{"_id":"61e7094603ee7f5b00170c80","slug":"lala-hukumchand-mirza-munir-baig-were-hanged-on-this-day-164-years-ago-hisar-news-hsr622336874","type":"story","status":"publish","title_hn":"164 वर्ष पहले आज ही के दिन फांसी पर लटकाए गए थे लाला हुकुमचंद, मिर्जा मुनीर बेग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
164 वर्ष पहले आज ही के दिन फांसी पर लटकाए गए थे लाला हुकुमचंद, मिर्जा मुनीर बेग
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हांसी। सन 1857 की क्रांति में लाला हुकुमचंद जैन ने बेहद कम संसाधनों के बल पर अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाया था। उन्होंने फारसी भाषा में एक पत्र लिखकर बादशाह बहादुर शाह जफर से मदद मांगी। यह गुप्त पत्र अंग्रेजों के हाथ लग गया। इसके आधार पर अंग्रेजी सरकार ने लाला हुकुमचंद जैन और उनके सहयोगी मुनीर बेग को उनके घर के सामने ही 19 जनवरी 1858 को फांसी पर लटका दिया। लाला हुकुमचंद के भतीजे फकीरचंद को अदालत से बरी होने के बाद भी फांसी दे दी गई। लाला हुकुमचंद जैन के शव को दफनाया जबकि मुनीर बेग के शव को जलाया गया था।
इतिहासकार भूप सिंह राजपूत ने बताया कि लाला हुकुमचंद जैन का जन्म सन 1816 में हांसी में दुनीचंद जैन के घर हुआ था। इनकी आरम्भिक शिक्षा हांसी में हुई थी। अपनी शिक्षा व प्रतिभा के बल पर इन्होंने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़र के दरबार में पद प्राप्त कर लिया। सन 1841 में मुगल बादशाह ने इनको हांसी और करनाल जिले के इलाकों का कानूनगो व प्रबंधकर्ता नियुक्त किया। सात साल तक मुगल बादशाह के दरबार में रहे। इसके बाद हांसी लौट आए। इस बीच अंग्रेंजो ने हरियाणा को अपने अधीन कर लिया। लाला हुकुमचंद ब्रिटिश शासन में भी कानूनगो बने रहे। सन 1857 में स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा तब लाला हुकुमचंद दिल्ली में आयोजित देशभक्तों के सम्मेलन में शामिल हुए। इसमें तांत्या टोपे भी उपस्थित थे।
बहादुर शाह जफर के साथ संबंधों के चलते लाला हुकुमचंद जैन ने ब्रितानियों के विरुद्ध युद्ध करने की पेशकश की। बहादुर शाह ने भी हुकुमचंद को सेना, गोला-बारुद सहित युद्ध सामग्री की हर संभव सहायता का भरोसा दिलाया। हांसी आकर देशभक्त वीरों को एकत्रित किया। हिसार से हांसी होकर दिल्ली पर धावा बोलने जा रही अंग्रेजी सेना पर लाला हुकमचंद जैन ने अपने साथियों के साथ हमला किया।
विज्ञापन
बेहद कम युद्ध सामग्री ,संसाधनों के बावजूद संघर्ष किया।
लाला हुकुमचंद जैन व उनके साथी मिर्जा मुनीर बेग ने गुप्त रुप से एक पत्र फ़ारसी भाषा में मुगल सम्राट को लिखा। जिसमें युद्ध सामग्री की मांग की। दिल्ली से उस पत्र का उत्तर नहीं आया। इसी बीच दिल्ली पर अंग्रेजों ने कब्जा कर मुगल सम्राट को गिरफ्तार कर लिया। 15 नवंबर 1857 को अंग्रेजों के हाथ लाला हुकुमचंद और मिर्जा मुनीर बेग के हस्ताक्षरों वाला वह पत्र लग गया। दिल्ली के कमिश्नर सीएस सांडर्स ने हिसार के कमिश्नर नव कार्टलैंड को वह पत्र भेजते हुए कठोर कार्रवाई के लिए लिखा।
लाला हुकुमचंद और मिर्जा मुनीर बेग, हुकुमचंद जैन के 13 वर्षीय भतीजे फकीर चंद को भी गिरफर कर लिया गया। हिसार में इन पर मुकदमा चलाया। दिखावटी कार्रवाई के बाद 18 जनवरी 1858 को हिसार के मजिस्ट्रेट जॉन एटकिंसन ने लाला हुकुमचंद और मिर्जा मुनीर बेग को फांसी की सजा सुना दी। फकीर चंद को मुक्त कर दिया। 19 जनवरी 1858 को लाला हुकुमचंद और मिर्जा मुनीर बेग को लाला हुकुमचंद के मकान के सामने फांसी दे दी गई। अंग्रेजों ने घृणा दिखाते हुए धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए हुकुमचंद जैन के शव को धर्म के विरुद्ध दफनाया, जबकि मुनीर बेग के शव को जलाया। लाला हुकुमचंद जैन की संपत्ति को नीलाम कर दिया था।
क्रांतिकारी लाला हुकुम चंद जैन के दो लड़के थे। बड़े लड़के का नाम न्यामत सिंह छोटे बेटे का सुगम जैन था। न्यामत के 7 लड़के थे और सुगम के पांच लड़के थे। मिर्जा मुनेर के साथ हमारे पारिवारिक संबंध थे। 1857 के बाद मिर्जा मुनेर का पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया था। 19 जनवरी को हम उनका शहीदी दिवस मनाते हैं।
- आदेश जैन, परपोता, हुकुम चंद जैन
हांसी में लाला हुकुम चंद जैन व मिर्जा मुनेर बेग प्रमुख क्रांतिकारी थे।। 1857 के बाद मुनीर बेग का परिवार पाकिस्तान चला गया। लाला हुकुम चंद जैन का परिवार हांसी में ही बसा। उनकी हवेली डडल पार्क के सामने है। मिर्जा मुनेर की हांसी में कोई भी निशानी व प्रॉपर्टी नहीं है। 19 जनवरी को लाला हुकुम चंद जैन का बलिदान दिवस हांसी की डडल पार्क में मनाया जाता है उस दिन उनका परिवार एकत्रित होता है। - भूप सिंह राजपूत, इतिहासकार
विज्ञापन
इतिहासकार भूप सिंह राजपूत ने बताया कि लाला हुकुमचंद जैन का जन्म सन 1816 में हांसी में दुनीचंद जैन के घर हुआ था। इनकी आरम्भिक शिक्षा हांसी में हुई थी। अपनी शिक्षा व प्रतिभा के बल पर इन्होंने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़र के दरबार में पद प्राप्त कर लिया। सन 1841 में मुगल बादशाह ने इनको हांसी और करनाल जिले के इलाकों का कानूनगो व प्रबंधकर्ता नियुक्त किया। सात साल तक मुगल बादशाह के दरबार में रहे। इसके बाद हांसी लौट आए। इस बीच अंग्रेंजो ने हरियाणा को अपने अधीन कर लिया। लाला हुकुमचंद ब्रिटिश शासन में भी कानूनगो बने रहे। सन 1857 में स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा तब लाला हुकुमचंद दिल्ली में आयोजित देशभक्तों के सम्मेलन में शामिल हुए। इसमें तांत्या टोपे भी उपस्थित थे।
विज्ञापन
बहादुर शाह जफर के साथ संबंधों के चलते लाला हुकुमचंद जैन ने ब्रितानियों के विरुद्ध युद्ध करने की पेशकश की। बहादुर शाह ने भी हुकुमचंद को सेना, गोला-बारुद सहित युद्ध सामग्री की हर संभव सहायता का भरोसा दिलाया। हांसी आकर देशभक्त वीरों को एकत्रित किया। हिसार से हांसी होकर दिल्ली पर धावा बोलने जा रही अंग्रेजी सेना पर लाला हुकमचंद जैन ने अपने साथियों के साथ हमला किया।
विज्ञापन
बेहद कम युद्ध सामग्री ,संसाधनों के बावजूद संघर्ष किया।
लाला हुकुमचंद जैन व उनके साथी मिर्जा मुनीर बेग ने गुप्त रुप से एक पत्र फ़ारसी भाषा में मुगल सम्राट को लिखा। जिसमें युद्ध सामग्री की मांग की। दिल्ली से उस पत्र का उत्तर नहीं आया। इसी बीच दिल्ली पर अंग्रेजों ने कब्जा कर मुगल सम्राट को गिरफ्तार कर लिया। 15 नवंबर 1857 को अंग्रेजों के हाथ लाला हुकुमचंद और मिर्जा मुनीर बेग के हस्ताक्षरों वाला वह पत्र लग गया। दिल्ली के कमिश्नर सीएस सांडर्स ने हिसार के कमिश्नर नव कार्टलैंड को वह पत्र भेजते हुए कठोर कार्रवाई के लिए लिखा।
लाला हुकुमचंद और मिर्जा मुनीर बेग, हुकुमचंद जैन के 13 वर्षीय भतीजे फकीर चंद को भी गिरफर कर लिया गया। हिसार में इन पर मुकदमा चलाया। दिखावटी कार्रवाई के बाद 18 जनवरी 1858 को हिसार के मजिस्ट्रेट जॉन एटकिंसन ने लाला हुकुमचंद और मिर्जा मुनीर बेग को फांसी की सजा सुना दी। फकीर चंद को मुक्त कर दिया। 19 जनवरी 1858 को लाला हुकुमचंद और मिर्जा मुनीर बेग को लाला हुकुमचंद के मकान के सामने फांसी दे दी गई। अंग्रेजों ने घृणा दिखाते हुए धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए हुकुमचंद जैन के शव को धर्म के विरुद्ध दफनाया, जबकि मुनीर बेग के शव को जलाया। लाला हुकुमचंद जैन की संपत्ति को नीलाम कर दिया था।
क्रांतिकारी लाला हुकुम चंद जैन के दो लड़के थे। बड़े लड़के का नाम न्यामत सिंह छोटे बेटे का सुगम जैन था। न्यामत के 7 लड़के थे और सुगम के पांच लड़के थे। मिर्जा मुनेर के साथ हमारे पारिवारिक संबंध थे। 1857 के बाद मिर्जा मुनेर का पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया था। 19 जनवरी को हम उनका शहीदी दिवस मनाते हैं।
- आदेश जैन, परपोता, हुकुम चंद जैन
हांसी में लाला हुकुम चंद जैन व मिर्जा मुनेर बेग प्रमुख क्रांतिकारी थे।। 1857 के बाद मुनीर बेग का परिवार पाकिस्तान चला गया। लाला हुकुम चंद जैन का परिवार हांसी में ही बसा। उनकी हवेली डडल पार्क के सामने है। मिर्जा मुनेर की हांसी में कोई भी निशानी व प्रॉपर्टी नहीं है। 19 जनवरी को लाला हुकुम चंद जैन का बलिदान दिवस हांसी की डडल पार्क में मनाया जाता है उस दिन उनका परिवार एकत्रित होता है। - भूप सिंह राजपूत, इतिहासकार