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Jind News: संतुलित उर्वरक उपयोग से सुधरेगी मिट्टी की सेहत
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21जेएनडी03: किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग एवं मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन विषय पर जागरूक करते हुए
जींद। खरकभूरा गांव में वीरवार को कृषि विज्ञान केंद्र पांडु पिंडारा की ओर से संतुलित उर्वरक उपयोग एवं मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन विषय पर किसान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में किसानों को मिट्टी की सेहत सुधारने, उर्वरकों के संतुलित प्रयोग और टिकाऊ खेती के वैज्ञानिक तरीके बताए गए।
कार्यक्रम का नेतृत्व जिला विस्तार विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) डॉ. धीरज पंघाल ने किया। उन्होंने बताया कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है। इससे उत्पादन लागत बढ़ रही है और भूमि की गुणवत्ता भी खराब हो रही है।उन्होंने किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह दी।
डॉ. पंघाल ने कहा कि संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग बेहतर उत्पादन का आधार है। उन्होंने किसानों को 4 आर सिद्धांत की जानकारी दी। इसमें सही उर्वरक स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही विधि से उर्वरक प्रयोग करने पर जोर दिया गया। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक तरीके अपनाने से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।
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गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और फसल अवशेषों के उपयोग के फायदे बताए
उन्होंने किसानों को गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और फसल अवशेषों के उपयोग के फायदे भी बताए। उन्होंने कहा कि जैविक स्रोतों से मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ती है। इससे जल धारण क्षमता बेहतर होती है और लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय रहते हैं। डॉ. पंघाल ने कहा कि ढैंचा जैसी फसलें मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और नत्रजन स्थिरीकरण में मदद करती हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और मृदा स्वास्थ्य सुधरता है।
पराली न जलाएं और खेत में मिलाएं
इंजीनियर रवि ने कहा कि पराली जलाने के बजाय खेत में मिलानी चाहिए। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। उन्होंने आधुनिक कृषि यंत्रों और अवशेष प्रबंधन तकनीकों की भी जानकारी दी। कृषि पर्यवेक्षक अनवर ने किसानों को सरकारी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने प्राकृतिक खेती, मृदा परीक्षण, कृषि यंत्रीकरण और फसल अवशेष प्रबंधन योजनाओं का लाभ लेने के लिए प्रेरित किया।
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कार्यक्रम का नेतृत्व जिला विस्तार विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) डॉ. धीरज पंघाल ने किया। उन्होंने बताया कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है। इससे उत्पादन लागत बढ़ रही है और भूमि की गुणवत्ता भी खराब हो रही है।उन्होंने किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह दी।
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डॉ. पंघाल ने कहा कि संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग बेहतर उत्पादन का आधार है। उन्होंने किसानों को 4 आर सिद्धांत की जानकारी दी। इसमें सही उर्वरक स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही विधि से उर्वरक प्रयोग करने पर जोर दिया गया। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक तरीके अपनाने से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।
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गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और फसल अवशेषों के उपयोग के फायदे बताए
उन्होंने किसानों को गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और फसल अवशेषों के उपयोग के फायदे भी बताए। उन्होंने कहा कि जैविक स्रोतों से मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ती है। इससे जल धारण क्षमता बेहतर होती है और लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय रहते हैं। डॉ. पंघाल ने कहा कि ढैंचा जैसी फसलें मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और नत्रजन स्थिरीकरण में मदद करती हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और मृदा स्वास्थ्य सुधरता है।
पराली न जलाएं और खेत में मिलाएं
इंजीनियर रवि ने कहा कि पराली जलाने के बजाय खेत में मिलानी चाहिए। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। उन्होंने आधुनिक कृषि यंत्रों और अवशेष प्रबंधन तकनीकों की भी जानकारी दी। कृषि पर्यवेक्षक अनवर ने किसानों को सरकारी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने प्राकृतिक खेती, मृदा परीक्षण, कृषि यंत्रीकरण और फसल अवशेष प्रबंधन योजनाओं का लाभ लेने के लिए प्रेरित किया।