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12 साल बाद घर से निकली और पा ली सफलता, 12 किताबें भी लिख डालीं
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अमर उजाला ब्यूरो
बहादुरगढ़। शादी हुई तो चूल्हा, चौका संभाला लेकिन अपने पढ़ाई के सपने को मन में हमेशा जीवंत रखा। तमाम मुश्किलों से उबरकर 12 साल बाद घर से निकली और फिर पढ़ाई में जुट गई। कल तक जो सपना था, उसे आज हकीकत में बदल लिया। जी हां, हम बात कर रहे हैं वैश्य बीएड कॉलेज की प्राचार्या डॉ. आशा शर्मा की, जो आज महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं। मूलत: जींद जिले के सफीदों की आशा शर्मा ने 1982 में महिला कॉलेज रोहतक से बीए की। 1983 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से बीएड किया। इसी दौरान 1984 में उनका विवाह हो गया। विवाह के बाद कारण पढ़ाई करना सरल नहीं रहा। ससुराल वाले नियमित पढ़ाई को लेकर अनमने थे। लिहाजा पढ़ाई का सिलसिला अधर में छूट गया। आशा शर्मा घर गृहस्थी में उलझ गई लेकिन मन में पढ़ाई का सपना जीवंत था।
ऐसे शुरू हुआ सफलता का सिलसिला
वर्षों तक आशा शर्मा अपने घरेलू कामकाज में लगी रहीं। इस बीच आशा को थायरायड बीमारी ने जकड़ लिया। चिकित्सक ने सलाह दी कि बाहर निकलो। परिजनों को भी भरोसा था कि आशा बहुत परिश्रमी व योग्य है, घर से निकलेगी तो तरक्की करेगी। हुआ भी वही। वैश्य गर्ल्स कॉलेज में अंग्रेजी के शिक्षक की जरूरत थी। इंटरव्यू हुआ और नौकरी मिल गई। लेकिन कॉलेज में शिक्षक रहते-रहते अपनी योग्यता बढ़ाने का क्रम नहीं छोड़ा। वर्ष 1998 में एमएड किया और 1999 में नेट पास किया। बहादुरगढ़ शिक्षा सभा ने 2002 में उन्हें बीएड कॉलेज में पढ़ाने का दायित्व दे दिया। यहां रहते 2004 में अंग्रेजी में पीएचडी कर लिया और वर्ष 2014 में प्राचार्य बन गईं।
छात्राओं को भी है इनसे लगाव
प्राचार्य होने के बावजूद डॉ. आशा शर्मा छात्राओं को नियमित रूप से पढ़ाती है। कड़ी मेहनत करती हैं। कुशल प्रशासक भी हैं। छात्राओं के हर सुख-दुख का ख्याल रखती हैं। इसलिए छात्राएं उनसे बहुत लगाव रखती हैं। कॉलेज की छुट्टी के बाद भी उनके पास हर रोज अनेक छात्राओं के फोन आते हैं। अब तक काफी छात्राएं इनसे पढ़कर अध्यापिकाएं बन चुकी हैं।
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12 किताबें लिखीं
आशा ने दूसरी पीएचडी एचआईवी एड्स को लेकर की। वह अंग्रेजी व अर्थशास्त्र दोनों विषयों की 12 पुस्तकें लिख चुकी हैं। छात्राओं को तो एड्स के खतरों से सजग करती ही हैं, सामाजिक कार्यक्रमों में भी जाकर लगातार जागरूकता फैला रही हैं। पर्यावरण रक्षा के लिए पौधरोपण व संरक्षण में गहरी रुचि रखती हैं। कॉलेज व अपने घर को सदा हरा-भरा रखती हैं।
कई बार मिले सम्मान
1981-82 में डॉ. आशा शर्मा को पहला अवॉर्ड बेस्ट स्टूडेंट का मिला। इसके बाद 24 और अवॉर्ड इन्हें मिले। कर्मयोगी सम्मान मिला। ग्लोबल अचीवर्स अवॉर्ड के अलावा चीन की एक संस्था भी उन्हें सम्मानित कर चुकी है। एजुकेशन एक्सलेंसी अवार्ड, सोसाइटी डेवलपमेंट अवॉर्ड, भारतीय प्रतिभा गौरव अवॉर्ड, नारी शक्ति सम्मान आदि भी मिल चुके हैं।
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बहादुरगढ़। शादी हुई तो चूल्हा, चौका संभाला लेकिन अपने पढ़ाई के सपने को मन में हमेशा जीवंत रखा। तमाम मुश्किलों से उबरकर 12 साल बाद घर से निकली और फिर पढ़ाई में जुट गई। कल तक जो सपना था, उसे आज हकीकत में बदल लिया। जी हां, हम बात कर रहे हैं वैश्य बीएड कॉलेज की प्राचार्या डॉ. आशा शर्मा की, जो आज महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं। मूलत: जींद जिले के सफीदों की आशा शर्मा ने 1982 में महिला कॉलेज रोहतक से बीए की। 1983 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से बीएड किया। इसी दौरान 1984 में उनका विवाह हो गया। विवाह के बाद कारण पढ़ाई करना सरल नहीं रहा। ससुराल वाले नियमित पढ़ाई को लेकर अनमने थे। लिहाजा पढ़ाई का सिलसिला अधर में छूट गया। आशा शर्मा घर गृहस्थी में उलझ गई लेकिन मन में पढ़ाई का सपना जीवंत था।
ऐसे शुरू हुआ सफलता का सिलसिला
वर्षों तक आशा शर्मा अपने घरेलू कामकाज में लगी रहीं। इस बीच आशा को थायरायड बीमारी ने जकड़ लिया। चिकित्सक ने सलाह दी कि बाहर निकलो। परिजनों को भी भरोसा था कि आशा बहुत परिश्रमी व योग्य है, घर से निकलेगी तो तरक्की करेगी। हुआ भी वही। वैश्य गर्ल्स कॉलेज में अंग्रेजी के शिक्षक की जरूरत थी। इंटरव्यू हुआ और नौकरी मिल गई। लेकिन कॉलेज में शिक्षक रहते-रहते अपनी योग्यता बढ़ाने का क्रम नहीं छोड़ा। वर्ष 1998 में एमएड किया और 1999 में नेट पास किया। बहादुरगढ़ शिक्षा सभा ने 2002 में उन्हें बीएड कॉलेज में पढ़ाने का दायित्व दे दिया। यहां रहते 2004 में अंग्रेजी में पीएचडी कर लिया और वर्ष 2014 में प्राचार्य बन गईं।
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छात्राओं को भी है इनसे लगाव
प्राचार्य होने के बावजूद डॉ. आशा शर्मा छात्राओं को नियमित रूप से पढ़ाती है। कड़ी मेहनत करती हैं। कुशल प्रशासक भी हैं। छात्राओं के हर सुख-दुख का ख्याल रखती हैं। इसलिए छात्राएं उनसे बहुत लगाव रखती हैं। कॉलेज की छुट्टी के बाद भी उनके पास हर रोज अनेक छात्राओं के फोन आते हैं। अब तक काफी छात्राएं इनसे पढ़कर अध्यापिकाएं बन चुकी हैं।
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12 किताबें लिखीं
आशा ने दूसरी पीएचडी एचआईवी एड्स को लेकर की। वह अंग्रेजी व अर्थशास्त्र दोनों विषयों की 12 पुस्तकें लिख चुकी हैं। छात्राओं को तो एड्स के खतरों से सजग करती ही हैं, सामाजिक कार्यक्रमों में भी जाकर लगातार जागरूकता फैला रही हैं। पर्यावरण रक्षा के लिए पौधरोपण व संरक्षण में गहरी रुचि रखती हैं। कॉलेज व अपने घर को सदा हरा-भरा रखती हैं।
कई बार मिले सम्मान
1981-82 में डॉ. आशा शर्मा को पहला अवॉर्ड बेस्ट स्टूडेंट का मिला। इसके बाद 24 और अवॉर्ड इन्हें मिले। कर्मयोगी सम्मान मिला। ग्लोबल अचीवर्स अवॉर्ड के अलावा चीन की एक संस्था भी उन्हें सम्मानित कर चुकी है। एजुकेशन एक्सलेंसी अवार्ड, सोसाइटी डेवलपमेंट अवॉर्ड, भारतीय प्रतिभा गौरव अवॉर्ड, नारी शक्ति सम्मान आदि भी मिल चुके हैं।