आपातकाल की यातनाओं का दर्द: मंजर याद कर कांप जाती है रूह; पेशाब के मटके में पिलाते थे पानी, बैरक में था पाखाना
रामस्वरूप ने बताया करीब ढाई से तीन महीने हमें हिसार जेल में रखा गया। 15 बाई 9 की बैरक के अंदर करीब 20 लोगों को रखा जाता था। अंदर ही पाखाना था तो पेशाब करने के लिए एक घड़ा रखा होता था।
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25 जून 1975 को देश में पहली बार इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आपातकाल (इमरजेंसी) लागू किया था। इसके 50 साल बीत जाने के बाद भी आपातकाल की पीड़ाओं को झेलने वाले लोग इसकी यातनाओं को भूल नहीं पाए हैंं। हिसार के मेयर प्रंवीण पोपली के पिता रामस्वरूप पोपली ने भी इमरजेंसी के कठिन दर्द को सहा है और अपनी जुबां से कुछ यूं व्यक्त किया है।
मैं करीब 26 साल का था। हांसी में हम सुबह के वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा लगा रहे थे। मैं शिवाजी शाखा का मुख्य शिक्षक था। तभी एक संघ प्रचारक ने बताया कि अब हम शाखा नहीं लगा सकते। रात को इमरजेंसी लग गई है। इमरजेंसी शब्द पहली बार सुना था। मैंने पूछा अब क्या होगा। बताया गया कि अब मौलिक अधिकारों का प्रयोग नहीं किया जा सकेगा। विरोध में आवाज उठाने वाले लोगों पर कार्रवाई होगी। इसके बाद मैं कई दिनों तक छिपता रहा लेकिन 8 जुलाई को मुझे पुलिस ने पकड़ लिया।
चार दिन लगातार थाने में बुलाने के बाद मुझे और मेरे तीन साथियों को हिसार की सेंट्रल जेल एक में भेज दिया। यहां हमें ऐसी यातनाएं दी गईं जिन्हें याद कर आज भी मन कौंध जाता है। मुझे व मेरे साथी पूर्णचंद, डॉ. विनोद और बंसीलाल को पेशाब वाले मटके में पीने का पानी दिया जाता था। नहीं पीते तो जबरन पिलाया जाता था। बारिश का मौसम था और कीड़े पड़ी हुई सब्जी खिलाते थे। मैंने और बाकी साथियों ने इसके विरोध में तीन दिन तक भूख हड़ताल की तो खाना बनाने वाला एक व्यक्ति मिल गया। उपरोक्त पीड़ा को जाहिर करते हुए हिसार के मेयर प्रवीण पोपली के 78 वर्षीय पिता रामस्वरूप पोपली की आंखें नम हो गई तो गला रुंध सा गया। उन्होंने कहा आज आपातकाल के दौर को 50 साल हो चुके हैं लेकिन उस मंजर की कड़वी यादें जेहन में सदा रहेंगी।
15 बाई 9 की बैरक के अंदर ही था पाखाना
रामस्वरूप ने बताया करीब ढाई से तीन महीने हमें हिसार जेल में रखा गया। 15 बाई 9 की बैरक के अंदर करीब 20 लोगों को रखा जाता था। अंदर ही पाखाना था तो पेशाब करने के लिए एक घड़ा रखा होता था। पाखाने को साफ करने के लिए कोई नहीं आता था और अंदर बदबू फैली रहती थी। सभी को कुछ समय के लिए बैरक से निकाला जाता था फिर अंदर डाल दिया जाता था। हर रात एक साल सी लगती थी। हिसार से पकड़े गए 45 से ज्यादा लोगों के अलावा इस जेल में सिरसा, फतेहाबाद, भिवानी आदि जगह के बंदियों को भी बंद किया गया था।
पिता की यातना के बारे में सोचकर पकड़ा गया
रामस्वरूप पोपली ने बताया हम हिसार बाद में आए, मूल रूप से हांसी निवासी थे और लाल सड़क पर हमारा घर था। बजरिया चौक अब प्रताप चौक पर पिताजी के साथ कपड़े की दुकान पर बैठता था। 19 साल की उम्र में शादी हो गई थी। आपातकाल के वक्त बेटा प्रवीण करीब पांच साल का था। आपातकाल लागू होने के बाद हम छिपते फिर रहे थे, लेकिन पता चला कि निहाल चंद चावला नामक संघ सेवक के फरार होने पर उनके बुजुर्ग माता-पिता पकड़ लिया गया। जिन्हें प्रताड़ित भी किया गया। तब मुझे बुजुर्ग पिता का ख्याल आया। मां का साथ बचपन में ही छूट गया था। परिवार यातनाएं न झेले इसलिए मैं पकड़ा गया।
22 महीनों तक झेली प्रताड़ना
रामस्वरूप ने बताया आपातकाल 21 महीनों के लिए था लेकिन हम इसके बाद भी प्रताड़ना झेलते रहे। तीन महीने के बाद जमानत मिली तो पेशी पर बुलाया जाता था। पेशी पर जाने के दौरान कपड़ा और रुपयों की मांग की जाती थी। इमरजेंसी खत्म होने के बाद भी दबाव बनाया जाता रहा और यातनाएं झेलते रहे। जेल में हमारे साथ देश के कई बड़े चेहरे थे। जेल में रहते हुए ही नेताओं ने चुनाव लड़े और जीते भी थे। आपातकाल में पकड़े लोगों को सरकार की तरफ से ताम्र पत्र दिया गया और उनको सरकार की तरफ से पेंशन भी दी जा रही है।