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शिक्षा जीवन जीने की कला सिखाती है, पुस्तकों तक सीमित नहीं : राजेश वशिष्ठ
Mon, 11 May 2026 03:18 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Mon, 11 May 2026 03:18 AM IST
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10जेएनडी03: खेल - खेल में शिक्षा ग्रहण करते बच्चे। स्रोत संस्थान
जींद। मौलिक शिक्षा विभाग की ओर से संचालित क्लास रेडिनेस प्रोग्राम विद्यार्थियों की शैक्षणिक दक्षता को सुधार रहा है। उनमें नैतिक, चारित्रिक और सामाजिक मूल्यों का भी समावेश हो रहा है। जिला समन्वयक एफएलएन राजेश वशिष्ठ ने बताया कि यह पहल उन बच्चों के लिए है जो किसी कारणवश सीखने की दौड़ में पिछड़ गए थे।
बताया कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं बल्कि जीवन के मूल्यों से परिचित कराना है। स्कूलों में अध्यापक बच्चों को सामाजिक परिवेश की जानकारी देते हुए उनमें अनुशासन, सहयोग और सहानुभूति जैसे गुणों का विकास कर रहे हैं।
कार्यक्रम के तहत खेल-खेल में शिक्षा की पद्धति अपनाई गई है ताकि बच्चे बिना किसी मानसिक दबाव के ज्ञान अर्जित कर सकें। अध्यापक बच्चों की कमजोरियों को पहचान कर विशेष गतिविधियों के माध्यम से उन्हें दूर कर रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस और शिक्षक दिवस जैसे अवसरों पर आयोजित प्रतियोगिताओं से बच्चों में नेतृत्व क्षमता और प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ रही है।
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वशिष्ठ ने कहा कि बच्चे मिट्टी के समान हैं और शिक्षक उन्हें संस्कारित नागरिक के रूप में ढाल रहे हैं। रटने की प्रवृत्ति को खत्म कर स्वयं करके सीखने के सिद्धांत पर बल दिया जा रहा है। अब बच्चे केवल अंकों की दौड़ में नहीं हैं बल्कि बेहतर इंसान बनने की राह पर अग्रसर हैं।
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बताया कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं बल्कि जीवन के मूल्यों से परिचित कराना है। स्कूलों में अध्यापक बच्चों को सामाजिक परिवेश की जानकारी देते हुए उनमें अनुशासन, सहयोग और सहानुभूति जैसे गुणों का विकास कर रहे हैं।
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कार्यक्रम के तहत खेल-खेल में शिक्षा की पद्धति अपनाई गई है ताकि बच्चे बिना किसी मानसिक दबाव के ज्ञान अर्जित कर सकें। अध्यापक बच्चों की कमजोरियों को पहचान कर विशेष गतिविधियों के माध्यम से उन्हें दूर कर रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस और शिक्षक दिवस जैसे अवसरों पर आयोजित प्रतियोगिताओं से बच्चों में नेतृत्व क्षमता और प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ रही है।
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वशिष्ठ ने कहा कि बच्चे मिट्टी के समान हैं और शिक्षक उन्हें संस्कारित नागरिक के रूप में ढाल रहे हैं। रटने की प्रवृत्ति को खत्म कर स्वयं करके सीखने के सिद्धांत पर बल दिया जा रहा है। अब बच्चे केवल अंकों की दौड़ में नहीं हैं बल्कि बेहतर इंसान बनने की राह पर अग्रसर हैं।