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Hisar News: लुवास की हिदायत...लंपी से संक्रमित पशुओं को अलग रखें, बुखार या गांठ दिखे तो पशु चिकित्सक से लें परामर्श
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हिसार। लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास) ने लंपी स्किन डिजीज (एलएसडी) को लेकर पशुपालकों के लिए एडवाइजरी जारी की है। बीमारी से बचाव और आर्थिक नुकसान रोकने के लिए जरूरी सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है।
लंपी से संक्रमित पशुओं को अलग रखें, बुखार या त्वचा पर गांठ दिखने पर पशु चिकित्सक से संपर्क करें। एलएसडी संक्रामक विषाणुजनित रोग है। यह मुख्य रूप से गाय और अन्य गौवंशीय पशुओं को प्रभावित करता है। इससे दूध उत्पादन घटने के साथ पशुओं की मृत्यु भी हो सकती है। इसके प्रमुख लक्षण तेज बुखार, त्वचा पर गोल व कठोर गांठें, लसीका ग्रंथियों में सूजन, कमजोरी, भूख कम लगना और दूध उत्पादन में गिरावट हैं।
107 डिग्री तक बुखार दर्ज
विशेषज्ञों के अनुसार अगस्त-सितंबर 2026 के दौरान कुछ संक्रमित पशुओं में 107 डिग्री फारेनहाइट तक बुखार दर्ज किया गया। रोग मच्छरों, काटने वाली मक्खियों और टिक्स जैसे रक्त चूसने वाले कीटों से फैलता है। संक्रमित पशुओं की आवाजाही भी संक्रमण बढ़ा सकती है। रोकथाम के लिए संक्रमित पशुओं को तुरंत अलग रखें। नए खरीदे पशुओं को 15 दिन निगरानी में रखें। पशुशालाओं की नियमित सफाई और कीटाणुशोधन करें। मच्छरों और मक्खियों पर नियंत्रण रखें। योग्य पशुओं का टीकाकरण और मृत पशुओं का सुरक्षित निपटान भी जरूरी है।
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लंपी से संक्रमित पशुओं को अलग रखें, बुखार या त्वचा पर गांठ दिखने पर पशु चिकित्सक से संपर्क करें। एलएसडी संक्रामक विषाणुजनित रोग है। यह मुख्य रूप से गाय और अन्य गौवंशीय पशुओं को प्रभावित करता है। इससे दूध उत्पादन घटने के साथ पशुओं की मृत्यु भी हो सकती है। इसके प्रमुख लक्षण तेज बुखार, त्वचा पर गोल व कठोर गांठें, लसीका ग्रंथियों में सूजन, कमजोरी, भूख कम लगना और दूध उत्पादन में गिरावट हैं।
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107 डिग्री तक बुखार दर्ज
विशेषज्ञों के अनुसार अगस्त-सितंबर 2026 के दौरान कुछ संक्रमित पशुओं में 107 डिग्री फारेनहाइट तक बुखार दर्ज किया गया। रोग मच्छरों, काटने वाली मक्खियों और टिक्स जैसे रक्त चूसने वाले कीटों से फैलता है। संक्रमित पशुओं की आवाजाही भी संक्रमण बढ़ा सकती है। रोकथाम के लिए संक्रमित पशुओं को तुरंत अलग रखें। नए खरीदे पशुओं को 15 दिन निगरानी में रखें। पशुशालाओं की नियमित सफाई और कीटाणुशोधन करें। मच्छरों और मक्खियों पर नियंत्रण रखें। योग्य पशुओं का टीकाकरण और मृत पशुओं का सुरक्षित निपटान भी जरूरी है।
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