{"_id":"5ec2c0838ebc3e9027450d8f","slug":"lock-down-workers-back-to-home-jind-jind-news-rtk5555432132","type":"story","status":"publish","title_hn":"भटिंडा से पैदल चलकर जींद पहुंचे 26 मजदूर, जींद प्रशासन ने की घर पहुंचाने की व्यवस्था","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भटिंडा से पैदल चलकर जींद पहुंचे 26 मजदूर, जींद प्रशासन ने की घर पहुंचाने की व्यवस्था
विज्ञापन
सीटू नेता कामरेड रमेश चंद्र द्वारा एक जगह ठहराए गए मजदूर।
- फोटो : Jind
जींद। किसी के मरने के बाद भी मकबरे बनते हैं और किसी को जीते जी घरौंदा नसीब नहीं होता। यह पंक्ति शायद उन मजदूरों के लिए ही लिखी गई हैं, जिनको घर पहुंचने के लिए मीलों पैदल चलने के साथ-साथ पुलिस की लाठियां भी खानी पड़ रही हैं। यह दास्तां है पंजाब के भटिंडा से पैदल चलकर जींद पहुंचे उत्तर प्रदेश व बिहार के 26 श्रमिकों की।
श्रमिकों ने बताया कि यह लोग 14 मई को भटिंडा से पुलिस की मार खाकर निकले और तीन दिन का सफर पैदल तय कर जींद पहुंचे। हालांकि जींद में सीटू नेता रमेश चंद्र ने उनको सड़क से चलते देख पूछ लिया और प्रशासन ने बात कर उन्हें घर भेजने की व्यवस्था कराई। इसके बाद इन लोगों में कुछ हौसला हुआ। उत्तर प्रदेश के मऊ निवासी गणेश साहनी बताते हैं कि वे लोग एक निर्माण ठेकेदार के पास काम करते थे। जैसे ही लॉकडाउन शुरू हुआ, ठेकेदार ने आंखें फेर ली। 50 दिन तक खाली बैठकर खाने के बाद अब जेब में पैसे भी नहीं बचे। ऐसे में घर जाने की योजना बनाई। लेकिन इसके लिए पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं, जैसे-तैसे कर वहां से निकले और जींद तक पहुंच गए।
बिहार और उत्तर प्रदेश के हैं श्रमिक
यह श्रमिक बिहार व उत्तर प्रदेश राज्यों के हैं। इनमें मऊ जिले के 15, गोरखपुर के एक, बिहार के मुज्जफरपुर के पांच, देवरिया के तीन और रोहताश जिले से एक मजदूर शामिल हैं।
विज्ञापन
न शरीर साथ दे रहा था, न दिमाग, पागलों जैसी हुई हालत
भवन निमार्ण के काम में मजदूरी करने वाली गोरखपुर जिले के बैसारे गांव निवासी सीताराम के अनुसार वह भटिंडा में भवन निर्माण के काम में मजदूरी करता है। जो कुछ पैसे पास थे, वे बहुत पहले ही खत्म हो चुके थे। ऐसे में न कुछ खाने को था और न ही कोई आश्रय। कई दिन तक सड़कों पर दर-दर भटके। चार दिन पहले पैदल चल रहे इस जत्थे ने अपने साथ लिया तो कुछ होश आया है। अब ऐसा लग रहा है कि जिंदा घर पहुंच सकता हूं। नहीं तो कोई आस नहीं थी।
13 को हुआ मेडिकल, बस वाले ने भी किया धोखा
श्रमिक गणेश सहानी के अनुसार उन्होंने घर जाने के लिए 13 मई को मेडिकल करवा लिया था। इससे पहले एक निजी बस चालक से बात हुई थी। वह दो-दो हजार रुपये सभी को गोरखपुर तक भेजने को राजी हो गया था। लेकिन मेडिकल होने के बाद उसने मना कर दिया, हालांकि पैसे वापस दे दिए। जब वे लोग घर जाने के लिए एकत्रित हुए तो पुलिसकर्मियों ने पिटाई भी की। लेकिन अब दो ही रास्ते थे, या तो वहीं मर जाएं, या फिर घर जाएं। ऐसे में पैदल ही घर की ओर चल पड़े।
अब नहीं जाएंगे पंजाब
भरी आंखों से श्रमिकों ने बताया कि बेशक वे रोजी-रोटी के लिए आए, लेकिन उन्होंने काम तो पंजाब में ही किया। ऐसे में संकट के समय वहां की सरकार व प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली। जहां इज्जत नहीं है, ऐसे राज्य में दोबारा कभी काम के लिए नहीं जाएंगे।
प्रशासन ने किया सहयोग
-ये मजदूर रविवार शाम को सफीदों रोड से जा रहे थे। मानवता के नाते इनसे पूछ लिया तो इन लोगों ने अपनी दुख भरी कहानी सुनाई। इस पर जींद प्रशासन से बात की तो उन्होंने भी भेजने से मना कर दिया। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के हेल्पलाइन नंबरों पर फोन किया, लेकिन कोई सकारात्मक बात नहीं हुई। सोमवार को जींद के अधिकारियों ने मजदूरों को भेजने की व्यवस्था करने की बात कही है। जींद प्रशासन ने काफी सहयोग किया है।
-कामरेड रमेश चंद्र।
- प्रशासन को इस प्रकार की सूचना मिली थी। हालांकि इस प्रकार से पंजाब से आए लोगों को भेजना प्रशासन के लिए आसान नहीं है। लेकिन मानवता के नाते इन लोगों को भेजा जाएगा। अपील यह है कि अब जिले के बाहर से दूसरे लोगों यहां से भेजने की व्यवस्था नहीं हो पाएगी। सभी जिला प्रशासन काम कर रहे हैं।
-मनोज कुमार, तहसीलदार।
विज्ञापन
श्रमिकों ने बताया कि यह लोग 14 मई को भटिंडा से पुलिस की मार खाकर निकले और तीन दिन का सफर पैदल तय कर जींद पहुंचे। हालांकि जींद में सीटू नेता रमेश चंद्र ने उनको सड़क से चलते देख पूछ लिया और प्रशासन ने बात कर उन्हें घर भेजने की व्यवस्था कराई। इसके बाद इन लोगों में कुछ हौसला हुआ। उत्तर प्रदेश के मऊ निवासी गणेश साहनी बताते हैं कि वे लोग एक निर्माण ठेकेदार के पास काम करते थे। जैसे ही लॉकडाउन शुरू हुआ, ठेकेदार ने आंखें फेर ली। 50 दिन तक खाली बैठकर खाने के बाद अब जेब में पैसे भी नहीं बचे। ऐसे में घर जाने की योजना बनाई। लेकिन इसके लिए पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं, जैसे-तैसे कर वहां से निकले और जींद तक पहुंच गए।
विज्ञापन
बिहार और उत्तर प्रदेश के हैं श्रमिक
यह श्रमिक बिहार व उत्तर प्रदेश राज्यों के हैं। इनमें मऊ जिले के 15, गोरखपुर के एक, बिहार के मुज्जफरपुर के पांच, देवरिया के तीन और रोहताश जिले से एक मजदूर शामिल हैं।
विज्ञापन
न शरीर साथ दे रहा था, न दिमाग, पागलों जैसी हुई हालत
भवन निमार्ण के काम में मजदूरी करने वाली गोरखपुर जिले के बैसारे गांव निवासी सीताराम के अनुसार वह भटिंडा में भवन निर्माण के काम में मजदूरी करता है। जो कुछ पैसे पास थे, वे बहुत पहले ही खत्म हो चुके थे। ऐसे में न कुछ खाने को था और न ही कोई आश्रय। कई दिन तक सड़कों पर दर-दर भटके। चार दिन पहले पैदल चल रहे इस जत्थे ने अपने साथ लिया तो कुछ होश आया है। अब ऐसा लग रहा है कि जिंदा घर पहुंच सकता हूं। नहीं तो कोई आस नहीं थी।
13 को हुआ मेडिकल, बस वाले ने भी किया धोखा
श्रमिक गणेश सहानी के अनुसार उन्होंने घर जाने के लिए 13 मई को मेडिकल करवा लिया था। इससे पहले एक निजी बस चालक से बात हुई थी। वह दो-दो हजार रुपये सभी को गोरखपुर तक भेजने को राजी हो गया था। लेकिन मेडिकल होने के बाद उसने मना कर दिया, हालांकि पैसे वापस दे दिए। जब वे लोग घर जाने के लिए एकत्रित हुए तो पुलिसकर्मियों ने पिटाई भी की। लेकिन अब दो ही रास्ते थे, या तो वहीं मर जाएं, या फिर घर जाएं। ऐसे में पैदल ही घर की ओर चल पड़े।
अब नहीं जाएंगे पंजाब
भरी आंखों से श्रमिकों ने बताया कि बेशक वे रोजी-रोटी के लिए आए, लेकिन उन्होंने काम तो पंजाब में ही किया। ऐसे में संकट के समय वहां की सरकार व प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली। जहां इज्जत नहीं है, ऐसे राज्य में दोबारा कभी काम के लिए नहीं जाएंगे।
प्रशासन ने किया सहयोग
-ये मजदूर रविवार शाम को सफीदों रोड से जा रहे थे। मानवता के नाते इनसे पूछ लिया तो इन लोगों ने अपनी दुख भरी कहानी सुनाई। इस पर जींद प्रशासन से बात की तो उन्होंने भी भेजने से मना कर दिया। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के हेल्पलाइन नंबरों पर फोन किया, लेकिन कोई सकारात्मक बात नहीं हुई। सोमवार को जींद के अधिकारियों ने मजदूरों को भेजने की व्यवस्था करने की बात कही है। जींद प्रशासन ने काफी सहयोग किया है।
-कामरेड रमेश चंद्र।
- प्रशासन को इस प्रकार की सूचना मिली थी। हालांकि इस प्रकार से पंजाब से आए लोगों को भेजना प्रशासन के लिए आसान नहीं है। लेकिन मानवता के नाते इन लोगों को भेजा जाएगा। अपील यह है कि अब जिले के बाहर से दूसरे लोगों यहां से भेजने की व्यवस्था नहीं हो पाएगी। सभी जिला प्रशासन काम कर रहे हैं।
-मनोज कुमार, तहसीलदार।