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उम्मीद की मशाल: हादसे में एक पैर गंवाने के बाद बदल गई प्रदीप की दिशा, दिव्यांगों की पीड़ा समझ तैयार करने लगे कृत्रिम हाथ-पैर
Mon, 09 May 2022 03:02 AM IST
भूपेंद्र सिंह
सुरेंद्र दलाल, अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
सुरेंद्र दलाल, अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
Published by: भूपेंद्र सिंह
Updated Mon, 09 May 2022 03:02 AM IST
सार
हादसे के बाद प्रदीप हौसले के बल पर दिव्यांगों की जिंदगी को पंख लगाने लगे। पिछले 22 साल में 18 हजार कृत्रिम हाथ-पैर तैयार कर लोगों को लगा चुके हैं।
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कृत्रिम हाथ-पैर तैयार करते प्रदीप।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
दिल में आगे बढ़ने का जज्बा हो और कड़ी मेहनत पक्का इरादा हो तो कोई भी सफलता की मंजिल हासिल कर सकता है। हादसे में एक पैर गंवाने के बाद लगा कि अब जिंदगी खत्म हो गई। अब हमारा कोई सहारा नहीं रहा। दिल्ली में कृत्रिम पैर लगवाया तो हौसले के भी पंख लगे। दिव्यांगों की पीड़ा देख मन में विचार आया कि अगर मैं किसी को कृत्रिम अंग लगाकर मदद कर पाऊं तो शायद किसी के चेहरे पर मुस्कान ला पाऊंगा। प्रदीप इसी सोच के साथ पिछले 22 साल में 18 हजार कृत्रिम हाथ-पैर तैयार कर लोगों को लगा चुके हैं।
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मूलरूप से रोहतक जिले के गांव सैंपल निवासी प्रदीप हिसार के ऋषि नगर स्थित दिव्यांग पुनर्वास एवं स्वास्थ्य केंद्र में कृत्रिम अंग तैयार करते हैं। वर्ष 2000 में प्रदीप ने दिल्ली में भारत विकास परिषद केंद्र से कृत्रिम अंग बनाने का प्रशिक्षण लिया था, तब से निरंतर वे कृत्रिम हाथ पैर बनाने का काम कर रहे हैं। पिछले 22 साल में करीब 18 हजार हाथ- पैर कृत्रिम बनाए हैं, जिन्हें लोगों को लगाया जा चुका है।
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प्रदीप ने बताया कि कृत्रिम अंग बनाना आसान नहीं है। हैदराबाद से एडीपीई पाइप लाया जाता है, जिसे 250 डिग्री सेल्सियस पर गर्म कर पैर के आकार में ढालते हैं। बेहद गर्म पाइप को आकार देने काम हाथ से ही करते हैं। शुरुआत में कई बार हाथ भी जले। प्रदीप अपनी टीम के साथ मिलकर रोजाना दो से तीन अंग तैयार करते हैं।
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बाजार में पूरी पैर के आकार के कृत्रिम अंग की कीमत 15 से 25 हजार तक होती है। संस्था की ओर से दिव्यांगों को कृत्रिम अंग निशुुल्क उपलब्ध कराए जाते हैं। पोलियो ग्रस्त या प्रकृति के कारण छोटे -कमजोर रह गए हाथ पैरों के लिए कैलीपर भी बनाते हैं। यह बनाना थोड़ा आसान होता है।
उस दिन आंखों से निकल आए आंसू
प्रदीप ने बताया कि करनाल से एक 20 साल की खिलाड़ी आई थी, जिसने हादसे में दोनों पैर गंवा दिए थे। खिलाड़ी को अपने हाथों के बल चलता देख मन को टीस हुई, आंखों में आंसू आ गए। जब उसे दोनों पैर लगाए वह सामान्य लड़कियों की तरह अपने पैरों पर चलती दिखी तो दिल को सुकून मिला।
पांचवीं पास प्रदीप ने बताया कि वह कृत्रिम अंग बनाने में एक्सपर्ट हो चुका है। उसे कुछ निजी कंपनियों की ओर से अच्छे वेतन- सुविधाओं के ऑफर मिले, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। पिछले 22 साल से सामाजिक संस्थाओं के लिए ही काम कर रहे हैं। उसे वेतन भले ही कम मिलता हो, लेकिन आशीर्वाद भरपूर मिलता है। प्रदीप ने बताया कि उसे कृत्रिम अंग भारत विकास परिषद ने दिया था, जिसने उसकी जिंदगी बदल दी।
वह संस्था के साथ दिल से जुड़े इसलिए पिछले दो दशक से भी लंबे समय से भारत विकास परिषद के साथ ही काम कर रहे हैं। किसी दिव्यांग को अपने कृत्रिम हाथ पैर से काम करता देख उसे चेहरे पर आई चमक ही मेरे लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद है। उनके बनाए कृत्रिम अंग हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़ और वेस्ट बंगाल सहित अन्य प्रदेश तक पहुंच रहे हैं।
16 साल तक महसूस किया दर्द..
कक्षा चार तक सभी सामान्य था। वर्ष 1978 में चौथी कक्षा में पढ़ते एक दिन जब किसी काम से सड़क किनारे चलते जा रहा था तब कैंटर ने उन्हें कुचल दिया। जिस कारण उनका एक पैर पूरा काटना पड़ा। पैर न होने के कारण स्कूल लाने- ले जाने में परिवार के लोगों को दिक्कत होती थी। पैर न होने के कारण उनका जीवन बदल गया, जिस कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी। करीब 16 साल एक पैर के सहारे ही जिंदगी चलाई। तब उन्हें हर एक दिव्यांग का दर्द अपना दर्द महसूस होने लगा। वर्ष 1994 में उन्हें कृत्रिम पैर लगाया गया।