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Hisar News: ज्ञान-समृद्धि की कामना के लिए 15 करें सप्तऋषि-बृहस्पति पूजन
Sat, 12 Sep 2026 11:56 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
Updated Sat, 12 Sep 2026 11:56 PM IST
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हिसार। सनातन परंपरा में गुरु को जीवन का मार्गदर्शक और सप्तऋषियों को ज्ञान एवं संस्कार का प्रतीक माना गया है। 15 सितंबर को सप्तऋषि पूजन और देवगुरु बृहस्पति पूजन का विशेष संयोग बन रहा है।
इस दिन श्रद्धालु ज्ञान, सुख-समृद्धि, पारिवारिक उन्नति और जीवन में सकारात्मकता की कामना से सप्तऋषियों व देवगुरु बृहस्पति की आराधना करेंगे। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक पूजा करने से गुरु कृपा प्राप्त होती है।
देवी भवन मंदिर के पुजारी पंडित राजेश ने बताया कि सनातन परंपरा में सप्तऋषियों की पूजा का विशेष महत्व है। महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ को सप्तऋषि के रूप में पूजा जाता है। इन्हें ज्ञान, तप, संस्कार और धर्म का मार्गदर्शक माना गया है। मान्यता है कि इनके स्मरण और पूजन से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है तथा परेशानियों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
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देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, शिक्षा, विवाह, संतान और समृद्धि से जोड़ा जाता है। इस दिन पीले वस्त्र, चने की दाल, गुड़, हल्दी और पीले फूल अर्पित करने की परंपरा है। केले के पेड़ की पूजा भी की जाती है।
यह है पूजन विधि :
पूजन के लिए सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल की सफाई करें। सप्तऋषियों के प्रतीक के रूप में सात सुपारी या सात अन्य प्रतीक स्थापित कर पूजा करें। इसके बाद बृहस्पति देव को पीली वस्तुएं अर्पित कर मंत्र जाप और आरती करें। पूजा के बाद जरूरतमंदों को पीली वस्तुओं का दान शुभ माना जाता है।
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इस दिन श्रद्धालु ज्ञान, सुख-समृद्धि, पारिवारिक उन्नति और जीवन में सकारात्मकता की कामना से सप्तऋषियों व देवगुरु बृहस्पति की आराधना करेंगे। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक पूजा करने से गुरु कृपा प्राप्त होती है।
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देवी भवन मंदिर के पुजारी पंडित राजेश ने बताया कि सनातन परंपरा में सप्तऋषियों की पूजा का विशेष महत्व है। महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ को सप्तऋषि के रूप में पूजा जाता है। इन्हें ज्ञान, तप, संस्कार और धर्म का मार्गदर्शक माना गया है। मान्यता है कि इनके स्मरण और पूजन से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है तथा परेशानियों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
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देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, शिक्षा, विवाह, संतान और समृद्धि से जोड़ा जाता है। इस दिन पीले वस्त्र, चने की दाल, गुड़, हल्दी और पीले फूल अर्पित करने की परंपरा है। केले के पेड़ की पूजा भी की जाती है।
यह है पूजन विधि :
पूजन के लिए सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल की सफाई करें। सप्तऋषियों के प्रतीक के रूप में सात सुपारी या सात अन्य प्रतीक स्थापित कर पूजा करें। इसके बाद बृहस्पति देव को पीली वस्तुएं अर्पित कर मंत्र जाप और आरती करें। पूजा के बाद जरूरतमंदों को पीली वस्तुओं का दान शुभ माना जाता है।