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हिंदी भाषा से ही हृदय की पीड़ा को समझना है संभव
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हिसार। कोई भी शख्स अगर कष्ट में है तो हिंदी ही एकमात्र पहला विकल्प है, जिससे वह संवाद के जरिये अपनी मन की पीड़ा को बता सकता है, लेकिन दूसरे को प्रभावित करने की होड़ में हम खुद हिंदी भाषा से दूर भागने का प्रयास करते हैं। यहीं नही, खुद अपने बच्चों को बेहतरीन रोजगार दिलाने के अवसर के लिए अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं की तरफ धकेलते हैं। जबकि परिणाम आगे जाकर इसका उलट मिलता है। बच्चे तो दूर की बात अगर शिक्षक से ही किसी शब्द का अर्थ पूछ लिया जाए तो सबसे पहले वह गूगल की मदद लेगा। इसलिए हमें खुद को बदलना पड़ेगा, तभी दूसरों को हिंदी भाषा के प्रति उत्साहित कर सकेंगे।
मन की पीड़ा को केवल हिंदी भाषा से ही समझाया और समझा जा सकता है। क्योंकि यही भाषा हमारी जमीन से जुड़ी हुई है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हिंदी भाषा के बीच ही इंसान पलता-बढ़ता है, लेकिन आज के दौर में हमने खुद हिंदी की जगह अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं को शुमार कर लिया है। जोकि गलत है। मैं दावा कर सकती हूं कि हिंदी को छोड़कर कोई भी ऐसी भाषा नहीं जिससे हृदय की पीड़ा को समझा जा सकें।
- सरोज आर्य, पूर्व हिंदी अध्यापिका, राजकीय उच्च विद्यालय, सूंडावास।
हिंदी भाषा को हम अपने घर में ही नजरअंदाज करते हैं। तो बाहर की स्थिति हम समझ सकते हैं। आजकल तो हिंदी भाषा इतने बुरे दौर से गुजर रही है कि हम हिंदी बोलने से संकोच महसूस करते हैं और तो और अंग्रेजी बोलने वाले को शिक्षित समझते हैं। जबकि हिंदी भाषा की दयनीय स्थिति होने का कारण हम खुद हैं। इसलिए हमें पहले आम बोल चाल की भाषा में हिंदी को अपनाना पड़ेगा। तभी आगे कुछ सोचा जा सकता है।
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- राखी, हिंदी अध्यापिका, डीएवी पुलिस पब्लिक स्कूल, हिसार।
हिंदी के प्रति हम कितने गंभीर हैं। इसका अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमने अभी तक हिंदी को मातृभाषा का दर्जा नहीं दिला सके। आजकल कोई भी शख्स ज्यादा शिक्षित न होने पर भी अंग्रेजी के शब्द प्रचलन में लाना चाहता है। क्योंकि या तो उसे वह अपने बच्चों के मुंह से सुनता है या फिर टीवी सहित मोबाइलों में देखता है। हमें पहले खुद को हिंदी भाषा के प्रति समर्पित होना पड़ेगा। तभी देश बदेलगा।
- सरिता शर्मा, हिंदी अध्यापिका, होली चाइल्ड सीनियर सेकेंडरी स्कूल, हिसार।
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मन की पीड़ा को केवल हिंदी भाषा से ही समझाया और समझा जा सकता है। क्योंकि यही भाषा हमारी जमीन से जुड़ी हुई है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हिंदी भाषा के बीच ही इंसान पलता-बढ़ता है, लेकिन आज के दौर में हमने खुद हिंदी की जगह अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं को शुमार कर लिया है। जोकि गलत है। मैं दावा कर सकती हूं कि हिंदी को छोड़कर कोई भी ऐसी भाषा नहीं जिससे हृदय की पीड़ा को समझा जा सकें।
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- सरोज आर्य, पूर्व हिंदी अध्यापिका, राजकीय उच्च विद्यालय, सूंडावास।
हिंदी भाषा को हम अपने घर में ही नजरअंदाज करते हैं। तो बाहर की स्थिति हम समझ सकते हैं। आजकल तो हिंदी भाषा इतने बुरे दौर से गुजर रही है कि हम हिंदी बोलने से संकोच महसूस करते हैं और तो और अंग्रेजी बोलने वाले को शिक्षित समझते हैं। जबकि हिंदी भाषा की दयनीय स्थिति होने का कारण हम खुद हैं। इसलिए हमें पहले आम बोल चाल की भाषा में हिंदी को अपनाना पड़ेगा। तभी आगे कुछ सोचा जा सकता है।
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- राखी, हिंदी अध्यापिका, डीएवी पुलिस पब्लिक स्कूल, हिसार।
हिंदी के प्रति हम कितने गंभीर हैं। इसका अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमने अभी तक हिंदी को मातृभाषा का दर्जा नहीं दिला सके। आजकल कोई भी शख्स ज्यादा शिक्षित न होने पर भी अंग्रेजी के शब्द प्रचलन में लाना चाहता है। क्योंकि या तो उसे वह अपने बच्चों के मुंह से सुनता है या फिर टीवी सहित मोबाइलों में देखता है। हमें पहले खुद को हिंदी भाषा के प्रति समर्पित होना पड़ेगा। तभी देश बदेलगा।
- सरिता शर्मा, हिंदी अध्यापिका, होली चाइल्ड सीनियर सेकेंडरी स्कूल, हिसार।