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Jhajjar-Bahadurgarh News: तीन साल तक मां ने खुद इलाज किया तो मेहनत रंग लाई
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: सिल्वर मेडल जीत की खुशी में ढोल की थाप पर नाचते परिजन।
बहादुरगढ़। बहादुरगढ़ के मांडोठी गांव के रहने वाले पैरालंपिक खिलाड़ी योगेश कथूनिया ने पेरिस में हुए खेलों में रजत पदक हासिल किया है। उसकी जीत पर बहादुरगढ़ में खुशी का माहौल है।
योगेश का जन्म 3 मार्च 1997 को बहादुरगढ़ में हुआ था। मां मीना देवी ने बताया कि योगेश जब 8 साल के थे तो उन्हें लकवा लग गया था। जिसके चलते उनके हाथ और पैरों ने काम करना बंद कर दिया था। वह गिलियन-बैरे सिंड्रोम नाम की बीमारी का शिकार हो गए थे। इसके बाद उनका परिजनों ने देश के अलग-अलग अस्पतालों में इलाज कराया और कुछ समय बाद उनके हाथों ने काम करना शुरू कर दिया, लेकिन पैरों में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला। इस दौरान उन्होंने फिजियोथेरेपी सीखी और तीन साल तक अपने बेटे का खुद इलाज किया। इसके बाद उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने 12 साल की उम्र में फिर से चलने के लिए मांसपेशियों की ताकत हासिल कर ली।
योगेश ने चंडीगढ़ में इंडियन आर्मी पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की है। यहां से उन्होंने डिस्कस थ्रो और ज्वेलियन थ्रो खेलना शुरू किया। फिर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से वाणिज्य में स्नातक की डिग्री हासिल की और पैरा गेम्स में शामिल हो गए। यहीं से उनका करिअर आगे बढ़ता चला गया। योगेश ने वर्ष 2018 में पंचकूला में हुई नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड और बर्लिन में हुए विश्व पैरा एथलेटिक्स यूरोपीय चैंपियनशिप में डिस्क को 45.18 मीटर तक फेंककर एफ-36 श्रेणी में विश्व रिकार्ड बनाया था। कथूनिया ने वर्ष 2020 ग्रीष्मकालीन पैरालंपिक में पुरुषों की डिस्कस थ्रो एफ-56 में भारत का प्रतिनिधित्व किया और रजत पदक हासिल किया। नवंबर 2021 में भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कथूनिया को 2020 में रजत पदक जीतने पर अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया था।
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योगेश का जन्म 3 मार्च 1997 को बहादुरगढ़ में हुआ था। मां मीना देवी ने बताया कि योगेश जब 8 साल के थे तो उन्हें लकवा लग गया था। जिसके चलते उनके हाथ और पैरों ने काम करना बंद कर दिया था। वह गिलियन-बैरे सिंड्रोम नाम की बीमारी का शिकार हो गए थे। इसके बाद उनका परिजनों ने देश के अलग-अलग अस्पतालों में इलाज कराया और कुछ समय बाद उनके हाथों ने काम करना शुरू कर दिया, लेकिन पैरों में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला। इस दौरान उन्होंने फिजियोथेरेपी सीखी और तीन साल तक अपने बेटे का खुद इलाज किया। इसके बाद उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने 12 साल की उम्र में फिर से चलने के लिए मांसपेशियों की ताकत हासिल कर ली।
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योगेश ने चंडीगढ़ में इंडियन आर्मी पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की है। यहां से उन्होंने डिस्कस थ्रो और ज्वेलियन थ्रो खेलना शुरू किया। फिर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से वाणिज्य में स्नातक की डिग्री हासिल की और पैरा गेम्स में शामिल हो गए। यहीं से उनका करिअर आगे बढ़ता चला गया। योगेश ने वर्ष 2018 में पंचकूला में हुई नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड और बर्लिन में हुए विश्व पैरा एथलेटिक्स यूरोपीय चैंपियनशिप में डिस्क को 45.18 मीटर तक फेंककर एफ-36 श्रेणी में विश्व रिकार्ड बनाया था। कथूनिया ने वर्ष 2020 ग्रीष्मकालीन पैरालंपिक में पुरुषों की डिस्कस थ्रो एफ-56 में भारत का प्रतिनिधित्व किया और रजत पदक हासिल किया। नवंबर 2021 में भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कथूनिया को 2020 में रजत पदक जीतने पर अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया था।
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