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अधूरे फेफड़ों के साथ पैदा हुई बच्ची को चिकित्सकों ने दिया दूसरा जीवन
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अग्रोहा/हिसार। लगातार आ रही बुरी खबरों के बीच मेडिकल कॉलेज अग्रोहा के गायनी वार्ड में तैनात डॉक्टरों की टीम ने सुुखद समाचार दिया। टीम ने जिंदगी-मौत के बीच झूल रही प्री-मेच्योर बच्ची को बचाने में सफलता हासिल की। 44 दिन बाद बच्ची के स्वस्थ होने पर परिजनों को सौंप दिया गया है।
नंगथला गांव की 31 सप्ताह की गर्भवती महिला ने मेडिकल कॉलेज अग्रोहा के गायनी वार्ड में दो अप्रैल एक प्री-मेच्योर बच्ची को जन्म दिया। कुछ समय बाद प्रसूता की तबीयत बिगड़ने से मौत हो गई। चिकित्सकों की टीम बच्ची को बचाने में जुट गई। एचओडी डॉ. राकेश कुमार सहारण, डॉ. सुमन रानी, डॉ. कर्निका अग्रवाल, डॉ. वरुण मुंजाल, डॉ. सुरेंद्र गोदारा, डॉ. नुपुर, डॉ. बृजेंद्र सिंह, डॉ. जैद, डॉ. अमित कुमार, डॉ. संजय, डॉ. निकिता, डॉ. पूजा, नर्स सिस्टर सहित पूरी टीम ने मंथन कर पैनल बनाया। डॉक्टरों की टीम ने परिवार को भी हौसला दिया। 41 दिन में बच्ची के स्वस्थ होने के बाद उसके पिता मधुकांत शर्मा को सौंप दिया।
डॉ. बृजेंद्र सिंह ने बताया कि बच्ची का वजन 1.400 किलोग्राम था। बच्ची के फेफड़े सही न होने व संक्रमण होने से सांस लेने में भारी दिक्कत थी। बच्ची को एचएफएनसी छोटे वेंटिलेटर पर रखा गया। बच्ची को जीवन रक्षक मेडिसिन पर रखा गया। खून में भी संक्रमण हो गया था। ऐसे बच्चों के जिंदा रहने की बहुत कम संभावनाएं होती हैं। फेफड़ों को मजबूत करने के लिए इंजेक्शन दिए। बच्ची को लाइफ सपोर्ट पर रखा गया। 40 दिनों में बच्ची का वजन 1.750 किलोग्राम होने पर डिस्चार्ज किया गया।
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जा सकती थी बच्ची की आंखें
समय-समय पर आंखों की जांच भी करवाई गई। ज्यादा दिन तक ऑक्सीजन देने से आंखों में रेटिनोपैथी का डर रहता है। डिस्चार्ज करने से पहले बच्ची का लेजर विधि से आंखों का इलाज करवाया गया।
दस लाख खर्च होते निजी अस्पताल में
बच्ची के परिवारजनों ताऊ राजीव शर्मा, पिता मधुकांत शर्मा, ताई अंजू देवी, नानी ने भी सहयोग किया। परिजनों ने बताया कि अगर निजी अस्पताल में जाते तो इस उपचार का दस लाख रुपये खर्च आता। बच्ची का पिता मधुकांत शर्मा प्राइवेट जॉब करता है। वह इतना खर्च उठाने में सक्षम नहीं थे।
बच्ची को बचाना दोहरी चुनौती थी
बच्ची को बचाना हमारे के लिए दोहरी चुनौती थी। उसके फेफड़ों के विकसित करने के लिए दवा दे रहे थे। उसे कोरोना से बचाना बड़ी चुनौती थी। अगर बच्ची संक्रमित हो जाती तो किसी भी सूरत में नहीं बचा पाते।
- डॉ. राकेश कुमार सहारण, एचओडी, अग्रोहा मेडिकल कॉलेज।
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नंगथला गांव की 31 सप्ताह की गर्भवती महिला ने मेडिकल कॉलेज अग्रोहा के गायनी वार्ड में दो अप्रैल एक प्री-मेच्योर बच्ची को जन्म दिया। कुछ समय बाद प्रसूता की तबीयत बिगड़ने से मौत हो गई। चिकित्सकों की टीम बच्ची को बचाने में जुट गई। एचओडी डॉ. राकेश कुमार सहारण, डॉ. सुमन रानी, डॉ. कर्निका अग्रवाल, डॉ. वरुण मुंजाल, डॉ. सुरेंद्र गोदारा, डॉ. नुपुर, डॉ. बृजेंद्र सिंह, डॉ. जैद, डॉ. अमित कुमार, डॉ. संजय, डॉ. निकिता, डॉ. पूजा, नर्स सिस्टर सहित पूरी टीम ने मंथन कर पैनल बनाया। डॉक्टरों की टीम ने परिवार को भी हौसला दिया। 41 दिन में बच्ची के स्वस्थ होने के बाद उसके पिता मधुकांत शर्मा को सौंप दिया।
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डॉ. बृजेंद्र सिंह ने बताया कि बच्ची का वजन 1.400 किलोग्राम था। बच्ची के फेफड़े सही न होने व संक्रमण होने से सांस लेने में भारी दिक्कत थी। बच्ची को एचएफएनसी छोटे वेंटिलेटर पर रखा गया। बच्ची को जीवन रक्षक मेडिसिन पर रखा गया। खून में भी संक्रमण हो गया था। ऐसे बच्चों के जिंदा रहने की बहुत कम संभावनाएं होती हैं। फेफड़ों को मजबूत करने के लिए इंजेक्शन दिए। बच्ची को लाइफ सपोर्ट पर रखा गया। 40 दिनों में बच्ची का वजन 1.750 किलोग्राम होने पर डिस्चार्ज किया गया।
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जा सकती थी बच्ची की आंखें
समय-समय पर आंखों की जांच भी करवाई गई। ज्यादा दिन तक ऑक्सीजन देने से आंखों में रेटिनोपैथी का डर रहता है। डिस्चार्ज करने से पहले बच्ची का लेजर विधि से आंखों का इलाज करवाया गया।
दस लाख खर्च होते निजी अस्पताल में
बच्ची के परिवारजनों ताऊ राजीव शर्मा, पिता मधुकांत शर्मा, ताई अंजू देवी, नानी ने भी सहयोग किया। परिजनों ने बताया कि अगर निजी अस्पताल में जाते तो इस उपचार का दस लाख रुपये खर्च आता। बच्ची का पिता मधुकांत शर्मा प्राइवेट जॉब करता है। वह इतना खर्च उठाने में सक्षम नहीं थे।
बच्ची को बचाना दोहरी चुनौती थी
बच्ची को बचाना हमारे के लिए दोहरी चुनौती थी। उसके फेफड़ों के विकसित करने के लिए दवा दे रहे थे। उसे कोरोना से बचाना बड़ी चुनौती थी। अगर बच्ची संक्रमित हो जाती तो किसी भी सूरत में नहीं बचा पाते।
- डॉ. राकेश कुमार सहारण, एचओडी, अग्रोहा मेडिकल कॉलेज।