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Haryana: राखीगढ़ी व कुनाल में दिवाली बाद शुरू होगी खोदाई, लेडार की मदद से इतिहास के रहस्यों को जान सकेंगे लोग

Tue, 17 Oct 2023 08:41 AM IST
नवीन दलाल अमरनाथ, हिसार (हरियाणा)
अमरनाथ, हिसार (हरियाणा) Published by: नवीन दलाल Updated Tue, 17 Oct 2023 08:41 AM IST
सार

हिसार से लगभग 65 किमी दूरी पर स्थित राखीगढ़ी की साइट की छठी बार खोदाई इसी महीने के आखिरी हफ्ते में शुरू होने की संभावना है। वहीं, पुरातत्व विभाग चंडीगढ़ कुनाल की सातवीं बार खोदाई करेगा। फतेहाबाद की रतिया तहसील से 12 किमी की दूरी पर स्थित कुनाल सबसे पुरानी पूर्व-हड़प्पा बस्तियों में से एक है।

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Excavation will start after Diwali in Rakhigarhi and Kunal, people will know secrets of history
राखीगढ़ी में मिला शहर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय पुरातत्व विभाग एक बार फिर हिसार जिले के राखीगढ़ी में जल्द ही हड़प्पाकालीन स्थल की खोदाई शुरू करने की तैयारी कर रहा है। दूसरी तरफ पुरातत्व विभाग चंडीगढ़ फतेहाबाद जिले के कुनाल में दिवाली बाद खोदाई की शुरुआत कर अतीत के पन्नों पर प्रकाश डालेगा। हड़प्पाकालीन इन दोनों स्थलों के अलावा अग्रोहा के टीले की सच्चाई जानने और सटीक विश्लेषण के लिए भी लेडार की मदद खुदाई की जाएगी। कुनाल और अग्रोहा के पुरातात्विक स्थल के उत्खनन में आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया जाएगा। हरियाणा सरकार इन पुरातात्विक स्थलों को जोड़कर पर्यटन के मद्देनजर सिंधु सरस्वती सर्किट तैयार करेगी।

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प्रदेश के शहरी निकाय मंत्री डॉ. कमल गुप्ता ने बताया कि अग्रोहा के टीले पर खोदाई के लिए हरियाणा सरकार केंद्र सरकार के साथ एमओयू करेगी। जिसमें कुछ खर्च केंद्र सरकार तथा कुछ प्रदेश सरकार वहन करेगी। अगले दो महीने में एमओयू की प्रक्रिया पूरी करने की तैयारी है। जिसके बाद भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम खोदाई शुरू करेगी। खोदाई से निकले सामान को अग्रोहा में ही म्यूजियम में रखा जाएगा। इस टीले पर अब तक तीन बार खोदाई हो चुकी है। जिसमें कुछ सिक्के, बर्तन, मूर्तियां सहित अन्य सामान निकला है।
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अग्रोहा के टीले की चौथी बार होगी खोदाई
इतिहासकार डॉ. महेंद्र सिंह बताते हैं कि अग्रोहा के टीले की खोज और पहली खोदाई 1888 में ब्रितानी पुरातत्वविद सीटी रोजर्स ने की थी। दूसरी खोदाई पुरातत्वविद हरि लाल श्रीवास्तव के नेतृत्व में हुई थी, जबकि तीसरी खोदाई जेएस खत्री ने करवाई थी। 1988 से लेकर अब तक इसकी तीन बार 39 फीट तक खोदाई हो चुकी है। इसमें तीन सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं। पहले स्तर की खोदाई में 1000 साल पहले राजपूत शासन के प्रमाण मिले हैं, दूसरे स्तर की खोदाई में 300 ईसा पूर्व से लेकर 300 ईस्वी तक यौद्धेय और अग्रसेन शासन के प्रमाण मिले हैं जबकि तीसरे स्तर की खोदाई में बौद्ध और जैन धर्म से जुड़े शासक के प्रमाण मिले हैं। यह स्थल हिसार जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी दूर है।

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छठी बार होगी राखीगढ़ी में खोदाई

हिसार से लगभग 65 किमी दूरी पर स्थित राखीगढ़ी की साइट की छठी बार खोदाई इसी महीने के आखिरी हफ्ते में शुरू होने की संभावना है। विश्व के सबसे बड़े हड़प्पाकालीन स्थलों में शुमार यह स्थल अब भी आबाद है। भारतीय पुरातत्व विभाग के संयुक्त महानिदेशक संजय मंजुल का कहना है कि वह अपनी टीम के साथ एक हफ्ते राखीगढ़ी आएंगे। वहां की स्थिति का आकलन करने के बाद खोदाई शुरू करने की तारीख तय करेंगे। पिछली बार लेडार के जरिये मिली जानकारी का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है।

सातवीं बार होगी कुनाल की खोदाई

पुरातत्व विभाग चंडीगढ़ कुनाल की सातवीं बार खोदाई करेगा। फतेहाबाद की रतिया तहसील से 12 किमी की दूरी पर स्थित कुनाल सबसे पुरानी पूर्व-हड़प्पा बस्तियों में से एक है और लगभग 5वीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व की है। यहां पर हड़प्पा पूर्व, हड़प्पा व वैदिक काल तक के अवशेष मिले हैं। यह साइट लगभग 6,000 साल पुरानी बताई जाती है। इतिहासकारों के अनुसार उस जमाने में यहां से सरस्वती नदी का प्रवाह होता था और तब यहां पर बस्ती बसाई गई थी।

खोदाई में लेडार तकनीक की ली जाएगी मदद

विभाग के मुताबिक पुरातात्विक स्थलों की खोदाई में लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग (लेडार) तकनीक की मदद ली जाएगी। लेजर किरणों और सैटेलाइट के समन्वय से चलने वाली इस डिवाइस को गड्ढा खोदकर रखा जाता है। यह उपकरण लेजर किरणें फेंकता है और इसमें लगे कैमरे चारों ओर धूमते हैं, जिससे किसी भी पुरावशेष की थ्री डायमेंशनल तस्वीरें मिलती हैं। इतिहासकार डॉ. महेंद्र सिंह बताते हैं कि राखीगढ़ी में सबसे पहले वर्ष 2022 में खोदाई के दौरान इस तकनीक का उपयोग किया गया था। तब धरती के 10 मीटर अंदर की वस्तुओं के बारे में जानकारी ली गई थी। अब खोदाई के दौरान उन्नत लेडार का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे 20 मीटर गहराई तक की तस्वीर ली जा सकेगी।

अधिकारी के अनुसार

कुनाल में दिवाली के बाद फिर खोदाई शुरू होगी। लेडार तकनीक से पुरावशेष के आकार-प्रकार और उसकी स्थिति जानने में आसानी होती है। इससे पुरावशेष को क्षति भी नहीं पहुंचती है। तथ्यों के विश्लेषण में आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी। -डॉ. बनानी भट्टाचार्य, उपनिदेशक, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग।

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