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जरूरतमंद विद्यार्थियों को निशुल्क पुस्तकें उपलब्ध करवा रहे संजय चुघ
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पुस्तक विक्रेता संजय चुघ। संवाद
- फोटो : Hisar
हिसार। पुस्तकें एक विद्यार्थी के लिए किसी खजाने से कम नहीं होती। कई बार पैसों की कमी के कारण कई विद्यार्थी पढ़ नहीं पाते हैं, ऐसे ही जरूरतमंदों को निशुल्क किताबें उपलब्ध करवा रहे हैं डोगरान मोहल्ले के पुस्तक विक्रेता संजय चुघ।
जाट सीनियर सेकेंडरी स्कूल के समीप संजय बुक डिपो के संचालक संजय चुघ का कहना है कि अगर कोई जरूरतमंद विद्यार्थी को छठी से बीए कक्षा तक की किताबों की आवश्यकता है तो वह उनकी दुकान पर आ सकता है। 50 वर्षीय संजय चुघ अभी तक 98 जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क पुस्तकें उपलब्ध करवा चुके हैं। पुस्तक सशर्त दी जाती हैं। शैक्षणिक सत्र खत्म होने के बाद विद्यार्थियों को पुरानी पुस्तकें जमा करवानी होती हैं। इसके बाद वह नए शैक्षणिक सत्र की नई या फिर पुरानी पुस्तकें निशुल्क ले सकते हैं।
उन्होंने बताया कि 6 साल पहले उनकी दुकान के काउंटर पर 7वीं कक्षा का विद्यार्थी आया, जिसके पास किताब खरीदने के लिए रुपये नहीं थे। लेकिन बच्चे की पढ़ाई के प्रति लगत देख उन्होंने उसे निशुल्क किताबें उपलब्ध करवाई। इसके बाद जब भी कोई जरूरतमंद विद्यार्थी दुकान पर आया उन्होंने उसे सशर्त किताबें दीं। शर्त इसलिए लगाई क्योंकि कुछ युवा जरूरतमंद बनकर किताबें तो ले गए पर लौटाई नहीं। उन्होंने मुलतानी चौक के पास डिस्पेंसरी भी खोली थी, जहां 3 साल तक जरूरतमंदों को निशुल्क दवा उपलब्ध करवाई। इस मुहिम में उनके दोस्त गगन ओबराय ने साथ दिया।
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जाट सीनियर सेकेंडरी स्कूल के समीप संजय बुक डिपो के संचालक संजय चुघ का कहना है कि अगर कोई जरूरतमंद विद्यार्थी को छठी से बीए कक्षा तक की किताबों की आवश्यकता है तो वह उनकी दुकान पर आ सकता है। 50 वर्षीय संजय चुघ अभी तक 98 जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क पुस्तकें उपलब्ध करवा चुके हैं। पुस्तक सशर्त दी जाती हैं। शैक्षणिक सत्र खत्म होने के बाद विद्यार्थियों को पुरानी पुस्तकें जमा करवानी होती हैं। इसके बाद वह नए शैक्षणिक सत्र की नई या फिर पुरानी पुस्तकें निशुल्क ले सकते हैं।
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उन्होंने बताया कि 6 साल पहले उनकी दुकान के काउंटर पर 7वीं कक्षा का विद्यार्थी आया, जिसके पास किताब खरीदने के लिए रुपये नहीं थे। लेकिन बच्चे की पढ़ाई के प्रति लगत देख उन्होंने उसे निशुल्क किताबें उपलब्ध करवाई। इसके बाद जब भी कोई जरूरतमंद विद्यार्थी दुकान पर आया उन्होंने उसे सशर्त किताबें दीं। शर्त इसलिए लगाई क्योंकि कुछ युवा जरूरतमंद बनकर किताबें तो ले गए पर लौटाई नहीं। उन्होंने मुलतानी चौक के पास डिस्पेंसरी भी खोली थी, जहां 3 साल तक जरूरतमंदों को निशुल्क दवा उपलब्ध करवाई। इस मुहिम में उनके दोस्त गगन ओबराय ने साथ दिया।
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