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Jind News: 70 बरस पहले हुई थी खोखे से शुरुआत, अब देशभर में जलवा
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सुशील टुर्ण जींद। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को हाइड्रोजन ट्रेन रवाना करने के बाद जनसभा के मंच से जींद के जिस बूरे को अपनत्व की मिठास के साथ याद किया, उसके स्वाद की हांडी 70 बरस पहले एक खोखे में चढ़ी थी। लाला नरसिंह के कारीगरों के जादुई हाथों ने इसे हरियाणा की पहचान और परंपरा का प्रतीक बना दिया।
स्वाद गली में हमेशा ही आला-दर्जे की पहचान रखने वाले इस बूरे को प्रधानमंत्री के जिक्र ने सोशल मीडिया की सुर्खियों में ला दिया है। इसकी बुनियाद वर्ष 1956 में लाला नरसिंह ने 10 गुणा 10 फीट के एक खोखे में रखी थी। उन्होंने पारंपरिक तरीके से बूरा बनाना शुरू किया।
धीरे-धीरे मिठास की गाड़ी चल निकली। कारोबार को बेटे लाला पुरुषोत्तम दास ने संभाला। नए प्रयोग किए लेकिन गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। इससे बूरे को नई बुलंदी मिली।
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आज यह बूरा रोहतक रोड स्थित फैक्टरी में तैयार हो रहा है। लाला पुरुषोत्तम दास बताते हैं कि आज भी वह पारंपरिक तरीके से ही बूरा तैयार कराते हैं। चीनी को उबालकर उसका मैल हटाते हैं। विशेष अनुपात में चाशनी तैयार करके उसकी लगातार कुटाई की जाती है।
यह बूरा अपनी खास मिठास और स्वाद के कारण बाजार में खास अहमियत रखता है। उनके मुताबिक, यह सिर्फ खाद्य उत्पाद नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक और व्यावसायिक विरासत का प्रतीक बन चुका है।
त्योहारी सीजन में सामान्य दिनों के मुुकाबले बूरे की मांग चार-पांच गुना हो जाती है। लाला पुरुषोत्तम दास बताते हैं कि हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बूरे की आपूर्ति करते हैं। संवाद
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स्वाद गली में हमेशा ही आला-दर्जे की पहचान रखने वाले इस बूरे को प्रधानमंत्री के जिक्र ने सोशल मीडिया की सुर्खियों में ला दिया है। इसकी बुनियाद वर्ष 1956 में लाला नरसिंह ने 10 गुणा 10 फीट के एक खोखे में रखी थी। उन्होंने पारंपरिक तरीके से बूरा बनाना शुरू किया।
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धीरे-धीरे मिठास की गाड़ी चल निकली। कारोबार को बेटे लाला पुरुषोत्तम दास ने संभाला। नए प्रयोग किए लेकिन गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। इससे बूरे को नई बुलंदी मिली।
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आज यह बूरा रोहतक रोड स्थित फैक्टरी में तैयार हो रहा है। लाला पुरुषोत्तम दास बताते हैं कि आज भी वह पारंपरिक तरीके से ही बूरा तैयार कराते हैं। चीनी को उबालकर उसका मैल हटाते हैं। विशेष अनुपात में चाशनी तैयार करके उसकी लगातार कुटाई की जाती है।
यह बूरा अपनी खास मिठास और स्वाद के कारण बाजार में खास अहमियत रखता है। उनके मुताबिक, यह सिर्फ खाद्य उत्पाद नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक और व्यावसायिक विरासत का प्रतीक बन चुका है।
त्योहारी सीजन में सामान्य दिनों के मुुकाबले बूरे की मांग चार-पांच गुना हो जाती है। लाला पुरुषोत्तम दास बताते हैं कि हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बूरे की आपूर्ति करते हैं। संवाद