें अब सब्जियों, फलों, अनाज, दूध व दालों आदि की जरूरत न केवल खुद की बल्कि सगे संबंधियों की भी पूरी हो जाती हैं।
विज्ञापन
एग्रीकल्चर के साथ हॉर्टिकल्चर, फ्लोरिकल्चर : डॉ. राजेश गोयल ने बताया कि उनके खेतों में इस समय जैविक तरीके से हर तरह की खेती की जा रही है। बिना खाद की गेहूं, सब्जियों में मौसम अनुसार आलू, प्याज, गाजर, गोभी, मटर, बैंगन, लहसून, सरसों, ब्रॉकली, शलजम, चुकंदर, मूली, पालक, फलों में संतरे, अमरूद, आम, चीकू सहित कई अन्य फल, फूलों में सजावट के अलावा गेंदे सहित कई तरह के फूलों का उत्पादन किया है। अनाज में पहले धान अब गेहूं जैविक तरीके से उगाई है। दूध के लिए साहीवाल नसल की गाय रखी है। जिसके लिए जैविक तरीके से हरा चारा उगाया जाता है। साथ ही 4 एकड़ में सफेदे लगाए हुए हैं। जिसमें गाय खुद चरकर शाम को दूध देती है। वही दूध घर में प्रयोग किया जाता है।
सौर ऊर्जा से चलाया जाता है सबमर्सीबल, पूरे खेत में टपका सिंचाई : खेत में सबमर्सीबल को सौर ऊर्जा से चलाया जाता है। जिसके लिए सौर ऊर्जा उपकरण लगाए गए हैं। पूरे खेत में टपका सिंचाई से काम किया जा रहा है। सामान्य सिंचाई के मुकाबले महज 10 प्रतिशत ही पानी खर्च होता है। पूरी खेती प्राकृतिक तरीके से की जा रही है।
सुबह हर रोज लगाते हैं दो से तीन घंटे : डॉ. गोयल ने बताया कि खेती शारीरिक तौर पर काफी मुश्किल काम है। किसान छह माह तक खेतों में कड़ी मेहनत करता है। इसके बाद कहीं जाकर मेहनत का फल मिलता है। वे हर रोज सुबह दो से तीन घंटे खेत में लगाते हैं। साथ में सहयोगियों के साथ खुद भी मेहनत करते हैं। तभी जाकर अच्छा उत्पादन होता है। 5 सालों में काफी कुछ सीखने को मिला है। अब जरूरत हुई तो अपने जैविक उत्पादों को बाजार में भी बेचा जाएगा। अभी तक इसकी खुद की व सगे संबंधियों की जरूरतें पूरी हो रही हैं।
तकनीक का भी सहारा : कृषि कार्यों को आसान बनाने वाली खेती संबंधी मशीनरी की मदद से खेती की जा रही है। तकनीकी मदद में शारीरिक श्रम कम लगता है। साथ ही इसमें समय की भी बचत होती है। इनसे एक आदमी कई लोगों के बराबर काम कर सकता है। उनका प्रयास रहेगा कि जैविक खेती को बढ़ावा दें।