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Jhajjar-Bahadurgarh News: क्रांतिकारी अमर शहीद करतार सिंह सराभा को किया याद
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फोटो 53 : करतार सिंह सराभा के शहादत दिवस पर हुए कार्यक्रम में विचार रखते। स्रोत समिति
बहादुरगढ़। शहीद यादगार कमेटी ने आजादी आंदोलन के क्रांतिकारी अमर शहीद करतार सिंह सराभा के 110वें शहादत दिवस को श्रद्धा के साथ मनाया। कार्यकर्ताओं ने चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। कमेटी सदस्य रिटायर्ड डीएफओ सतबीर सिंह दहिया ने बताया कि मात्र 19 साल की उम्र में फांसी के फंदे पर चढ़ने से पहले सराभा ने लाहौर की जेल की दीवारों पर लिखा था कि ‘शहीदों का खून व्यर्थ नहीं जाता’।
करतार सिंह सराभा अमेरिका पढ़ने के लिए गए थे। जब वहां गदर पार्टी का गठन हुआ तो शीघ्र ही वे इसके अग्रणी क्रांतिकारी के रूप में आगे आए और आंदोलनकारियों के साथ भारत वापस आकर पंजाब में सशस्त्र संग्राम में जुट गए।
1913 से 1915 तक यह आंदोलन पूरे पंजाब में फैल गया।अंग्रेज सरकार ने करतार सिंह सराभा समेत क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। कईयों को तोप से उड़ा दिया गया तो कुछ को काला पानी की सजा दी गई। करतार सिंह सराभा और उनके 6 साथियों को फांसी की सजा दी गई। 16 नवम्बर 1915 को उन्होंने हंसते हुए फांसी के फंदे को गले लगाया।
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उन्होंने कहा शहीद करतार सिंह सराभा की कुर्बानियां आज भी समाज के सामने अनेक सवाल खड़े करती हैं। अंग्रेजी शासन के जिस शोषण जुल्म अत्याचार के खिलाफ वे लड़े थे आजादी के इतने सालों बाद भी देश की जनता को उनसे मुक्ति क्यों नहीं मिली। देश का हर तबका किसान-मजदूर, छात्र-नौजवान, महिलाएं क्यों पूंजीवादी शासन-शोषण की चक्की में पिसने के लिए मजबूर हैं।
श्रद्धांजलि सभा में प्रो. जगदीश राहड, धर्मप्रकाश, एडवोकेट हरबीर सिंह राठी, धनराज तहलान, रिटायर्ड प्रिंसिपल शारदा दीक्षित, एडवोकेट उम्मेद सिंह दहिया, बिजेंद्र सिंह सैनी, महाबीर सिंह नीलवाल, सुमेश कौशिक, जयकरण मांडौठी, कृष्ण कुमार अहलावत, रामकिशन तथा कई अन्य वक्ताओं ने शहीद करतार सिंह सराभा के जीवन संघर्षों पर प्रकाश डाला।
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करतार सिंह सराभा अमेरिका पढ़ने के लिए गए थे। जब वहां गदर पार्टी का गठन हुआ तो शीघ्र ही वे इसके अग्रणी क्रांतिकारी के रूप में आगे आए और आंदोलनकारियों के साथ भारत वापस आकर पंजाब में सशस्त्र संग्राम में जुट गए।
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1913 से 1915 तक यह आंदोलन पूरे पंजाब में फैल गया।अंग्रेज सरकार ने करतार सिंह सराभा समेत क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। कईयों को तोप से उड़ा दिया गया तो कुछ को काला पानी की सजा दी गई। करतार सिंह सराभा और उनके 6 साथियों को फांसी की सजा दी गई। 16 नवम्बर 1915 को उन्होंने हंसते हुए फांसी के फंदे को गले लगाया।
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उन्होंने कहा शहीद करतार सिंह सराभा की कुर्बानियां आज भी समाज के सामने अनेक सवाल खड़े करती हैं। अंग्रेजी शासन के जिस शोषण जुल्म अत्याचार के खिलाफ वे लड़े थे आजादी के इतने सालों बाद भी देश की जनता को उनसे मुक्ति क्यों नहीं मिली। देश का हर तबका किसान-मजदूर, छात्र-नौजवान, महिलाएं क्यों पूंजीवादी शासन-शोषण की चक्की में पिसने के लिए मजबूर हैं।
श्रद्धांजलि सभा में प्रो. जगदीश राहड, धर्मप्रकाश, एडवोकेट हरबीर सिंह राठी, धनराज तहलान, रिटायर्ड प्रिंसिपल शारदा दीक्षित, एडवोकेट उम्मेद सिंह दहिया, बिजेंद्र सिंह सैनी, महाबीर सिंह नीलवाल, सुमेश कौशिक, जयकरण मांडौठी, कृष्ण कुमार अहलावत, रामकिशन तथा कई अन्य वक्ताओं ने शहीद करतार सिंह सराभा के जीवन संघर्षों पर प्रकाश डाला।