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पढ़ाई के साथ पशुपालन कर कमा रहे लाखों
Updated Sun, 29 Oct 2017 01:38 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
झज्जर।
समय के साथ दिन प्रतिदिन पशुपालन फायदे का सौदा बनता जा रहा है। गाय व भैंस पालने के कार्य से आगे जाते हुए अब प्रदेश के लोग घोड़ा, बकरी-भेड़ और सूअर पालन में भी हाथ आजमा रहे हैं और उन्हें लाखों रुपये का मुनाफा हो रहा है। झज्जर में चल रहे स्वर्ण जयंती राज्य पशुधन प्रदर्शनी के आयोजन में आये पशुपालकों से अमर उजाला की टीम ने बातचीत करके इस व्यवसाय की बारीकियों को जाना, तो पता चला कि पशुपालन में मुनाफा ही मुनाफा है, नुकसान की संभावना न के बराबर है।
इस आयोजन में पूरे हरियाणा से भैंस, सांड, गाय, बैल, घोडे़, शुकर, ऊंट, भेड़, बकरी और मींढे पालने वाले पशुपालक आए हुए हैं। इन पशुपालकों में अनपढ़ और स्कूल पढ़ाई कर रहे युवकों सहित एमबीए कर रहे लोग भी शामिल हैं। इन लोगों में पशुओं की ब्रिडिंग करने वालों की भी कोई कमी नहीं है।
एमबीए युवक पाल रहा है शहंशाह
आयोजन में आए पशु भी किसी लिहाज से कम नहीं हैं। इन पशुओं की कीमत सुनकर अच्छे-अच्छों को झटका लग सकता है। पानीपत जिला के डिडवाडी गांव के सांड की 25 करोड़ कीमत लग चुकी है। फरीदाबाद में हुए कृषि सम्मेलन से कुछ दिन पहले आंध्र प्रदेश के पशुपालक वी राजू ने इस शहंशाह नाम के सांड पर 25 करोड़ रुपये लगा दिए थे। खास बात यह है कि लगभग साढे़ चार साल के शहंशाह को पालने वालों में एमबीए कर रहा नवीन नाम का युवक भी शामिल है, जो अपने पिता सुरेंद्र सिंह का पशुपालन में हाथ बंटाता है। नवीन ने बातचीत के दौरान बताया कि शहंशाह के सिमन से प्रतिमाह लगभग डेढ़ लाख रुपये कमा लेते हैं। नवीन और उनका परिवार भैंस और सांड पालते हैं। उन्होंने कहा कि पहले के मुकाबले अब पशुपालन में काफी बदलाव आया है और इसमें अब तकनीक भी प्रयोग होने लगी हैं।
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सुअर पालन से कमा रहे सालाना 12 लाख
सुअर पालन भी लोगों को अब आकर्षित करने लगा है और लोग इससे अच्छी कमाई कर रहे हैं। झज्जर जिला के बीड़ गांव के रहने वाले धीरेंद्र गहलोत विदेशों तक सुअरों की सप्लाई करते हैं। बारहवीं तक पढ़े धीरेंद्र ने बताया कि लगभग 10 साल पहले उन्होंने सुअर पालन शुरू किया था और आज वे प्रतिमाह एक लाख रुपये के करीब कमा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सुअर पालन लगभग 200 गज जमीन पर भी शुरू किया जा सकता है और इसके लिए सरकार की ओर से अनुदान भी मिलता है। उन्होंने 2009 में बरेली के इंडियन वेटनरी रिसर्च इंस्टीच्यूट से प्रशिक्षण लेकर काम शुरू किया था और अब सरकार की ओर से हर महीने चिकित्सक भी उनके फार्म पर आकर सुअरों की जांच करते हैं। इस व्यवसाय में मार्केटिंग की भी जरूरत नहीं होती है। ग्राहक भी फार्म पर आते हैं।
शौक के साथ कमाई दे रहा घोड़ा पालन
बहादुरगढ़ के बामड़ोली गांव के अमित के नुकरा नस्ल के लगभग 22 महीने के घोड़े के बच्चे की सुंदरता को देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो रहा है। सफेद रंग का यह बच्चा देखने लायक है और अमित ने इसको 11 लाख रुपये में खरीदा था, जिस पर अब 37 लाख रुपये लग चुके हैं। अमित खुद स्नातक हैं और लगभग दस साल से उनका परिवार पशुपालन के व्यवसाय में है। महेंद्रगढ़ के खायरा गांव के कंवरपाल घोड़े की ब्रीडिंग का काम करते हैं और उनकी घोड़ी वीरा जयपुर शो में पहला इनाम जीत चुकी है और उसकी 31 लाख रुपये कीमत लग चुकी है। कंवरपाल भी स्नातक हैं और कई सालों से इस व्यवसाय में हैं। अमित और कंवरपाल ने बताया कि घोड़ा पालन बहुत अधिक फायदे का सौदा बनता जा रहा है और अब सरकार भी इसके लिए प्रोत्साहन देने लगी है। जोकि सराहनीय काम है।
वकालत की बजाए डेयरी चला रहे हैं अशोक
गांव इमलोटा के गाय पालक अशोक कलकल भी पशुपालन के मामले में किसी से पीछे नहीं हैं। उनके पास गीर नस्ल की बेहतरीन गाय हैं। इमलोटा गांव में गोकरण गो संवर्धन के नाम से डेयरी भी चलाते हैं। लगभग पांच साल पहले पशुपालन व्यवसाय में आए अशोक कलकल इससे पहले स्टोन क्रेशर का व्यवसाय भी कर चुके हैं और एलएलबी स्नातक हैं। अशोक बताते हैं कि उनकी गीर नस्ल की गाय 25 किलो दूध देती हैं और वे इस व्यवसाय से प्रतिमाह एक से डेढ़ लाख रुपये कमा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार विशेषकर ग्रामीण विकास मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए जो कमद उठाए हैं, उनसे वास्तव में पशुपालन की ओर लोगों का रुझान बढ़ा हैं और पशुपालकों की हालत में भी सुधार आया है।
- हर दिन पशुपालन की ओर आकर्षित हो रहे हैं लोग
- गाय, भैंस के साथ घोड़ा व सूकर पालन से हो रही अच्छी कमाई
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झज्जर।
समय के साथ दिन प्रतिदिन पशुपालन फायदे का सौदा बनता जा रहा है। गाय व भैंस पालने के कार्य से आगे जाते हुए अब प्रदेश के लोग घोड़ा, बकरी-भेड़ और सूअर पालन में भी हाथ आजमा रहे हैं और उन्हें लाखों रुपये का मुनाफा हो रहा है। झज्जर में चल रहे स्वर्ण जयंती राज्य पशुधन प्रदर्शनी के आयोजन में आये पशुपालकों से अमर उजाला की टीम ने बातचीत करके इस व्यवसाय की बारीकियों को जाना, तो पता चला कि पशुपालन में मुनाफा ही मुनाफा है, नुकसान की संभावना न के बराबर है।
इस आयोजन में पूरे हरियाणा से भैंस, सांड, गाय, बैल, घोडे़, शुकर, ऊंट, भेड़, बकरी और मींढे पालने वाले पशुपालक आए हुए हैं। इन पशुपालकों में अनपढ़ और स्कूल पढ़ाई कर रहे युवकों सहित एमबीए कर रहे लोग भी शामिल हैं। इन लोगों में पशुओं की ब्रिडिंग करने वालों की भी कोई कमी नहीं है।
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एमबीए युवक पाल रहा है शहंशाह
आयोजन में आए पशु भी किसी लिहाज से कम नहीं हैं। इन पशुओं की कीमत सुनकर अच्छे-अच्छों को झटका लग सकता है। पानीपत जिला के डिडवाडी गांव के सांड की 25 करोड़ कीमत लग चुकी है। फरीदाबाद में हुए कृषि सम्मेलन से कुछ दिन पहले आंध्र प्रदेश के पशुपालक वी राजू ने इस शहंशाह नाम के सांड पर 25 करोड़ रुपये लगा दिए थे। खास बात यह है कि लगभग साढे़ चार साल के शहंशाह को पालने वालों में एमबीए कर रहा नवीन नाम का युवक भी शामिल है, जो अपने पिता सुरेंद्र सिंह का पशुपालन में हाथ बंटाता है। नवीन ने बातचीत के दौरान बताया कि शहंशाह के सिमन से प्रतिमाह लगभग डेढ़ लाख रुपये कमा लेते हैं। नवीन और उनका परिवार भैंस और सांड पालते हैं। उन्होंने कहा कि पहले के मुकाबले अब पशुपालन में काफी बदलाव आया है और इसमें अब तकनीक भी प्रयोग होने लगी हैं।
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सुअर पालन से कमा रहे सालाना 12 लाख
सुअर पालन भी लोगों को अब आकर्षित करने लगा है और लोग इससे अच्छी कमाई कर रहे हैं। झज्जर जिला के बीड़ गांव के रहने वाले धीरेंद्र गहलोत विदेशों तक सुअरों की सप्लाई करते हैं। बारहवीं तक पढ़े धीरेंद्र ने बताया कि लगभग 10 साल पहले उन्होंने सुअर पालन शुरू किया था और आज वे प्रतिमाह एक लाख रुपये के करीब कमा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सुअर पालन लगभग 200 गज जमीन पर भी शुरू किया जा सकता है और इसके लिए सरकार की ओर से अनुदान भी मिलता है। उन्होंने 2009 में बरेली के इंडियन वेटनरी रिसर्च इंस्टीच्यूट से प्रशिक्षण लेकर काम शुरू किया था और अब सरकार की ओर से हर महीने चिकित्सक भी उनके फार्म पर आकर सुअरों की जांच करते हैं। इस व्यवसाय में मार्केटिंग की भी जरूरत नहीं होती है। ग्राहक भी फार्म पर आते हैं।
शौक के साथ कमाई दे रहा घोड़ा पालन
बहादुरगढ़ के बामड़ोली गांव के अमित के नुकरा नस्ल के लगभग 22 महीने के घोड़े के बच्चे की सुंदरता को देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो रहा है। सफेद रंग का यह बच्चा देखने लायक है और अमित ने इसको 11 लाख रुपये में खरीदा था, जिस पर अब 37 लाख रुपये लग चुके हैं। अमित खुद स्नातक हैं और लगभग दस साल से उनका परिवार पशुपालन के व्यवसाय में है। महेंद्रगढ़ के खायरा गांव के कंवरपाल घोड़े की ब्रीडिंग का काम करते हैं और उनकी घोड़ी वीरा जयपुर शो में पहला इनाम जीत चुकी है और उसकी 31 लाख रुपये कीमत लग चुकी है। कंवरपाल भी स्नातक हैं और कई सालों से इस व्यवसाय में हैं। अमित और कंवरपाल ने बताया कि घोड़ा पालन बहुत अधिक फायदे का सौदा बनता जा रहा है और अब सरकार भी इसके लिए प्रोत्साहन देने लगी है। जोकि सराहनीय काम है।
वकालत की बजाए डेयरी चला रहे हैं अशोक
गांव इमलोटा के गाय पालक अशोक कलकल भी पशुपालन के मामले में किसी से पीछे नहीं हैं। उनके पास गीर नस्ल की बेहतरीन गाय हैं। इमलोटा गांव में गोकरण गो संवर्धन के नाम से डेयरी भी चलाते हैं। लगभग पांच साल पहले पशुपालन व्यवसाय में आए अशोक कलकल इससे पहले स्टोन क्रेशर का व्यवसाय भी कर चुके हैं और एलएलबी स्नातक हैं। अशोक बताते हैं कि उनकी गीर नस्ल की गाय 25 किलो दूध देती हैं और वे इस व्यवसाय से प्रतिमाह एक से डेढ़ लाख रुपये कमा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार विशेषकर ग्रामीण विकास मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए जो कमद उठाए हैं, उनसे वास्तव में पशुपालन की ओर लोगों का रुझान बढ़ा हैं और पशुपालकों की हालत में भी सुधार आया है।
- हर दिन पशुपालन की ओर आकर्षित हो रहे हैं लोग
- गाय, भैंस के साथ घोड़ा व सूकर पालन से हो रही अच्छी कमाई