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Jind News: कालवन में प्रजातियों की संख्या बढ़ी, विलुप्तप्राय पक्षियों की मौजूदगी बनी चिंता का विषय

Thu, 15 Jan 2026 12:48 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Thu, 15 Jan 2026 12:48 AM IST
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The number of species has increased in Kalvan, but the presence of endangered birds has become a cause for concern.
संवाद न्यूज एजेंसी।
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नरवाना। कालवन गांव में स्थित महर्षि दयानंद सरस्वती प्रवासी पक्षी संरक्षण स्थल पर बुधवार को एशियन वाटर बर्ड सेंसस-2026 के तहत पक्षी पहचान, जलीय पक्षियों की गणना व स्थल मूल्यांकन किया गया।
गणना के लिए विशेषज्ञों की टीम ने संरक्षण स्थल का दौरा किया जिसकी अध्यक्षता पक्षी वैज्ञानिक एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन), नई दिल्ली के सदस्य डॉ. टीके राय ने की। उनके साथ हरियाणा राज्य जैव विविधता बोर्ड, वन विभाग जींद व वाइल्ड लाइफ विभाग के अधिकारी व कर्मचारी भी मौजूद रहे।
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डॉ. टीके राय ने बताया कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर की एशियाई जल पक्षी जनगणना है जो हर वर्ष जनवरी माह में एशिया के 27 देशों में एक साथ करवाई जाती है। इस गणना का उद्देश्य प्रवासी व स्थानीय जल पक्षियों की प्रजातियों, उनकी संख्या, संरक्षण स्थिति तथा जलाशयों की वर्तमान दशा का मूल्यांकन करना होता है।
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इस वर्ष कालवन संरक्षण स्थल पर दूसरी बार यह गणना की गई है ओर यहां पर कुल 42 प्रजातियों के पक्षी दर्ज किए गए। पिछले वर्ष यह संख्या 34 थी। इनमें 23 विदेशी (प्रवासी) और 19 भारतीय प्रजातियां शामिल हैं। कुल पक्षियों की संख्या पिछले वर्ष के 1806 के मुकाबले इस बार 1537 रही लेकिन प्रजातियों की विविधता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
चिंता का विषय यह है कि इस बार 3 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पाई गईं, जबकि पिछले वर्ष ऐसी केवल 2 प्रजातियां थीं। विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण प्रवासी पक्षियों में इस बार कामन पोचार्ड का बड़ा समूह देखने को मिला जिसकी संख्या 84 दर्ज की गई।
वहीं, ब्लैक टेल गॉडविट की 105 संख्या मिली जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक है। दुर्लभ उली नेक स्टॉर्क का केवल एक पक्षी दर्ज किया गया।
भारतीय प्रजातियों में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम डब्ल्यूपीए के शेड्यूल-1 में शामिल तीन महत्वपूर्ण प्रजातियां भी दर्ज की गईं जिनमें कामन पोचार्ड, यूरेशियन स्पूनबिल (7) और कामन ग्रीनशैंक (3) शामिल हैं।
लोगों की ओर से संरक्षण स्थल को बचाने की अपील भी की कि इस जगह पर गांव का गंदा पानी न आने दें ताकि भविष्य में यहां पर प्रवासी पक्षियों का आना कम न हो। क्योंकि पक्षियों की संख्या बढ़ने पर भविष्य में एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर व पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने की संभावना भी जताई गई है। इस दौरान जिला कोऑर्डिनेटर जींद हरियाणा राज्य जैव विविधता बोर्ड के विष्णु बगड़ी, संदीप करनाल आदि मौजूद रहे।
नॉर्थ एशिया, सेंट्रल एशिया और साइबेरिया क्षेत्रों से आते हैं पक्षी
ये प्रवासी पक्षी मुख्यत नॉर्थ एशिया, सेंट्रल एशिया और साइबेरिया क्षेत्रों से आते हैं, जहां सर्दियों में जलाशय जम जाते हैं और भोजन की कमी हो जाती है। यही कारण है कि ये पक्षी यहां लगभग 3 से 4 महीने प्रवास करते हैं और फरवरी-मार्च से वापस लौटना शुरू कर देते हैं।

गणना के आधार पर रिपोर्ट तैयार कर राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर भेजी जाती है ताकि दुनिया भर में जलाशयों और जल पक्षियों के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें। –डॉ टीके रॉय, पक्षी विशेषज्ञ।
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