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जिले में नहीं शिशु नर्सरी नहीं, प्राइवेट अस्पतालों में जब ढीली कर रहे नवजात के परिजन
Updated Sun, 10 Jun 2018 12:48 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
चरखी दादरी।
एक तरफ सरकार शिशु मृत्यु दर को कम करने के समय -समय पर पोलियो और अन्य रोगों के टीकाकरण अभियानों पर करोड़ों रुपये का बजट खर्च कर रही है, वहीं जिले में शिशु नर्सरी का न होना इस पर सवालिया निशान है। जिले की करीब आठ लाख की आबादी पर एक भी शिशु नर्सरी नहीं है। शहर की करीब 70 हजार की आबादी के अलावा जिले में 172 गांव हैं।
जिले में शिशु नर्सरी न होने से जन्म के बाद विकट परिस्थितियों में शिशु का रख-रखाव ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। जिलावासियों को रोहतक पीजीआई या अन्य निजी अस्पतालों में बने शिशु नर्सरी की सेवाएं लेनी पड़ रही हैं। आज जन्म के बाद हर चौथे शिशु को नर्सरी में रखना पड़ रहा है। शिशुओं में पीलिया रोग की शिकायतें ज्यादा सामने आ रही हैं। कई बार समयावधि से पूर्व डिलीवरी होने पर तो एक डेढ़ माह तक शिशु को नर्सरी में रखने की जरूरत होती है। किसी निजी अस्पताल में एक सप्ताह के कोर्स पर करीब आठ से दस हजार रुपये खर्चा आता है।
जिले में 172 गांव हैं तथा शहर की आबादी भी करीब 70 हजार से ज्यादा है जबकि यहां सिविल अस्पतालों में शिशु नर्सरी नहीं होने से लोग काफी परेशान हैं। जिले के सामान्य अस्पताल में तो सामान्य डिलीवरी की ही सुविधा हैं। गंभीर मामला आने पर भिवानी या रोहतक भेज दिया जाता है। जिले में 12 सीएचसी केेंद्र के अलावा करीब एक दर्जन से ज्यादा पीएचसी केंद्र भी हैं। इसके अलावा नगर में 100 बेड का सिविल अस्पताल भी हैं लेकिन किसी भी अस्पताल में शिशु नर्सरी नहीं होने से कई बार परिजनों को विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। ऐसे में कई बार तो बच्चे जन्म लेने के बाद ही दम तोड़ देते हैं। जिससे जन्म और मृत्यु दर का संतुलन भी बिगड़ रहा है। शहर में इस समय एक ही निजी अस्पताल में शिशु नर्सरी की सुविधा है वह भी काफी मंहगी पड़ती है। कई बार इस नर्सरी में ज्यादा संख्या में शिशु रखने को जगह भी नहीं मिलती। सीमित संख्या में ही शिशु रखे जा सकते हैं ऐसे में परिजनों को रोहतक पीजीआई व अन्य जिला मुख्यालय पर शिशु को ले जाना पड़ता है जिससे परिजनों को काफी आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ता है।
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हर चौथा शिशु बीमारी से ग्रस्त
मौजूदा वातावरण में जन्म के बाद लगभग हर चौथा शिशु पीलिया और अन्य गंभीर रोगों से पीड़ित मिलता है। पीलिया रोग की ज्यादा शिकायतें आ रही है। मां के गर्भ में ही पीलिया रोग की शिकायत शुरू हो जाती है ऐसे में जन्म के बाद बाहरी प्राकृतिक वातावरण में प्रवेश करने पर यह रोग और भी जटिल होने लगता है ऐसे में शिशु को चिकित्सक के परामर्श के अनुसार एक निश्चित समय तक शिशु को नर्सरी में रखना आवश्यक हो जाता है।
समयावधि से पूर्व डिलीवरी में नर्सरी की जरूरत
कई बार जन्म लेने की समयावधि से पूर्व शिशु पैदा हो जाता है ऐसे में यह समयावधि पूरी होने तक शिशु को नर्सरी में रखना जरूरी हो जाता है। ऐसेे मामले भी ज्यादा संख्या में आ रहे हैं। शिशु नर्सरी में रखने के बाद शिशु का कृत्रिम तौर पर शारीरिक विकास होता रहता है। शिशु का पोषण नर्सरी में ही होता है। उसे सभी आवश्यक पौष्टिक खुराक नर्सरी के जरिए ही मिलती है। शिशु का मां से दूर रखना पड़ता है। नर्सरी में ही बच्चे की समय-समय पर विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा शारीरिक जांच की जाती है। चिकित्सकों की देखरेख में शिशु नर्सरी में बच्चे का पोषण होता है।
मैंने अभी कार्यभार संभाला है। हम जिला मुख्यालय अस्पताल में शुरू की जाने वाली सेवाओं की रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। जैसे-जैसे हमें संसाधन मिलेंगे, अस्पताल की सेवाओं में विस्तार कर देंगे। शिशु-नर्सरी भी हमारी प्लानिंग का हिस्सा है।
डॉ. जितेंद्र कादयान, सीएमओ
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चरखी दादरी।
एक तरफ सरकार शिशु मृत्यु दर को कम करने के समय -समय पर पोलियो और अन्य रोगों के टीकाकरण अभियानों पर करोड़ों रुपये का बजट खर्च कर रही है, वहीं जिले में शिशु नर्सरी का न होना इस पर सवालिया निशान है। जिले की करीब आठ लाख की आबादी पर एक भी शिशु नर्सरी नहीं है। शहर की करीब 70 हजार की आबादी के अलावा जिले में 172 गांव हैं।
जिले में शिशु नर्सरी न होने से जन्म के बाद विकट परिस्थितियों में शिशु का रख-रखाव ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। जिलावासियों को रोहतक पीजीआई या अन्य निजी अस्पतालों में बने शिशु नर्सरी की सेवाएं लेनी पड़ रही हैं। आज जन्म के बाद हर चौथे शिशु को नर्सरी में रखना पड़ रहा है। शिशुओं में पीलिया रोग की शिकायतें ज्यादा सामने आ रही हैं। कई बार समयावधि से पूर्व डिलीवरी होने पर तो एक डेढ़ माह तक शिशु को नर्सरी में रखने की जरूरत होती है। किसी निजी अस्पताल में एक सप्ताह के कोर्स पर करीब आठ से दस हजार रुपये खर्चा आता है।
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जिले में 172 गांव हैं तथा शहर की आबादी भी करीब 70 हजार से ज्यादा है जबकि यहां सिविल अस्पतालों में शिशु नर्सरी नहीं होने से लोग काफी परेशान हैं। जिले के सामान्य अस्पताल में तो सामान्य डिलीवरी की ही सुविधा हैं। गंभीर मामला आने पर भिवानी या रोहतक भेज दिया जाता है। जिले में 12 सीएचसी केेंद्र के अलावा करीब एक दर्जन से ज्यादा पीएचसी केंद्र भी हैं। इसके अलावा नगर में 100 बेड का सिविल अस्पताल भी हैं लेकिन किसी भी अस्पताल में शिशु नर्सरी नहीं होने से कई बार परिजनों को विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। ऐसे में कई बार तो बच्चे जन्म लेने के बाद ही दम तोड़ देते हैं। जिससे जन्म और मृत्यु दर का संतुलन भी बिगड़ रहा है। शहर में इस समय एक ही निजी अस्पताल में शिशु नर्सरी की सुविधा है वह भी काफी मंहगी पड़ती है। कई बार इस नर्सरी में ज्यादा संख्या में शिशु रखने को जगह भी नहीं मिलती। सीमित संख्या में ही शिशु रखे जा सकते हैं ऐसे में परिजनों को रोहतक पीजीआई व अन्य जिला मुख्यालय पर शिशु को ले जाना पड़ता है जिससे परिजनों को काफी आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ता है।
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हर चौथा शिशु बीमारी से ग्रस्त
मौजूदा वातावरण में जन्म के बाद लगभग हर चौथा शिशु पीलिया और अन्य गंभीर रोगों से पीड़ित मिलता है। पीलिया रोग की ज्यादा शिकायतें आ रही है। मां के गर्भ में ही पीलिया रोग की शिकायत शुरू हो जाती है ऐसे में जन्म के बाद बाहरी प्राकृतिक वातावरण में प्रवेश करने पर यह रोग और भी जटिल होने लगता है ऐसे में शिशु को चिकित्सक के परामर्श के अनुसार एक निश्चित समय तक शिशु को नर्सरी में रखना आवश्यक हो जाता है।
समयावधि से पूर्व डिलीवरी में नर्सरी की जरूरत
कई बार जन्म लेने की समयावधि से पूर्व शिशु पैदा हो जाता है ऐसे में यह समयावधि पूरी होने तक शिशु को नर्सरी में रखना जरूरी हो जाता है। ऐसेे मामले भी ज्यादा संख्या में आ रहे हैं। शिशु नर्सरी में रखने के बाद शिशु का कृत्रिम तौर पर शारीरिक विकास होता रहता है। शिशु का पोषण नर्सरी में ही होता है। उसे सभी आवश्यक पौष्टिक खुराक नर्सरी के जरिए ही मिलती है। शिशु का मां से दूर रखना पड़ता है। नर्सरी में ही बच्चे की समय-समय पर विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा शारीरिक जांच की जाती है। चिकित्सकों की देखरेख में शिशु नर्सरी में बच्चे का पोषण होता है।
मैंने अभी कार्यभार संभाला है। हम जिला मुख्यालय अस्पताल में शुरू की जाने वाली सेवाओं की रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। जैसे-जैसे हमें संसाधन मिलेंगे, अस्पताल की सेवाओं में विस्तार कर देंगे। शिशु-नर्सरी भी हमारी प्लानिंग का हिस्सा है।
डॉ. जितेंद्र कादयान, सीएमओ