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ढाई घंटे चला मंथन, नहीं बनी चौधर पर सहमति
ब्यूरो/अमर उजाला, जींद
Updated Tue, 12 Jan 2016 12:06 AM IST
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गांव की चौधर की कमान सौंपने के लिए शामलो कलां गांव में सोमवार को ग्रामसभा की बैठक गांव की चौपाल में हुई। गांव का मुखिया सर्वसम्मति से चुना जाए, इसके लिए पंचायत में ढाई घंटों तक मंथन चला, मगर सहमति नहीं बन सकी। अब गांव की चौधर ज्यादा वोट प्राप्त करने वाले को मिलेगी, इसका रास्ता साफ हो गया है। गांव में सरपंच पद के लिए पांच उम्मीदवार हैं।
सोमवार को हुई बैठक की अध्यक्षता निवर्तमान सरपंच सुरजीत मलिक ने की। बैठक में मंथन किया गया कि अगले पांच वर्ष के लिए किस महिला के हाथों में गांव की चौधर सौंपी जाए। सरपंच पद के लिए नामांकन किए हुए पांच उम्मीदवार को पंचायत ने आपस में सर्वसम्मति बनाने का समय दिया, मगर सफलता नहीं मिली। इसके बाद 21 सदस्यीय कमेटी बनाने का प्रस्ताव भी पंचायत में रखा गया, जो सरपंच को चुनेगी। यह प्रस्ताव भी ग्राम सभा की बैठक में पास नहीं हो सका।
बुजुर्गों के मन में रह गई सर्वसम्मति की कसक
पंजाब व हरियाणा को डीजीपी देने वाले गांव शामलो कलां की आबादी 10 हजार के करीब है। सरपंच का पद महिला के लिए आरक्षित है। गांव में सभी जाति के लोग रहते हैं। जाट समाज का बाहुल्य रहा है। बीसी समाज की संख्या 14 प्रतिशत जबकि एससी समाज की 11 प्रतिशत है। गांव में 4200 के करीब वोट हैं। जब से पंचायती चुनाव हुए हैं गांव में सरपंच पद के लिए सर्वसम्मति नहीं हुई है। गांव में भाईचारा बना रहे और सरपंच सर्वसम्मति से बने यह कसक बुजुर्गों के मन में ही रह गई।
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गांव के विकास के लिए सर्व समाज के लोग एकजुट होकर सर्वसम्मति से फैसला कर अपना प्रतिनिधि चुने, जिससे गांव का आपसी भाईचारा कायम रह सके। सर्वसम्मति से आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ता है। हलके के बड़े गांव में पंचायत की सर्वसम्मति होना समाज के लिए एक मिशाल होगी। ग्रामीणों को सर्वसम्मति के लिए वोट पड़ने तक प्रयास जारी रखना चाहिए। ग्रामीण पहले से ही सरकार की अनदेखी व प्राकृतिक आपदा के कारण आर्थिक रूप से पिछड़ चुके हैं। अब चुनाव प्रक्रिया के दौरान आने वाला आर्थिक अनावश्यक बोझ चुनाव लड़ने वाले ग्रामीणों की कमर तोड़ने का काम करेगा।
डॉ. महेंद्र सिंह मलिक, पूर्व डीजीपी
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सोमवार को हुई बैठक की अध्यक्षता निवर्तमान सरपंच सुरजीत मलिक ने की। बैठक में मंथन किया गया कि अगले पांच वर्ष के लिए किस महिला के हाथों में गांव की चौधर सौंपी जाए। सरपंच पद के लिए नामांकन किए हुए पांच उम्मीदवार को पंचायत ने आपस में सर्वसम्मति बनाने का समय दिया, मगर सफलता नहीं मिली। इसके बाद 21 सदस्यीय कमेटी बनाने का प्रस्ताव भी पंचायत में रखा गया, जो सरपंच को चुनेगी। यह प्रस्ताव भी ग्राम सभा की बैठक में पास नहीं हो सका।
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बुजुर्गों के मन में रह गई सर्वसम्मति की कसक
पंजाब व हरियाणा को डीजीपी देने वाले गांव शामलो कलां की आबादी 10 हजार के करीब है। सरपंच का पद महिला के लिए आरक्षित है। गांव में सभी जाति के लोग रहते हैं। जाट समाज का बाहुल्य रहा है। बीसी समाज की संख्या 14 प्रतिशत जबकि एससी समाज की 11 प्रतिशत है। गांव में 4200 के करीब वोट हैं। जब से पंचायती चुनाव हुए हैं गांव में सरपंच पद के लिए सर्वसम्मति नहीं हुई है। गांव में भाईचारा बना रहे और सरपंच सर्वसम्मति से बने यह कसक बुजुर्गों के मन में ही रह गई।
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गांव के विकास के लिए सर्व समाज के लोग एकजुट होकर सर्वसम्मति से फैसला कर अपना प्रतिनिधि चुने, जिससे गांव का आपसी भाईचारा कायम रह सके। सर्वसम्मति से आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ता है। हलके के बड़े गांव में पंचायत की सर्वसम्मति होना समाज के लिए एक मिशाल होगी। ग्रामीणों को सर्वसम्मति के लिए वोट पड़ने तक प्रयास जारी रखना चाहिए। ग्रामीण पहले से ही सरकार की अनदेखी व प्राकृतिक आपदा के कारण आर्थिक रूप से पिछड़ चुके हैं। अब चुनाव प्रक्रिया के दौरान आने वाला आर्थिक अनावश्यक बोझ चुनाव लड़ने वाले ग्रामीणों की कमर तोड़ने का काम करेगा।
डॉ. महेंद्र सिंह मलिक, पूर्व डीजीपी