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Fatehabad News: सत्य की राह पर अडिग रहे हरिश्चंद्र
Fri, 16 Oct 2026 10:47 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
Updated Fri, 16 Oct 2026 10:47 PM IST
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भूना।75वीं रामलीला के सातवें दिन राजा हरिश्चंद्र नाटक का मंचन करते कलाकार। आयोजक
भूना। श्री राम कृष्ण कला मंच की 75वीं रामलीला के सातवें दिन राजा हरिश्चंद्र नाटक का मंचन किया गया। सत्य और कर्तव्य के प्रति राजा हरिश्चंद्र की अडिग निष्ठा के प्रसंगों ने दर्शकों को भावुक कर दिया। पुत्र की मृत्यु और श्मशान में अंतिम संस्कार के दृश्य पर पंडाल में सन्नाटा छा गया।
नाटक में दिखाया गया कि ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेने के लिए उनसे राजपाट दान में ले लिया। दक्षिणा चुकाने के लिए राजा को पत्नी तारामती और पुत्र से भी अलग होना पड़ा। श्मशान में नौकरी करने के बावजूद उन्होंने सत्य और कर्तव्य का मार्ग नहीं छोड़ा।
सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया जब पुत्र की मृत्यु के बाद तारामती उसके शव को लेकर श्मशान पहुंचीं। राजा हरिश्चंद्र ने पत्नी को पहचानने के बावजूद अंतिम संस्कार का शुल्क मांगा। कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय ने दर्शकों को भावुक कर दिया। सत्य के प्रति अडिग रहने वाले राजा के संवादों पर पंडाल तालियों से गूंज उठा।
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नाटक के अंत में विश्वामित्र ने राजा की परीक्षा पूरी होने की घोषणा की। हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उनके पुत्र को जीवनदान मिला और राजपाट वापस कर दिया गया। नाटक ने संदेश दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और ईमानदारी का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
राजा हरिश्चंद्र की भूमिका में राजेश चराया ने प्रभावशाली अभिनय किया। तारामती के किरदार में सतीश बत्रा, पुत्र की भूमिका में रोहित उद्धव पसरिजा, विश्वामित्र के रूप में सुमित परवाना, सेठानी के किरदार में मुंशी कंबोज और सेठ की भूमिका में शंटी खुराना ने अपनी प्रतिभा दिखाई।इस अवसर पर क्लब प्रधान हरविंदर मेहता, डायरेक्टर सुरेंद्र हंस, राजेश चराया, राकेश मदान और सुनील खुराना सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।
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नाटक में दिखाया गया कि ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेने के लिए उनसे राजपाट दान में ले लिया। दक्षिणा चुकाने के लिए राजा को पत्नी तारामती और पुत्र से भी अलग होना पड़ा। श्मशान में नौकरी करने के बावजूद उन्होंने सत्य और कर्तव्य का मार्ग नहीं छोड़ा।
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सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया जब पुत्र की मृत्यु के बाद तारामती उसके शव को लेकर श्मशान पहुंचीं। राजा हरिश्चंद्र ने पत्नी को पहचानने के बावजूद अंतिम संस्कार का शुल्क मांगा। कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय ने दर्शकों को भावुक कर दिया। सत्य के प्रति अडिग रहने वाले राजा के संवादों पर पंडाल तालियों से गूंज उठा।
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नाटक के अंत में विश्वामित्र ने राजा की परीक्षा पूरी होने की घोषणा की। हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उनके पुत्र को जीवनदान मिला और राजपाट वापस कर दिया गया। नाटक ने संदेश दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और ईमानदारी का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
राजा हरिश्चंद्र की भूमिका में राजेश चराया ने प्रभावशाली अभिनय किया। तारामती के किरदार में सतीश बत्रा, पुत्र की भूमिका में रोहित उद्धव पसरिजा, विश्वामित्र के रूप में सुमित परवाना, सेठानी के किरदार में मुंशी कंबोज और सेठ की भूमिका में शंटी खुराना ने अपनी प्रतिभा दिखाई।इस अवसर पर क्लब प्रधान हरविंदर मेहता, डायरेक्टर सुरेंद्र हंस, राजेश चराया, राकेश मदान और सुनील खुराना सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।