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विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस : अपनों ने अपने ही घर से निकाला तो हमउम्र बने सहारा
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दीपिका लोहचब
हिसार। उम्र के आखरी पड़ाव में बुजुुर्ग माता-पिता को अपनी औलाद का सहारा होता है, लेकिन जब अपनों ने अपने घर की दहलीज से निकाला तो हमउम्र सहारा बने। कहीं बेटों ने तिरस्कार कर उन्हें वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ दिया तो कहीं बहुओं की बेरुखी से वृद्ध मां-बाप को अपना आशियाना छोड़ना पड़ा। यह कहानी एक बुजुर्ग की नहीं, हजारों माता-पिता हैं जो वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। बेशक आश्रम में उन्हें हर प्रकार की सुख-सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन आज भी उनकी पथरीली निगाहें अपनों के आने के इंतजार में चौखट पर टिकी हैं।
हमारे घर की नींव बड़े-बुजुर्ग होते हैं। वहीं हमें हर वो बात सिखाते हैं, जिनका जीवन में काफी महत्व होता है, लेकिन हम सब अपने बड़े-बुजुर्गों का महत्व ही कई बार नहीं समझ पाते और उनके साथ बुरा बर्ताव करने लगते हैं। हर साल 15 जून को विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का खास मकसद ही बुजुर्ग के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की तरफ लोगों का ध्यान दिलाना, उन्हें जागरूक करना और इसे रोकने के प्रयास करना है। संवाद
अमर उजाला की अपील : अपनी संस्कृति को न भूलें, समाज में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार को रोकने के लिए आवाज उठाएं ...
बेटे-बहुओं ने नहीं पूछा हालचाल
शहर के मोक्ष वृद्धाश्रम में 5 साल से रह रही राजवंती का कहना है कि वह बच्चों के लिए मर चुकी है। घर से निकालने के बाद बेटे-बहुओं ने कभी हालचाल तक नहीं पूछा। उनके होते हुए आश्रम में रह रही हैं। जब भी जेहन में बेटों की याद आती है तो आंखें नमी हो जाती हैं। हालांकि यहां हमउम्र का साथ से अपनों के न होने का मलाल तक नहीं होता।
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जब तक कमाया, खुशी-खुशी रखा
वृद्धाश्रम में रहने वाली आगरा निवासी सुरभि शर्मा ने रुंधे गले से बताया कि जब तक बच्चों को कमा कर दिया, उन्होंने खुशी-खुशी घर में रखा। जब हाथ-पांव ने काम करना बंद कर दिया तो औलाद ने घर से निकाल दिया। मजबूर होकर यहां आना पड़ा। अध्यापिका पद से सेवानिवृत्त हूं तो योग्यता मुझ में अब भी रुपये कमाने की है, लेकिन गठियां के दर्ज से चलने-फिरने में असमर्थ हूं। यहां पर मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं। खाने से लेकर दवा तक समय पर मिल रही है। शायदा इतना ख्याल तो मेरे अपने भी नहीं रखते।
नहीं सुन सकी सुबह-शाम के ताने
हरिद्वार की रहने वाली लक्ष्मी ने बताया कि जब तक बेटे की शादी नहीं की सबकुछ ठीक चल रहा था। बेटे की शादी होने के बाद जब घर में बहू आई तो उसने हर छोटी बात पर ताने मारने शुरू कर दिए। सुबह-शाम ताने मारती। घर पर जीना दूर्भर हो गया था। ऐसे में घर से निकला ही उचित समझा। यहां आने के बाद जन्नत जैसा लग रहा है। यहां पर बीमारों की सेवा करके सुकून मिल रहा है।
वृद्धाश्रम में बुजुर्गों का होना शर्मनाक बात
मोझ वृद्धाश्रम संचालिका पंकज संधीर ने बताया कि वृद्धाश्रम में बुजुर्गों का होना शर्मनाक बात है। जब उनको सड़कों पर घूमते देखा तो दिल में ख्याल आया कि उम्र के इस पड़ाव में इनको भी अपनों का साथ मिलना चाहिए। वर्ष 2008 में ऐसे बुजुर्गों को आश्रय देने के लिए वृद्धाश्रम की शुरुआत पांच कमरों से की। लोग सहयोग करते रहे और अब चार बिल्डिंग हो गई। यहां 210 बुजुर्ग रह रहे हैं। मरीजों का निशुल्क उपचार करवाया जाता है। देश के हर कोने से यहां आकर बुजुर्ग रह रहे हैं।
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हिसार। उम्र के आखरी पड़ाव में बुजुुर्ग माता-पिता को अपनी औलाद का सहारा होता है, लेकिन जब अपनों ने अपने घर की दहलीज से निकाला तो हमउम्र सहारा बने। कहीं बेटों ने तिरस्कार कर उन्हें वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ दिया तो कहीं बहुओं की बेरुखी से वृद्ध मां-बाप को अपना आशियाना छोड़ना पड़ा। यह कहानी एक बुजुर्ग की नहीं, हजारों माता-पिता हैं जो वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। बेशक आश्रम में उन्हें हर प्रकार की सुख-सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन आज भी उनकी पथरीली निगाहें अपनों के आने के इंतजार में चौखट पर टिकी हैं।
हमारे घर की नींव बड़े-बुजुर्ग होते हैं। वहीं हमें हर वो बात सिखाते हैं, जिनका जीवन में काफी महत्व होता है, लेकिन हम सब अपने बड़े-बुजुर्गों का महत्व ही कई बार नहीं समझ पाते और उनके साथ बुरा बर्ताव करने लगते हैं। हर साल 15 जून को विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का खास मकसद ही बुजुर्ग के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की तरफ लोगों का ध्यान दिलाना, उन्हें जागरूक करना और इसे रोकने के प्रयास करना है। संवाद
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अमर उजाला की अपील : अपनी संस्कृति को न भूलें, समाज में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार को रोकने के लिए आवाज उठाएं ...
बेटे-बहुओं ने नहीं पूछा हालचाल
शहर के मोक्ष वृद्धाश्रम में 5 साल से रह रही राजवंती का कहना है कि वह बच्चों के लिए मर चुकी है। घर से निकालने के बाद बेटे-बहुओं ने कभी हालचाल तक नहीं पूछा। उनके होते हुए आश्रम में रह रही हैं। जब भी जेहन में बेटों की याद आती है तो आंखें नमी हो जाती हैं। हालांकि यहां हमउम्र का साथ से अपनों के न होने का मलाल तक नहीं होता।
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जब तक कमाया, खुशी-खुशी रखा
वृद्धाश्रम में रहने वाली आगरा निवासी सुरभि शर्मा ने रुंधे गले से बताया कि जब तक बच्चों को कमा कर दिया, उन्होंने खुशी-खुशी घर में रखा। जब हाथ-पांव ने काम करना बंद कर दिया तो औलाद ने घर से निकाल दिया। मजबूर होकर यहां आना पड़ा। अध्यापिका पद से सेवानिवृत्त हूं तो योग्यता मुझ में अब भी रुपये कमाने की है, लेकिन गठियां के दर्ज से चलने-फिरने में असमर्थ हूं। यहां पर मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं। खाने से लेकर दवा तक समय पर मिल रही है। शायदा इतना ख्याल तो मेरे अपने भी नहीं रखते।
नहीं सुन सकी सुबह-शाम के ताने
हरिद्वार की रहने वाली लक्ष्मी ने बताया कि जब तक बेटे की शादी नहीं की सबकुछ ठीक चल रहा था। बेटे की शादी होने के बाद जब घर में बहू आई तो उसने हर छोटी बात पर ताने मारने शुरू कर दिए। सुबह-शाम ताने मारती। घर पर जीना दूर्भर हो गया था। ऐसे में घर से निकला ही उचित समझा। यहां आने के बाद जन्नत जैसा लग रहा है। यहां पर बीमारों की सेवा करके सुकून मिल रहा है।
वृद्धाश्रम में बुजुर्गों का होना शर्मनाक बात
मोझ वृद्धाश्रम संचालिका पंकज संधीर ने बताया कि वृद्धाश्रम में बुजुर्गों का होना शर्मनाक बात है। जब उनको सड़कों पर घूमते देखा तो दिल में ख्याल आया कि उम्र के इस पड़ाव में इनको भी अपनों का साथ मिलना चाहिए। वर्ष 2008 में ऐसे बुजुर्गों को आश्रय देने के लिए वृद्धाश्रम की शुरुआत पांच कमरों से की। लोग सहयोग करते रहे और अब चार बिल्डिंग हो गई। यहां 210 बुजुर्ग रह रहे हैं। मरीजों का निशुल्क उपचार करवाया जाता है। देश के हर कोने से यहां आकर बुजुर्ग रह रहे हैं।