युवा नजरिया: दलबदलु विधायकों के चुनाव लड़ने पर लगे 5 साल की रोक, पढ़ें दलबदल कानून पर युवाओं के विचार
प्रतिभागी विद्यार्थियों के लिए अमर उजाला की ओर से शुरू युवा नजरिया कॉलम के तहत कई आलेख प्राप्त हुए। दलबदल कानून राज्यों में कितना कारगर विषय पर मिले आलेखों का मूल्यांकन राजकीय महाविद्यालय, हिसार के लोक प्रशासन विभाग के सहायक प्राध्यापक डाॅ. विजेंद्र सिंह बेनीवाल ने किया। उन्होंने हिसार के आर्यनगर निवासी प्रियंका सौरभ के आलेख को बेहतर माना है।
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विस्तार
प्रियंका सौरभ का कहना है कि दल-बदल कानून एक मार्च 1985 में अस्तित्व में आया, ताकि अपनी सुविधा के हिसाब से पार्टी बदल लेने वाले विधायकों और सांसदों पर लगाम लगाई जा सके। 1985 से पहले दल-बदल के खिलाफ कोई कानून नहीं था। उस समय 'आया राम गया राम' मुहावरा खूब प्रचलित था। दरअसल 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली, जिसके बाद 'आया राम गया राम' प्रचलित हो गया। लेकिन 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार इसके खिलाफ विधेयक लेकर आई।
1985 में संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई। ये संविधान में 52वां संशोधन था। इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई। इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी खत्म हो सकती है। अगर कोई विधायक या सांसद खुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
अगर कोई निर्वाचित विधायक या सांसद पार्टी लाइन के खिलाफ जाता है। अगर कोई सदस्य पार्टी व्हिप के बावजूद वोट नहीं करता। अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है। विधायक या सांसद बनने के बाद खुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल कानून में आता है।
अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता खत्म नहीं होगी। वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन भी किया गया। जब ये कानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी पार्टी में बंटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी।
लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फायदा उठाया जा रहा है। इसलिए ये प्रावधान खत्म कर दिया गया। इसके बाद संविधान में 91वां संशोधन जोड़ा गया। जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया।
विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गंवाने से बच सकते हैं। अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी। ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं।
स्पीकर को ये अधिकार नहीं है, कि वो सदन की बची हुई अवधि तक बागी विधायकों की सदस्यता निरस्त कर दे। यानी अयोग्य ठहराते वक्त स्पीकर को ये अधिकार नहीं होगा कि वो बागी विधायकों के विधानसभा के बचे हुए कार्यकाल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दें।
ऐसे में कुछ महीनों में दोबारा चुनाव कराए जाते है। इसमें बागी हुए विधायक भी सत्ताधारी पार्टी के टिकट से लड़ते है और कई जीत भी जाते हैं। तो ऐसे में दल बदल कानून अब बेमानी होता लगता है। इस से दल बदल आसान हो गया है। कानून में संशोधन कर ये प्रावधान किया जाना चाहिए कि दल बदल करने वाला विधायक पूरे पांच साल के टर्म में चुनाव नहीं लड़ सकता। या फिर वो अविश्वास प्रस्ताव में वोट देंगे तो वोट काउंट नहीं किया जाएगा। दल-बदल कानून के दायरे से बचने के लिए विधायक या सांसद इस्तीफा दे रहे हैं।
लेकिन ऐसा प्रावधान किया जाना चाहिए कि जिस पीरियड के लिए वो चुने गए थे, अगर उससे पहले उन्होंने स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया, तो उन्हें उस वक्त तक चुनाव नहीं लड़ने दिया जाएगा। देशव्यापी कोई बहुत बड़ी वजह हो, आदर्शों की बात है या कोई बहुत उसूलों की बात है। तब तो ठीक है, लेकिन बिना वजह त्याग पत्र देने के बाद अगला चुनाव आप फिर से लड़ रहे हैं। तो ये तकनीकी तौर पर तो सही है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर ये सारे लोग कानून में बारूदी सुरंग लगा रहे हैं। किसी भी कानून को तोड़ने वाले उसका तरीका निकाल लेते हैं, यहां जो तोड़ निकाला गया है, उसे रिसॉर्ट संस्कृति का नाम दिया जा रहा है।
आया राम गया राम ने लंबे समय से भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया है -डॉ. सत्यवान सौरभ
दल बदल आया राम गया राम अभिव्यक्ति के साथ शुरू हुआ, जिसने हरियाणा के विधायक गया लाल द्वारा एक ही दिन में तीन बार पार्टियां बदलने के बाद भारतीय राजनीति में लोकप्रियता हासिल की। यह 1967 में हुआ था। संसद ने इस मामले का उपयोग भारतीय संविधान में 10वीं अनुसूची को जोड़ने को उचित ठहराने के लिए किया। यह कानून सदन के किसी अन्य सदस्य की याचिका के जवाब में विधायिका के पीठासीन अधिकारी द्वारा सांसदों को दल बदल के लिए अयोग्य घोषित करने की प्रक्रिया स्थापित करता है।
कानून के अनुसार, यदि कोई राजनेता स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ देता है या हाउस ऑफ कॉमन्स में वोट पर पार्टी नेतृत्व के निर्देशों की अवज्ञा करता है, तो वह दल बदल करता है। धारणा यह है कि विधायक इस व्यवहार से पार्टी व्हिप का उल्लंघन कर रहे हैं। दल-बदल विरोधी विधेयक का उद्देश्य विधायकों को पाला बदलने से रोककर सरकार को स्थिर रखना है। दल बदल विरोधी कानून ने भारत में बहस और चर्चा के बजाय पार्टियों और संख्या के आधार पर लोकतंत्र लागू किया।
इस तरह से यह असहमति और दल बदल के बीच कोई अंतर नहीं करता है, जिससे किसी भी पैमाने पर संसदीय बहस कमजोर हो जाती है। दूसरी ओर, यह कानून राजनेताओं को उनके राजनीतिक दलों से अनिश्चित काल के लिए बाध्य नहीं करता है। विभिन्न परिस्थितियों में विधायक अयोग्य ठहराए जाने के डर के बिना दल बदल सकते हैं।
यह कानून किसी पार्टी को किसी अन्य पार्टी के साथ विलय की अनुमति देता है यदि उसके दो-तिहाई सदस्य इसे स्वीकार करते हैं। ऐसे में किसी भी सदस्य पर दल बदल का आरोप नहीं लगता। अन्य स्थितियों में, यदि कोई व्यक्ति अध्यक्ष या अध्यक्ष के रूप में चुना गया था और उसे अपनी पार्टी से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया था। परिणामस्वरूप, वे पद छोड़ने के बाद फिर से पार्टी में शामिल हो सकते हैं।
भारत में परित्याग की अनेक घटनाएं हुई हैं। कई विधायकों और सांसदों ने पार्टियां बदल ली हैं। 91वां संविधान संशोधन अधिनियम-2003 का लक्ष्य मंत्रिपरिषद के आकार को कम करना, दलबदलुओं को सार्वजनिक कार्यालय में प्रवेश करने से रोकना और भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची में सुधार करना था। पहले, विलय को एक राजनीतिक दल के निर्वाचित सदस्यों के एक तिहाई के दल बदल के रूप में परिभाषित किया गया था। संशोधन के बाद इसे कम से कम दो-तिहाई कर दिया गया। अदालत ने विधायक अयोग्यता के मामलों पर विचार करने में स्पीकर की व्यापक शक्ति की भी पुष्टि की।
यद्यपि हमारे देश के विधायकों की ओर से बार-बार और अपवित्र निष्ठा परिवर्तन के कारण होने वाली राजनीतिक अस्थिरता भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के कारण काफी कम हो गई है, फिर भी भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के अधिक तर्कसंगत संस्करण की आवश्यकता है। मणिपुर प्रशासन में कुछ मौजूदा विधायक हाल ही में विपक्ष में चले गए, जिससे राज्य में राजनीतिक अनिश्चितता पैदा हो गई। मणिपुर में दल बदल की यह राजनीति असामान्य नहीं है। हाल ही में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी दल बदल हुआ है। विधानमंडल के सदस्यों द्वारा राजनीतिक दल बदल ने लंबे समय से भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया है।
दल-बदल विरोधी कानून सरकार स्थिरता में कारगर होने की बजाय खरीद फरोख्त का तरीका है : बिदामो देवी
दल-बदल विरोधी कानून ने निर्वाचित प्रतिनिधियों की आवाज को दबा दिया है। विधायकों द्वारा पार्टी अनुशासन का पालन न करना एक राजनीतिक समस्या है, और इसे अधिक आंतरिक पार्टी लोकतंत्र और पार्टी के सदस्यों के विकास के तरीकों के माध्यम से हल किया जाना चाहिए। भारत के संविधान का एक हिस्सा इसकी मूल भावना के खिलाफ है।
यह दसवीं अनुसूची है, जिसे 52वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया था। राजनीतिक दल बदल को रोकने के लिए 1985 में संसद द्वारा पारित किया गया, इसे आमतौर पर दल बदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है। इसका उद्देश्य एक राजनीतिक दल के टिकट पर चुने गए विधायकों को दूसरे के प्रति अपनी निष्ठा बदलने से रोकना था। इसका उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता लाना था।
तब से, इसने हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों की आवाज को दबा दिया है, संवैधानिक कार्यालयों को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया है और हमारे लोकतंत्र का मजाक उड़ाया है। दल-बदल विरोधी कानून 37 वर्षों तक स्थिर सरकारें सुनिश्चित करने में विफल रहा है। कुछ हालिया उदाहरण उद्धृत किये जा सकते हैं।
इन विफलताओं के बावजूद, दल-बदल विरोधी कानून को छोड़ने के बजाय उसे मजबूत करने की मांग उठ रही है। मूल प्रश्न यह है कि क्या किसी पार्टी के विधायकों को अपनी वफादारी दूसरे के प्रति स्थानांतरित करने से रोकना कानूनी रूप से संभव है।
एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पैसे के अलावा, पद के लालच ने विधायकों के दल बदलने के फैसले में प्रमुख भूमिका निभाई। इसमें बताया गया है कि 1967 के चुनाव के बाद, सात राज्यों में दल बदलने वाले 210 विधायकों में से 116 उन सरकारों में मंत्री बन गए, जिन्हें उन्होंने अपने दल बदल से बनाने में मदद की थी।
इससे यह सवाल उठता है कि क्या हमारे प्रतिनिधि केवल अपने राजनीतिक संगठन के प्रति ही जिम्मेदार हैं? या क्या उन लोगों की राय व्यक्त करने की भी उनकी कोई जिम्मेदारी है जिन्होंने उन्हें चुना है?
भारत में, विधायकों द्वारा पार्टी अनुशासन का पालन न करने का प्रश्न एक राजनीतिक मुद्दा है, जो उनके और उनके राजनीतिक दल के बीच का मुद्दा है। यदि राजनीतिक दल चाहते हैं कि उनके सदस्य पार्टी लाइन पर चलें, तो उनके नेतृत्व को आंतरिक पार्टी लोकतंत्र, संवाद और अपने सदस्यों के विकास के रास्ते को बढ़ावा देने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए। असली सवाल यह होगा कि संविधान को उन राजनीतिक दलों की मदद के लिए क्यों आना चाहिए जो अपने सदस्यों को एक साथ नहीं रख सकते। यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि दल-बदल विरोधी कानून हमारी विधायिकाओं के प्रभावी कामकाज से लगातार समझौता कर रहा है।
दल बदल कानून राज्यों में कितना कारगर : अतुल बंसल
1985 में हमारे संविधान के 10वीं अनुसूची में दल बदल कानून को जोड़ा गया। यह कानून 52वें संविधान संसोधन के द्वारा लाया गया था। यह कानून 1967 में हुए एक किस्से आया राम गया राम के बाद लाया गया। हरियाणा के विधायक थे गया लाल उन्होंने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली थी। इसके कारण राजनीति में बहुत बड़ा बदलावा आया था। जिसकेे कारण राजनीति की स्थिरता खत्म हो गई थी। स्थिरता को बनाए रखने के लिए 1985 में यह कानून लाया गया।
दल बदल कानून हमारी राजनीतिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कानून बना। दल बदल कानून के आने से चुनाव द्वारा बनाए गए विधायक या मंत्री उसी पार्टी में रह सकते हैं, जिससे वह जीतते हैं। अगर वह उस पार्टी को छोड़ते हैं तो उनपर दल बदल कानून लागू होगा और दोबारा चुनाव करवाए जाएंगे। इसके कारण हमारी राजनीति में स्थिरता बनी रहेगी, लोगों का विश्वास नहीं टूटेगा, गलत तरीके से विधायकों और मंत्रियों की दल बदल नहीं होगी और पार्टी में अनुशासन बना रहेगा। दल बदल कानून की वजह से पार्टियों में पारदर्शिता बनी रहेगी।
जिसके कारण हमारे लोकतंत्र की नींव बनी रहती है। दल बदल कानून आने से पहले विधायक या मंत्री जीतते किसी और पार्टी से थे और कार्य किसी और पार्टी के लिए करते थे संसद में वोट पार्टी के खिलाफ देते थे। इसके कारण पार्टी को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। जिस कारण जनता के लिए बनाई गई नीतियां लागू नहीं हो पाती थी।
दल बदल कानून तीन स्थितियों में मंत्रियों व विधायकों पर लगता है। जब कोई मंत्री या विधायक पार्टी के खिलाफ संसद में वोट दे, पार्टी के खिलाफ काम करे या किसी और पार्टी से जुड़ जाए। इसलिए दल बदल कानून राज्यों के लिए बहुत कारगर है। इस कारण पार्टी में स्थिरता, पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहती है।
विशेषज्ञ की राय
इस लेख में दल बदलू कानून से जुड़े मूल तथा महत्वपूर्ण तथ्यों को बखूबी उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया गया है इसमें इस्तेमाल की गई भाषा शैली काफी सरल व प्रभावी है लेकिन लेखक ने इस कानून से संबंधित सुधारों को व्यापक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने में चूक की है।
भारतीय संविधान में 1985 एवं 2003 के दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य राजनीतिक दलबदल पर अंकुश लगाकर लोकतांत्रिक स्थिरता बनाना हैl लेकिन यह कानून मूल कारकों जैसे की अतर-पार्टी लोकतंत्र की कमी, भ्रष्टाचार और चुनावी कदाचार को संबोधित करने में पूर्णत असफल रहा हैl भारतीय लोकतंत्र में पिछले तीन-चार दशक में असंख्य दलबदल के मामले सामने आए हैंl जो कि प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने और प्रक्रियात्मक मुद्दों जैसी चुनौतियां सुधरो की आवश्यकता को रेखांकित करते हैंl अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों से प्रेरित होकर प्रस्तावित कदमों का उद्देश्य स्थिरता और जवाबदेही को संतुलित करना हैl पार्टी विलय और सार्वजनिक हित के लिए छूट को मान्यता देते हुए, एक मजबूत लोकतंत्र सुनिश्चित करते हुए, भारत के गतिशील राजनीतिक परिदृश्य में प्रासंगिक बने रहने के लिए कानून विकसित होना चाहिएl -डॉ विजेंद्र सिंह बेनीवाल