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भरत ने राजपाट नहीं, भाई का अधिकार चुना : मधुरेश दास

Mon, 05 Oct 2026 12:09 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Mon, 05 Oct 2026 12:09 AM IST
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Bharat chose his brother's right, not the throne: Madhuresh Das
04जेएनडी22: श्रीरामायण पाठ में शामिल श्रद्धालुगण। स्रोत: आयोजक
सफीदों। गुरुद्वारा गली स्थित श्री शिव शक्ति कृपा मंदिर में चल रहे सामूहिक संगीतमय श्री रामायण पाठ महोत्सव में अयोध्या से पहुंचे कथा व्यास मधुरेश दास महाराज ने भरत मिलाप का भावपूर्ण प्रसंग सुनाया। श्रीराम और भरत के त्याग, प्रेम और कर्तव्य की कथा सुन श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए और मंदिर परिसर जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा।
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कथा व्यास ने कहा कि रामायण में भरत का चरित्र निस्वार्थ प्रेम, त्याग और भाईचारे की अनुपम मिसाल है। श्रीराम के वनवास जाने और महाराज दशरथ के निधन का समाचार मिलने के बाद भरत ने राजगद्दी स्वीकार करने के बजाय बड़े भाई को वापस अयोध्या लाने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि भरत के सामने राजपाट था, लेकिन उनके मन में सत्ता का मोह नहीं था।
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मधुरेश दास महाराज ने बताया कि वन में श्रीराम और भरत का मिलन दोनों भाइयों के प्रेम की गहराई को दर्शाता है। भरत ने श्रीराम से अयोध्या लौटकर राजकाज संभालने का आग्रह किया, लेकिन श्रीराम ने पिता के वचन और अपनी मर्यादा को सर्वोच्च मानते हुए वनवास पूरा करने का निर्णय लिया। श्रीराम के अयोध्या लौटने से इनकार करने पर भरत ने उनकी खड़ाऊं मांगी। श्रीराम ने खड़ाऊं उन्हें सौंप दीं। भरत उन्हें अयोध्या लेकर लौटे और राजसिंहासन पर स्थापित कर स्वयं को श्रीराम का प्रतिनिधि मानकर राज्य का संचालन किया। उन्होंने कहा कि आज जब अधिकार और भौतिक सुख की दौड़ तेज है, तब भरत का जीवन समाज को त्याग और कर्तव्य का रास्ता दिखाता है। रामायण के प्रसंगों को केवल सुनने के बजाय उनके जीवन मूल्यों को व्यवहार में उतारना चाहिए। परिवार में प्रेम, बड़ों का सम्मान और रिश्तों में त्याग की भावना ही समाज को मजबूत बनाती है।
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