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Jind News: नवीन तकनीक से ले सकते हैं कपास का अधिक उत्पादन
Sat, 19 Oct 2024 12:06 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Sat, 19 Oct 2024 12:06 AM IST
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18जेएनडी28-कपास फसल के प्रशिक्षण समापन पर स्टाफ के साथ किसान। स्रोत संस्थान
जींद। हमेटी में चल रहे पांच दिवसीय कपास फसल प्रशिक्षण का शुक्रवार को समापन हो गया। इसमें 11 जिलों के कृषि सुपरवाइजरों को कपास के अधिक उत्पादन के नवीनतम वैज्ञानिक तरीकों के बारे में प्रशिक्षण दिया गया।
हमेटी निदेशक डॉ. कर्मचंद ने कहा कि कपास को किसानों के लिए सफेद सोना कहा गया है, क्योंकि यह फसल कम पानी व कम खर्चे में तैयार होती है। यदि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार कीट प्रबंधन किया जाए तो कीटनाशकों पर भी खर्चा काफी कम आएगा। उन्होनें बताया कि कपास में गुलाबी सुंडी के नियंत्रण के लिए कपास की आखिरी चुगाई के बाद बचे हुए टिंडों को तोड़कर पशुओं को खिला देना चाहिए। कपास की लकड़ियों को भी खेत में नहीं रखना चाहिए। ऐसा नहीं करने से उसमें बची हुई गुलाबी सुंडियां नष्ट नहीं होतीं। इससे उनका जीवन चक्र टूट नहीं पाता।
ट्रेनर डॉ. सुभाष चंद्र ने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान कोर्स फैसिलिटेटर डॉ. हरभगवान कंबोज के नेतृत्व में चौधरी चरणसिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कपास अनुसंधान क्षेत्र का शैक्षणिक भ्रमण भी करवाया गया। खेत में पानी भरने की स्थिति में कपास को कैसे बचाया जा सकता है, के बारे में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शिवानी मांधनिया ने बताया। अंत में डॉ. कर्मचंद ने प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाण पत्र वितरित किए।
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हमेटी निदेशक डॉ. कर्मचंद ने कहा कि कपास को किसानों के लिए सफेद सोना कहा गया है, क्योंकि यह फसल कम पानी व कम खर्चे में तैयार होती है। यदि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार कीट प्रबंधन किया जाए तो कीटनाशकों पर भी खर्चा काफी कम आएगा। उन्होनें बताया कि कपास में गुलाबी सुंडी के नियंत्रण के लिए कपास की आखिरी चुगाई के बाद बचे हुए टिंडों को तोड़कर पशुओं को खिला देना चाहिए। कपास की लकड़ियों को भी खेत में नहीं रखना चाहिए। ऐसा नहीं करने से उसमें बची हुई गुलाबी सुंडियां नष्ट नहीं होतीं। इससे उनका जीवन चक्र टूट नहीं पाता।
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ट्रेनर डॉ. सुभाष चंद्र ने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान कोर्स फैसिलिटेटर डॉ. हरभगवान कंबोज के नेतृत्व में चौधरी चरणसिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कपास अनुसंधान क्षेत्र का शैक्षणिक भ्रमण भी करवाया गया। खेत में पानी भरने की स्थिति में कपास को कैसे बचाया जा सकता है, के बारे में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शिवानी मांधनिया ने बताया। अंत में डॉ. कर्मचंद ने प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाण पत्र वितरित किए।
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