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लड़कों को प्राइवेट तो लड़कियों को भेज रहे सरकारी स्कूल
अमर उजाला ब्यूरो/हिसार
Updated Thu, 08 Sep 2016 12:10 AM IST
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सरकार और स्वयंसेवी संगठनों के लाख प्रयास के बाद भी लड़का-लड़की में अभी तक पूरी तरह से भेदभाव समाप्त नहीं हुआ है। हालांकि लड़कियों को लेकर समाज में जागृति तो आई है, लेकिन लड़कों के बराबर समान दर्जा अभी पूरी तरह से नहीं दिया जा रहा है। लड़कियों को सरकारी विद्यालयों में तो लड़कों को प्राइवेट स्कूलों में भेजा जा रहा है। जिले के सरकारी स्कूलों में इन दिनों चल रहे दाखिलों के आंकड़े इस बात के गवाह हैं।
जानकारी के अनुसार जिले के सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने में पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी लड़कियों की संख्या लड़कों से काफी आगे रही है। इस वर्ष अब तक 79 हजार 421 लड़कियों ने पहली से 12वीं कक्षा में दाखिला लिया है। वहीं लड़कियों के मुकाबले लड़कों की संख्या 71 हजार 124 है। यानी 8 हजार 297 लड़कियां सरकारी विद्यालयों में लड़कों की अपेक्षा अधिक हैं। पिछले वर्ष जहां 82 हजार 808 लड़कियों ने सरकारी स्कूलों में दाखिला लिया था। वहीं लड़कों की संख्या 69 हजार 096 रही थी।
इस वर्ष 1 लाख 50 हजार 545 विद्यार्थियों ने लिया दाखिला
जिले में प्राइमरी से लेकर सीनियर सेकेंडरी के करीब 850 सरकारी स्कूल हैं। इन स्कूलों में इस वर्ष अब तक 1 लाख 50 हजार 545 विद्यार्थियों ने दाखिला लिया है। वहीं पिछले वर्ष जिले के सरकारी स्कूलों में 1 लाख 51 हजार 904 विद्यार्थियों ने दाखिला लिया था। हालांकि सरकारी स्कूलों में दाखिले की औसत लगभग पिछले वर्ष के समान ही है, लेकिन लड़कों का रुझान सरकारी स्कूलों से कम होता जा रहा है। इन आंकड़ों में ध्यान देने योग्य बात यह है कि जहां कक्षा पहली से आठवीं में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है, वहीं कक्षा 9 से 12 में विद्यार्थियों की संख्या घटी है, हालांकि अभी स्कूलों में दाखिले चल रहे हैं, जो 30 सितंबर तक चलेंगे।
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लड़कों को प्राइवेट स्कूलों में भेजे जाने के कारण सरकारी स्कूलों में लड़कों की संख्या लड़कियों से कम हुई है। हालांकि सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है। इसके लिए समय-समय पर स्कूलों की मॉनीटरिंग, इंस्पेक्शन, मंथली टेस्ट रिपोर्ट आदि पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है। हालांकि लड़कियों की संख्या में इजाफा होना अच्छी बात है।
- संतोष हुड्डा, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी हिसार
ये भी कारण
- सुरक्षा के मद्देनजर लड़कियों को पास के विद्यालयों में भेजा जाता है, जबकि लड़कों को अभिभावक बाहर भी पढ़ने भेज रहे हैं।
- अधिकतर अभिभावक ग्रामीण लड़कियों को शहर नहीं भेजते
- निजी स्कूलों में पढ़ाई महंगी होने के कारण अभिभावक सिर्फ लड़कों का ही पढ़ाई खर्च वहन करते हैं।
- लड़कियों की शिक्षा को लेकर ग्रामीणों में अभी भी परंपरागत सोच बनी हुई है।
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जानकारी के अनुसार जिले के सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने में पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी लड़कियों की संख्या लड़कों से काफी आगे रही है। इस वर्ष अब तक 79 हजार 421 लड़कियों ने पहली से 12वीं कक्षा में दाखिला लिया है। वहीं लड़कियों के मुकाबले लड़कों की संख्या 71 हजार 124 है। यानी 8 हजार 297 लड़कियां सरकारी विद्यालयों में लड़कों की अपेक्षा अधिक हैं। पिछले वर्ष जहां 82 हजार 808 लड़कियों ने सरकारी स्कूलों में दाखिला लिया था। वहीं लड़कों की संख्या 69 हजार 096 रही थी।
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इस वर्ष 1 लाख 50 हजार 545 विद्यार्थियों ने लिया दाखिला
जिले में प्राइमरी से लेकर सीनियर सेकेंडरी के करीब 850 सरकारी स्कूल हैं। इन स्कूलों में इस वर्ष अब तक 1 लाख 50 हजार 545 विद्यार्थियों ने दाखिला लिया है। वहीं पिछले वर्ष जिले के सरकारी स्कूलों में 1 लाख 51 हजार 904 विद्यार्थियों ने दाखिला लिया था। हालांकि सरकारी स्कूलों में दाखिले की औसत लगभग पिछले वर्ष के समान ही है, लेकिन लड़कों का रुझान सरकारी स्कूलों से कम होता जा रहा है। इन आंकड़ों में ध्यान देने योग्य बात यह है कि जहां कक्षा पहली से आठवीं में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है, वहीं कक्षा 9 से 12 में विद्यार्थियों की संख्या घटी है, हालांकि अभी स्कूलों में दाखिले चल रहे हैं, जो 30 सितंबर तक चलेंगे।
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लड़कों को प्राइवेट स्कूलों में भेजे जाने के कारण सरकारी स्कूलों में लड़कों की संख्या लड़कियों से कम हुई है। हालांकि सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है। इसके लिए समय-समय पर स्कूलों की मॉनीटरिंग, इंस्पेक्शन, मंथली टेस्ट रिपोर्ट आदि पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है। हालांकि लड़कियों की संख्या में इजाफा होना अच्छी बात है।
- संतोष हुड्डा, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी हिसार
ये भी कारण
- सुरक्षा के मद्देनजर लड़कियों को पास के विद्यालयों में भेजा जाता है, जबकि लड़कों को अभिभावक बाहर भी पढ़ने भेज रहे हैं।
- अधिकतर अभिभावक ग्रामीण लड़कियों को शहर नहीं भेजते
- निजी स्कूलों में पढ़ाई महंगी होने के कारण अभिभावक सिर्फ लड़कों का ही पढ़ाई खर्च वहन करते हैं।
- लड़कियों की शिक्षा को लेकर ग्रामीणों में अभी भी परंपरागत सोच बनी हुई है।