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Fatehabad News: सेमग्रस्त जमीन में फसलें बहा ले गई बारिश
Sun, 03 Aug 2025 11:01 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
Updated Sun, 03 Aug 2025 11:01 PM IST
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भट्टू कलां के खेताें पानी भरने से मुरझाई नरमे की फसल। स्रोत: किसान
फतेहाबाद। मानसून सीजन में जिले की हजारों एकड़ में खड़ी फसल बारिश से प्रभावित है। वहीं खेतों में हुए जलभराव से ढाणीवासी भी परेशान हैं। पिछले एक सप्ताह में जिले में करीब 100 एमएम से भी अधिक बारिश हो चुकी है।
इस कारण सेमग्रस्त जमीन और ज्यादा प्रभावित हो रही है। इससे नरमा, ग्वार और मूंगफली की फसल को खराब होने का अंदेशा बना हुआ है। किसानों ने सरकार से नुकसान के स्पेशल गिरदावरी करवाने की मांग की है। क्षेत्र के भट्टू खंड के गांव जांडवाला, ठुईयां, रामसरा, ढाबीकलां, बनमंदोरी, बनगांव, सूलीखेड़ा आदि गांव की 80 फीसदी के करीब भूमि सेमग्रस्त है।
इस बार मई व जून में बारिश कम होने चलते किसानों ने खरीफ की फसल की बुवाई की हुई थी, लेकिन इस बार क्षेत्र में अच्छी बारिश होने के कारण इस जमीन में उगी फसल पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा है।
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बनगांव व बीघड़ में धान की फसल प्रभावित
गांव बनगांव और बीघड़ की जमीन के ज्यादातर भूमि पर धान की फसल की खेती की जाती है। किसानों ने धान की फसल की रोपाई का काम हाल ही में पूरा किया है। अभी धान पौधा छोटा है। बारिश अधिक होने से पौधा पूरा तरह से पानी में डूब गया है। जबकि इसे ग्रोथ के लिए पानी से थोड़ा बाहर रहना जरूरी है। फसल को बचाने के लिए किसान खेतों से पानी निकालने के लिए अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।
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बारिश के पानी की निकासी का नहीं है प्रबंध
सरकार की ओर से पानी निकासी के लिए सेमनाला बनाया गया है लेकिन पाइप नहीं डाले जाने के कारण प्रबंध अधूरा है। जिले के 20 से अधिक गांवों की हजारों एकड़ कृषि भूमि में पानी भरा हुआ है। इससे फसलें प्रभावित होने के साथ-साथ खेतों में बनी ढाणियों के चारों और पानी भर गया है। किसान और ग्रामीण सरकार से समस्या के समाधान की आस लगा रहे हैं।
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इन गांवों में सेम की समस्या
जिले के गांव जांडवाला, ठुईयां, रामसरा, ढाबीकलां, बनमंदोरी, बनगांव, सूलीखेड़ा, खाराखेड़ी, चबलामोरी सहित साथ लगते गांव पिछले लंबे समय से सेम की समस्या से जूझ रहे हैं। इन गांवों में भू-जल स्तर काफी ऊंचा है। इससे पानी जमीन से अपने आप ही बाहर आने लगता है। दशकों से ग्रामीण इस समस्या से जूझ रहे हैं, मगर अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं हो पाया। हालांकि इन गांवों को सेममुक्त करने के लिए सौर ऊर्जा से चलित पंप लगाए गए हैं। इन पर 26 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। मगर अब तक यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाया है। ग्रामीणों का कहना है कि हर वर्ष बारिश के सीजन में उनकी फसलें खराब हो जाती हैं।
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इस कारण सेमग्रस्त जमीन और ज्यादा प्रभावित हो रही है। इससे नरमा, ग्वार और मूंगफली की फसल को खराब होने का अंदेशा बना हुआ है। किसानों ने सरकार से नुकसान के स्पेशल गिरदावरी करवाने की मांग की है। क्षेत्र के भट्टू खंड के गांव जांडवाला, ठुईयां, रामसरा, ढाबीकलां, बनमंदोरी, बनगांव, सूलीखेड़ा आदि गांव की 80 फीसदी के करीब भूमि सेमग्रस्त है।
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इस बार मई व जून में बारिश कम होने चलते किसानों ने खरीफ की फसल की बुवाई की हुई थी, लेकिन इस बार क्षेत्र में अच्छी बारिश होने के कारण इस जमीन में उगी फसल पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा है।
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बनगांव व बीघड़ में धान की फसल प्रभावित
गांव बनगांव और बीघड़ की जमीन के ज्यादातर भूमि पर धान की फसल की खेती की जाती है। किसानों ने धान की फसल की रोपाई का काम हाल ही में पूरा किया है। अभी धान पौधा छोटा है। बारिश अधिक होने से पौधा पूरा तरह से पानी में डूब गया है। जबकि इसे ग्रोथ के लिए पानी से थोड़ा बाहर रहना जरूरी है। फसल को बचाने के लिए किसान खेतों से पानी निकालने के लिए अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।
बारिश के पानी की निकासी का नहीं है प्रबंध
सरकार की ओर से पानी निकासी के लिए सेमनाला बनाया गया है लेकिन पाइप नहीं डाले जाने के कारण प्रबंध अधूरा है। जिले के 20 से अधिक गांवों की हजारों एकड़ कृषि भूमि में पानी भरा हुआ है। इससे फसलें प्रभावित होने के साथ-साथ खेतों में बनी ढाणियों के चारों और पानी भर गया है। किसान और ग्रामीण सरकार से समस्या के समाधान की आस लगा रहे हैं।
इन गांवों में सेम की समस्या
जिले के गांव जांडवाला, ठुईयां, रामसरा, ढाबीकलां, बनमंदोरी, बनगांव, सूलीखेड़ा, खाराखेड़ी, चबलामोरी सहित साथ लगते गांव पिछले लंबे समय से सेम की समस्या से जूझ रहे हैं। इन गांवों में भू-जल स्तर काफी ऊंचा है। इससे पानी जमीन से अपने आप ही बाहर आने लगता है। दशकों से ग्रामीण इस समस्या से जूझ रहे हैं, मगर अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं हो पाया। हालांकि इन गांवों को सेममुक्त करने के लिए सौर ऊर्जा से चलित पंप लगाए गए हैं। इन पर 26 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। मगर अब तक यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाया है। ग्रामीणों का कहना है कि हर वर्ष बारिश के सीजन में उनकी फसलें खराब हो जाती हैं।