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Hisar News: मांगों को लेकर आशा वर्कर्स ने निकाला विरोध मार्च, नारेबाजी कर जताया विरोध

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 24 Mar 2025 11:44 PM IST
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Asha workers took out a protest march regarding their demands, expressed their protest by raising slogans
आशा वर्कर अपनी मांगों को लेकर विरोध मार्च निकालते हुए।
हिसार। आशा वर्कर्स एंड फैसिलिटेटर ने सोमवार को अपनी मांगों को लेकर लघु सचिवालय तक विरोध मार्च निकाला। एचएयू के गेट नंबर 4 पर एकत्रित होकर प्रदर्शन करते हुए डीसी कार्यालय पहुंचकर धरना दिया। आशा वर्कर्स एंड फैसिलिटेटर ने रोष प्रदर्शन करते हुए केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और केंद्रीय मंत्री के नाम पर ज्ञापन सौंपा। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व यूनियन की जिला सचिव अनीता, उशा, सुमन नीता, कृष्णा, सीमा धीरणवास, सीमा रावलवास, पूनम टोकस, सीटू के जिला सचिव मनोज कुमार मौजूद रहे।
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जिला सचिव अनीता ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार आशा वर्कर्स के काम को बहुत ही महत्वपूर्ण मानती है। परंतु केंद्र और राज्य सरकार आशा वर्कर के कार्यों की प्रोत्साहन राशि नहीं बढ़ाती है। आशा वर्कर्स को बिना कोई प्रोत्साहन राशि दिए डिजिटल कार्य भी करवा रही है। आशा वर्कर्स ने पूरे देश में आंदोलन करने का निर्णय लिया है। आशा वर्कर्स की मांग और समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो पूरे देश में आशा वर्कर्स का बड़ा आंदोलन किया जाएगा।
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आशा वर्कर्स की मांग...
वर्ष 2023 में आशा वर्कर्स की हड़ताल के दौरान 73 दिन के काटे गए मानदेय का तुरंत भुगतान किया जाए।
एनएचएम को स्थाई प्रोग्राम बनाकर आशा वर्कर को पक्का कर्मचारी बनाया जाए। तक न्यूनतम वेतन 26000 दिया जाए।
पूरे देश में एक समान कार्य परिस्थितियां सुनिश्चित की जाएं।
6 माह का सवेतन मातृत्व अवकाश, 20 दिन का आकस्मिक अवकाश और चिकित्सा अवकाश सुनिश्चित किया जाए।
सभी पीएचसी/सीएचसी और अस्पतालों में आशा विश्राम कक्ष बनाऐ जाए ।
आशा कार्यकर्ताओं को स्कूटर दिया जाए तथा ड्यूटी के लिए यात्रा व्यय का भुगतान किया जाए।
डिजिटलीकरण के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले टैबलेट, डेटा पैक, नेटवर्क और प्रशिक्षण उपलब्ध करवाई जाए।
सभी तरह के ऑनलाइन काम के आशा वर्कर्स को इंसेंटिव दिए जाएं ।
सरकारी स्वास्थ्य के ढांचे और अस्पतालों सहित सभी बुनियादी सेवाओं के निजीकरण के प्रस्ताव पर रोक लगाई जाए।
चार श्रम संहिताओं को रद्द किया जाए। आशा और सुविधाकर्ताओं को श्रम कानूनों के दायरे में शामिल किया जाए l
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