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चांदनी रातों में अब चौपालों में नहीं गूंजते होली के वो गीत...
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अमर उजाला ब्यूरो
चरखी दादरी। होली ए, होली तेरा लांबा टीका, लांबी डस की डोरी...जैैसे गीतों की चौपालों में अब गूंज सुनाई नहीं देती। पहले जो होली पर्व का लोगों में चाव था वो अब खत्म होता जा रहा है। साल दर साल पुराने रीति-रिवाज को भुलाकर लोग माडर्न सोच के साथ होली मना रहे हैं। होली पर्व को लेकर यह कहना है जिले की कुछ बुजुर्ग महिलाओं का। अमर उजाला से बातचीत में इन महिलाओं का कहना है कि आज होली पर्व मनाने के तौर-तरीके ही बदल गए हैं।
महिलाओं का कहना है कि पुराने समय में तो फाग का माह शुरू होते ही होली उत्सव शुरू हो जाता था। महिला फाग की चांदनी रात्रि में होली पर विभिन्न खेल करती थी। गांव के मेन चौक, चौपाल आदि में एकत्र होकर महिलाएं होली के गीत गाती थी। होली गीतों में महिलाएं अपने परिजनों के नाम लेकर मंगलकामना करतीं थीं। होली हे, होली तेरा लांबा टीका, लांबा डस की डोरी गीत सबसे लोकप्रिय होता था। इस गीत को महिलाएं रात के समय समूह में बैठकर गाती थी। रात के समय चौक में लड़कियां एकत्र होकर फेरी लगाती थी और लूर डालती थीं। महिलाओं का कहना है कि मौजूदा फाग माह में गलियां सूनी रहती हैं। गांवों की गलियों व चौक में होली के गीतों की गूंज लुप्त हो गई है। गांव मिसरी सावित्री देवी का कहना है कि आज त्योहारों पर खानपान में भी बदलाव आ गया है। आपसी प्रेमभाव एवं स्नेह नहीं रहा। समाज में आपसी द्वेष एवं ईर्ष्या भाव बढ़ा है जबकि हमें आपस में प्रेमपूर्वक मिल-जुलकर रहना चाहिए।
फाग माह की रौनक हुई गायब
1 आज होली पर्व पर पहले जैसी उमंग नहीं रही। सब कुछ बदल गया है। फाग का महीना शुरू होते ही गांव की गलियों एवं चौक में महिलाएं रात्रि को होली के गीत गाती थी। जवान लड़कियां भी चौक में होली खेला करती थी। आज सब कुछ बदल गया है। - बुजुर्ग सावित्री देवी, मिसरी
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2. आज तो जमाना पूरा ही बदल गया है। पहले लोगों में आपसी स्नेह एवं लगाव था लेकिन आज व्यक्ति अपने हितों तक सीमित रह गया है। पहले होली मनाने का तरीका हरियाणा की संस्कृति पर आधारित था। आज लोगों की सोच एवं मानसिकता ही बदल गई है। - मीना देवी, पुराना शहर
3. आज होली के रंगीले एवं हरियाणवी गीत गलियों और चौपालों में नहीं गूंजते। उनके समय तो फागण शुरू होते ही मस्ती का दौर शुरू हो जाता था। रात के समय महिलाएं होली खेलती थी आज होली पर्व की रिवाज आदि सब गायब हो गई हैं। - पूर्व पार्षद धर्मा देवी, वार्ड 20
4. फागण का मस्त महीना माना जाता था लेकिन आज इस पर्व को लेकर महिला एवं पुरुष दोनो में ही नीरसता है। पुराने जमाने में होली त्योहार ही ऐसा होता था जो पूरे एक माह तक मनाया जाता था लेकिन आज होली दो दिन का त्योहार बनकर रह गया है उसमें भी पहले जितना मिठास, स्नेह एवं आपसी प्रेमभाव नहीं रहा। शकुंतला देवी, महराणा
5. म्हारे टैम म्ह तो कोरड़ा से फाग खेलते थे। फाग के दिन चौक में कढ़ाई में पानी डालकर लोग-लुगाई इक्ट्ठे होली खेलते थे। गांव की छोरियां गीत गाते सिर पर पानी लाकर कढ़ाई को भरतीं थीं। कढ़ाई पर होली खेलने के बाद प्रसाद यानी शक्कर व पतासा बांटा जाता था। आज समाज में वैरभाव बढ़ा है। आपसी प्रेमभाव नहीं रहा। 80 वर्षीय मायाकौर, इमलोटा
6. वसंत पंचमी के दिन होलिका बनने के बाद से ही होली की धूम शुरू हो जाती थी। फाग पर बूढ़ी लुगाई हो या लोग हर कोई मस्ती में होता था। फाग के दौरान अगर कोई रिश्तेदार आ जाता था तो महिलाएं कोरड़ा मारकर उससे गुड़ की भेली मांगती थी लेकिन आज युवा अपनी संस्कृति को भूल गए हैं। रोशनी देवी, वार्ड तीन
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चरखी दादरी। होली ए, होली तेरा लांबा टीका, लांबी डस की डोरी...जैैसे गीतों की चौपालों में अब गूंज सुनाई नहीं देती। पहले जो होली पर्व का लोगों में चाव था वो अब खत्म होता जा रहा है। साल दर साल पुराने रीति-रिवाज को भुलाकर लोग माडर्न सोच के साथ होली मना रहे हैं। होली पर्व को लेकर यह कहना है जिले की कुछ बुजुर्ग महिलाओं का। अमर उजाला से बातचीत में इन महिलाओं का कहना है कि आज होली पर्व मनाने के तौर-तरीके ही बदल गए हैं।
महिलाओं का कहना है कि पुराने समय में तो फाग का माह शुरू होते ही होली उत्सव शुरू हो जाता था। महिला फाग की चांदनी रात्रि में होली पर विभिन्न खेल करती थी। गांव के मेन चौक, चौपाल आदि में एकत्र होकर महिलाएं होली के गीत गाती थी। होली गीतों में महिलाएं अपने परिजनों के नाम लेकर मंगलकामना करतीं थीं। होली हे, होली तेरा लांबा टीका, लांबा डस की डोरी गीत सबसे लोकप्रिय होता था। इस गीत को महिलाएं रात के समय समूह में बैठकर गाती थी। रात के समय चौक में लड़कियां एकत्र होकर फेरी लगाती थी और लूर डालती थीं। महिलाओं का कहना है कि मौजूदा फाग माह में गलियां सूनी रहती हैं। गांवों की गलियों व चौक में होली के गीतों की गूंज लुप्त हो गई है। गांव मिसरी सावित्री देवी का कहना है कि आज त्योहारों पर खानपान में भी बदलाव आ गया है। आपसी प्रेमभाव एवं स्नेह नहीं रहा। समाज में आपसी द्वेष एवं ईर्ष्या भाव बढ़ा है जबकि हमें आपस में प्रेमपूर्वक मिल-जुलकर रहना चाहिए।
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फाग माह की रौनक हुई गायब
1 आज होली पर्व पर पहले जैसी उमंग नहीं रही। सब कुछ बदल गया है। फाग का महीना शुरू होते ही गांव की गलियों एवं चौक में महिलाएं रात्रि को होली के गीत गाती थी। जवान लड़कियां भी चौक में होली खेला करती थी। आज सब कुछ बदल गया है। - बुजुर्ग सावित्री देवी, मिसरी
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2. आज तो जमाना पूरा ही बदल गया है। पहले लोगों में आपसी स्नेह एवं लगाव था लेकिन आज व्यक्ति अपने हितों तक सीमित रह गया है। पहले होली मनाने का तरीका हरियाणा की संस्कृति पर आधारित था। आज लोगों की सोच एवं मानसिकता ही बदल गई है। - मीना देवी, पुराना शहर
3. आज होली के रंगीले एवं हरियाणवी गीत गलियों और चौपालों में नहीं गूंजते। उनके समय तो फागण शुरू होते ही मस्ती का दौर शुरू हो जाता था। रात के समय महिलाएं होली खेलती थी आज होली पर्व की रिवाज आदि सब गायब हो गई हैं। - पूर्व पार्षद धर्मा देवी, वार्ड 20
4. फागण का मस्त महीना माना जाता था लेकिन आज इस पर्व को लेकर महिला एवं पुरुष दोनो में ही नीरसता है। पुराने जमाने में होली त्योहार ही ऐसा होता था जो पूरे एक माह तक मनाया जाता था लेकिन आज होली दो दिन का त्योहार बनकर रह गया है उसमें भी पहले जितना मिठास, स्नेह एवं आपसी प्रेमभाव नहीं रहा। शकुंतला देवी, महराणा
5. म्हारे टैम म्ह तो कोरड़ा से फाग खेलते थे। फाग के दिन चौक में कढ़ाई में पानी डालकर लोग-लुगाई इक्ट्ठे होली खेलते थे। गांव की छोरियां गीत गाते सिर पर पानी लाकर कढ़ाई को भरतीं थीं। कढ़ाई पर होली खेलने के बाद प्रसाद यानी शक्कर व पतासा बांटा जाता था। आज समाज में वैरभाव बढ़ा है। आपसी प्रेमभाव नहीं रहा। 80 वर्षीय मायाकौर, इमलोटा
6. वसंत पंचमी के दिन होलिका बनने के बाद से ही होली की धूम शुरू हो जाती थी। फाग पर बूढ़ी लुगाई हो या लोग हर कोई मस्ती में होता था। फाग के दौरान अगर कोई रिश्तेदार आ जाता था तो महिलाएं कोरड़ा मारकर उससे गुड़ की भेली मांगती थी लेकिन आज युवा अपनी संस्कृति को भूल गए हैं। रोशनी देवी, वार्ड तीन