महिला समानता दिवस: हिसार की दो सशक्त शख्सियत ने बताई संघर्ष की कहानी; बुलंद करो अपनी आवाज, पूरा होगा हर ख्वाब
हिसार सिविल अस्पताल की पीएमओ डॉ. रत्ना भारती ने अपने संघर्ष की कहानी बताते हुए कहा कि बचपन से डॉक्टर बनने का सपना था। परिवार और शिक्षकों ने साथ दिया और आज मैं इस मुकाम पर पहुंच चुकी हूं। जब 11वीं कक्षा में थी, तब पिता का साया उठ गया था।
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कानूनी तौर पर महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार है, मगर समाज में आज भी असमानता है। आज के दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी भूमिका निभा रही हैं, चाहे शिक्षा, खेल हो या फिर आसमां को नापने की उड़ान। महिला सरंक्षण अधिकारी बबीता चौधरी का कहना है कि अगर महिलाएं अपनी आवाज को बुलंद करें तो उनका हर सपना पूरा होगा। आज हर क्षेत्र में चुनौतियों से लड़कर महिलाएं अपना मुकाम हासिल कर रही हैं। परिवार संभालने और नौकरी करने में जो संतुलन महिला बैठाती हैं, शायद ही कोई पुरुष कर सके।
आपने अक्सर सुना होगा कि महिलाओं को पुरुषों से बराबरी का हक नहीं मिल रहा। पुरुषों के मुकाबले उनका वेतन कम होता है। कुछ जगहों पर ऐसा है भी। लेकिन यह भी याद करना जरूरी है कि इस असमानता के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई अमेरिका में लड़ी गई थी। करीब 50 साल चली इस लड़ाई की बदौलत ही वर्ष 1920 में 26 अगस्त को महिलाओं को वोटिंग का अधिकार मिला। महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने और समाज में उनकी स्थिति मजबूत बनाने के उद्देश्य से हर साल 26 अगस्त को महिला समानता दिवस मनाया जाता है। जिले के प्रशासनिक पदों पर कुछ ऐसी महिलाएं हैं जो अपने संघर्ष से इस मुकाम तक पहुंची है।
समान सोच से मिलेगा समानता का अधिकार : बबीता चौधरी
महिला सरंक्षण अधिकारी बबीता चौधरी ने बताया कि वह रेवाड़ी की रहने वाली हैं। होटल मैनेजमेंट का कोर्स करना चाहती थी लेकिन पति अनिल चौधरी ने एलएलबी में दाखिला दिलवा दिया। वर्ष 2005 में एलएलबी पास की और 2008 में हिसार में महिला एवं बाल संरक्षण अधिकारी के पद पर नियुक्ति हुई। मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती बाल विवाह रोकने की थी।
नियुक्ति के 3 महीने के बाद ही एक महिला का केस देख एहसास हुआ कि इस क्षेत्र में गलत आ गई। इसके बाद मैंने पति को नौकरी छोड़ने की बात कही, लेकिन उन्होंने नौकरी में रहकर महिलाओं की जो स्थिति है, उसे दूर करने की बात कही। इस दौरान पुरुषों का एक अलग ही रूप देखने को मिला। यौन शोषण के केस देखकर मैं खुद मानसिक परेशान रहने लगी। इसके बाद परिवार का सहयोग मिला तो खुद को शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए खुद को मजबूत किया।
बंधक बनाया, पिस्तौल तानी पर मैंने भी बाल विवाह रोकने की थी ठानी
उन्होंने बताया कि जब कभी वहां पर मौजूद लोगों को बाल विवाह न करने के बारे में नसीहत देती तो पुरुष बुरा मानते। कई बार मेरे साथ मारपीट की गई, मुझे कमरे में भी बंद रखा गया। एक बार तो मेरी कनपटी पर पिस्तौल तान दी थी लेकिन मैं घबराई नहीं। अपने क्षेत्र में आगे बढ़ती गई। अपना ऐसा दबदबा कायम किया कि लोग अपने बच्चों की शादी से पहले मुझे जन्म प्रमाण-पत्र दिखाने के बाद शादी करने लगे। उन्होंने बताया कि शायद ही मैंने कभी अपने बच्चों की पीटीएम या अन्य कोई कार्यक्रम हिस्सा लिया हो। उनका कहना है कि बेटा और बेटी में भेदभाव खत्म करें और अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाएं।
उतार-चढ़ाव से घबराएं नहीं आगे बढ़े : डॉ. रत्ना भारती
नागरिक अस्पताल की पीएमओ डॉ. रत्ना भारती ने अपने संघर्ष की कहानी बताते हुए कहा कि बचपन से डॉक्टर बनने का सपना था। परिवार और शिक्षकों ने साथ दिया और आज मैं इस मुकाम पर पहुंच चुकी हूं। जब 11वीं कक्षा में थी, तब पिता का साया उठ गया था। उस समय लगा कि अब आगे नहीं पढ़ पाऊंगी, लेकिन शिक्षक और मेरे दोस्त घर आए उन्होंने समझाया। अपनी जिंदगी में शिक्षकों के योगदान को मैं कभी नहीं भूला सकती।
डॉक्टर बनने के बाद पहली पोस्टिंग 1985 में कालांवाली में हुई। इसके बाद 2001 में कैमरी आई। जब उनसे पूछा कि पूरे जिले की जिम्मेदारी कैसे संभालते हो तब उन्होंने बताया आप कोई काम करते हैं तो उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। हमें चुनौतियों का सामना करना चाहिए न कि उससे दूर भागना चाहिए। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि वह एक लक्ष्य लेकर चलें और जो रुकावटें उनके लक्ष्य के दौरान आती हैं उनसे दूर न भागे बल्कि उनका सामना करें।