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न सुविधा, न कोच कैसे आएगा ओलंपिक पदक
अमर उजाला ब्यूरो, जींद
Updated Sat, 20 Aug 2016 11:59 PM IST
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प्रदेश सरकार चाहे खेल नीति को लेकर कितने ही दावे क्यों नहीं करती हो, लेकिन जमीनी स्तर पर हकीकत कुछ और ही है। जिले में प्रशिक्षकों के अभाव में खेल प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। ओलंपिक में पदक जीतने के बाद तो खिलाड़ियों पर प्रदेश सरकार मेहरबान है, लेकिन खेल प्रतिभाओं को संवारने के लिए सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
जिले में विभिन्न खेलों के लिए कुल 37 प्रशिक्षकों के पद हैं, जिनमें से 19 पद खाली हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो खेल सुविधाओं की कल्पना करना ही कोसों दूर है। जिला मुख्यालय पर ही एथलेटिक, फुटबाल, जिम्नास्टिक, बैडमिंटन और कबड्डी जैसे मुख्य खेलों के लिए प्रशिक्षक ही नहीं है। ओलंपिक में शामिल मुख्य खेलों के लिए ही प्रशिक्षक नहीं है, तो ओलंपिक में पदक जीतने की उम्मीद करना भी बेमानी है। इन खेलों के लिए प्रतिदिन 150 से 200 खिलाड़ी बगैर प्रशिक्षक के ही पसीना बहा रहे हैं।
खेलने के लिए नहीं हैं ढंग के मैदान
जिला मुख्यालय पर खेलने के लिए स्टेडियम की बात की जाए, तो स्थिति भी ज्यादा अच्छी नहीं है। अर्जुन स्टेडियम में बारिश के समय पानी भर जाता है और खेल सुविधाओं का भी अभाव है। जिला मुख्यालय पर स्वीमिंग के लिए प्रशिक्षक तो नियुक्त है, लेकिन स्वीमिंग पूल की ही सुविधा नहीं है। सफीदों रोड पर सेक्टर नौ में तत्कालीन हुड्डा सरकार के समय आधुनिक खेल सुविधाओं से लैस स्टेडियम बनाने की घोषणा की गई थी। स्टेडियम का निर्माण कार्य हुड्डा सरकार के समय से ही चल रहा है। निर्धारित समय से करीब एक साल बीत जाने के बावजूद भी इस स्टेडियम का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया है। इस स्टेडियम में दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम की तर्ज पर स्वीमिंग पूल बनना है।
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स्पीड टेस्ट की नर्सरी के लिए भी नहीं कोच
ग्रामीण क्षेत्रों में मिल्खा सिंह जैसे धावक तैयार करने के लिए ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर स्पीड टेस्ट हुआ था। इसमें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों का चयन करके उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए नर्सरी बनाई गई। प्रदेश सरकार ने नर्सरी तो बना दी, लेकिन प्रशिक्षक भेजना भूल गई। अब 150 से ज्यादा खिलाड़ी बगैर प्रशिक्षक के ही तैयारी कर रहे हैं।
जिला मुख्यालय पर प्रशिक्षकों की कमी
जिला मुख्यालय पर हैंडबाल, रेसलिंग, वालीबाल, स्वीमिंग के लिए ही प्रशिक्षक है। ओलंपिक में शामिल एथलेटिक और बैडमिंटन के लिए प्रशिक्षक की सुविधा नहीं है। वहीं फुटबाल और कबड्डी खिलाड़ी भी बगैर प्रशिक्षक के ही पसीना बहा रहे हैं। जिले में छह राजीव गांधी खेल स्टेडियम हैं और करीब तीन दर्जन मिनी स्टेडियम हैं।
एशियन चैंपियनशिप के लिए नहीं हो सका चयन
राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर 400 मीटर हर्डल बाधा दौड़ में पदक जीतने वाले खिलाड़ी अमरजीत ने कहा कि सिंथेटिक ट्रैक न होने की वजह से उनका चयन जूनियर एशियन चैंपियनशिप के लिए नहीं हो सका। इसका उन्हें आज भी मलाल है। खिलाड़ियों ने अपने स्तर पर 10 हजार रुपये एकत्रित करके हर्डल खरीदा है। अगर जिले में सिंथेटिक ट्रैक की सुविधा होती, तो शायद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज कई खिलाड़ी पहुंच पाते।
नहीं मिल रही सुविधाएं
सुविधा नहीं होने के कारण गांव से यहां जिला मुख्यालय पर आते हैं, लेकिन यहां भी एथलेटिक के लिए कोच नहीं है।
सनी, बरसोला निवासी
एथलेटिक खिलाड़ी
कैसे खेलें ओलंपिक
हर खिलाड़ी का सपना देश के लिए ओलंपिक में खेलना है। अगर सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तो इतने बड़े मंच तक पहुंचने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
नवीन, निर्जन निवासी
खिलाड़ी
प्रशिक्षकों की है कमी
हां, जिले में प्रशिक्षकों की तो कमी है। कुछ स्पीड नर्सरी में तो प्रशिक्षक आ चुके हैं और कुछ में अभी भी प्रशिक्षक नहीं हैं।
जुगमिंद्र श्योकंद, जिला खेल एवं कार्यक्रम अधिकारी जींद।
जिले में विभिन्न खेलों के लिए कुल 37 प्रशिक्षकों के पद हैं, जिनमें से 19 पद खाली हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो खेल सुविधाओं की कल्पना करना ही कोसों दूर है। जिला मुख्यालय पर ही एथलेटिक, फुटबाल, जिम्नास्टिक, बैडमिंटन और कबड्डी जैसे मुख्य खेलों के लिए प्रशिक्षक ही नहीं है। ओलंपिक में शामिल मुख्य खेलों के लिए ही प्रशिक्षक नहीं है, तो ओलंपिक में पदक जीतने की उम्मीद करना भी बेमानी है। इन खेलों के लिए प्रतिदिन 150 से 200 खिलाड़ी बगैर प्रशिक्षक के ही पसीना बहा रहे हैं।
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खेलने के लिए नहीं हैं ढंग के मैदान
जिला मुख्यालय पर खेलने के लिए स्टेडियम की बात की जाए, तो स्थिति भी ज्यादा अच्छी नहीं है। अर्जुन स्टेडियम में बारिश के समय पानी भर जाता है और खेल सुविधाओं का भी अभाव है। जिला मुख्यालय पर स्वीमिंग के लिए प्रशिक्षक तो नियुक्त है, लेकिन स्वीमिंग पूल की ही सुविधा नहीं है। सफीदों रोड पर सेक्टर नौ में तत्कालीन हुड्डा सरकार के समय आधुनिक खेल सुविधाओं से लैस स्टेडियम बनाने की घोषणा की गई थी। स्टेडियम का निर्माण कार्य हुड्डा सरकार के समय से ही चल रहा है। निर्धारित समय से करीब एक साल बीत जाने के बावजूद भी इस स्टेडियम का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया है। इस स्टेडियम में दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम की तर्ज पर स्वीमिंग पूल बनना है।
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स्पीड टेस्ट की नर्सरी के लिए भी नहीं कोच
ग्रामीण क्षेत्रों में मिल्खा सिंह जैसे धावक तैयार करने के लिए ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर स्पीड टेस्ट हुआ था। इसमें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों का चयन करके उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए नर्सरी बनाई गई। प्रदेश सरकार ने नर्सरी तो बना दी, लेकिन प्रशिक्षक भेजना भूल गई। अब 150 से ज्यादा खिलाड़ी बगैर प्रशिक्षक के ही तैयारी कर रहे हैं।
जिला मुख्यालय पर प्रशिक्षकों की कमी
जिला मुख्यालय पर हैंडबाल, रेसलिंग, वालीबाल, स्वीमिंग के लिए ही प्रशिक्षक है। ओलंपिक में शामिल एथलेटिक और बैडमिंटन के लिए प्रशिक्षक की सुविधा नहीं है। वहीं फुटबाल और कबड्डी खिलाड़ी भी बगैर प्रशिक्षक के ही पसीना बहा रहे हैं। जिले में छह राजीव गांधी खेल स्टेडियम हैं और करीब तीन दर्जन मिनी स्टेडियम हैं।
एशियन चैंपियनशिप के लिए नहीं हो सका चयन
राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर 400 मीटर हर्डल बाधा दौड़ में पदक जीतने वाले खिलाड़ी अमरजीत ने कहा कि सिंथेटिक ट्रैक न होने की वजह से उनका चयन जूनियर एशियन चैंपियनशिप के लिए नहीं हो सका। इसका उन्हें आज भी मलाल है। खिलाड़ियों ने अपने स्तर पर 10 हजार रुपये एकत्रित करके हर्डल खरीदा है। अगर जिले में सिंथेटिक ट्रैक की सुविधा होती, तो शायद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज कई खिलाड़ी पहुंच पाते।
नहीं मिल रही सुविधाएं
सुविधा नहीं होने के कारण गांव से यहां जिला मुख्यालय पर आते हैं, लेकिन यहां भी एथलेटिक के लिए कोच नहीं है।
सनी, बरसोला निवासी
एथलेटिक खिलाड़ी
कैसे खेलें ओलंपिक
हर खिलाड़ी का सपना देश के लिए ओलंपिक में खेलना है। अगर सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तो इतने बड़े मंच तक पहुंचने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
नवीन, निर्जन निवासी
खिलाड़ी
प्रशिक्षकों की है कमी
हां, जिले में प्रशिक्षकों की तो कमी है। कुछ स्पीड नर्सरी में तो प्रशिक्षक आ चुके हैं और कुछ में अभी भी प्रशिक्षक नहीं हैं।
जुगमिंद्र श्योकंद, जिला खेल एवं कार्यक्रम अधिकारी जींद।