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Fatehabad News: गूंजी गुरुवाणी...शबद कीर्तन से संगत को किया निहाल, सहज पाठों का भोग डाला
Fri, 17 Oct 2025 10:34 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
Updated Fri, 17 Oct 2025 10:34 PM IST
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फतेहाबाद। मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धान्त की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर का स्थान अद्वितीय है।
ये बात अमृतसर एसजीपीसी से आए कथावाचक मनिंद्रजीत सिंह ने कही। वह जगजीवनपुरा स्थित गुरुद्वारा सिंह सभा में गुरु तेग बहादुर, मतीदास, सतीदास और दियाला जी के 350वें शहीदी दिवस को समर्पित समागम में उपस्थित संगत से गुरमत विचार साझे कर रहे थे।
इसी उपलक्ष्य में रखे गए सहज पाठों का भोग भी डाला गया। उसके बाद एसजीपीसी श्रीअमृतसर साहिब से कथावाचक मनिंदरजीत सिंह और कविसरी जत्था जोरावर सिंह और स्थानीय हजूरी रागी जत्था भाई दविंद्र सिंह ने भी शबद कीर्तन के माध्यम से जहां उपस्थित संगत को निहाल किया। वहीं गुरमत विचार भी साझे किए गए और गुरु तेग बहादुर की जीवनी के बारे में विस्तार से बताया गया।
गुरु तेग बहादुर ने मुगलिया सल्तनत का विरोध किया जिसके चलते 1675 में मुगल शासक औरंगजेब ने उन्हे इस्लाम स्वीकार करने को कहा। इस पर गुरु साहब ने कहा कि हम शीश तो कटवा सकते हैं लेकिन अपने केश नहीं। इस पर औरंगजेब ने सबके सामने उनका सिर कटवा दिया।
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गुरुद्वारा शीशगंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब उन स्थानों का स्मरण दिलाते हैं जहां गुरुजी की शहादत हुई और जहाँ उनका अंतिम संस्कार किया गया था। गुरु तेग बहादर जी को हिंद दी चादर भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने धर्म और मानवता के अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी की ओर से कथावाचक और कविसरी जत्थे को सम्मानित किया वहीं इसके अलावा जिन लोगों ने सहज पाठ किए थे उनको भी सम्मानित किया गया।
समागम में आए हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के सदस्य काका सिंह लधूवास, करमजीत सिंह सालमखेड़़ा, इकबाल सिंह और गुरमेल सिंह को भी सिरोपा भेंटकर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर गुरुद्वारा सिंह सभा के कार्यकारी प्रधान अजीत सिंह सचदेवा, महासचिव महेंद्र सिंह वधवा, महेंद्र सिंह ग्रोवर, हरदयाल सिंह आदि माैजूद रहे।
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ये बात अमृतसर एसजीपीसी से आए कथावाचक मनिंद्रजीत सिंह ने कही। वह जगजीवनपुरा स्थित गुरुद्वारा सिंह सभा में गुरु तेग बहादुर, मतीदास, सतीदास और दियाला जी के 350वें शहीदी दिवस को समर्पित समागम में उपस्थित संगत से गुरमत विचार साझे कर रहे थे।
इसी उपलक्ष्य में रखे गए सहज पाठों का भोग भी डाला गया। उसके बाद एसजीपीसी श्रीअमृतसर साहिब से कथावाचक मनिंदरजीत सिंह और कविसरी जत्था जोरावर सिंह और स्थानीय हजूरी रागी जत्था भाई दविंद्र सिंह ने भी शबद कीर्तन के माध्यम से जहां उपस्थित संगत को निहाल किया। वहीं गुरमत विचार भी साझे किए गए और गुरु तेग बहादुर की जीवनी के बारे में विस्तार से बताया गया।
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गुरु तेग बहादुर ने मुगलिया सल्तनत का विरोध किया जिसके चलते 1675 में मुगल शासक औरंगजेब ने उन्हे इस्लाम स्वीकार करने को कहा। इस पर गुरु साहब ने कहा कि हम शीश तो कटवा सकते हैं लेकिन अपने केश नहीं। इस पर औरंगजेब ने सबके सामने उनका सिर कटवा दिया।
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गुरुद्वारा शीशगंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब उन स्थानों का स्मरण दिलाते हैं जहां गुरुजी की शहादत हुई और जहाँ उनका अंतिम संस्कार किया गया था। गुरु तेग बहादर जी को हिंद दी चादर भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने धर्म और मानवता के अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी की ओर से कथावाचक और कविसरी जत्थे को सम्मानित किया वहीं इसके अलावा जिन लोगों ने सहज पाठ किए थे उनको भी सम्मानित किया गया।
समागम में आए हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के सदस्य काका सिंह लधूवास, करमजीत सिंह सालमखेड़़ा, इकबाल सिंह और गुरमेल सिंह को भी सिरोपा भेंटकर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर गुरुद्वारा सिंह सभा के कार्यकारी प्रधान अजीत सिंह सचदेवा, महासचिव महेंद्र सिंह वधवा, महेंद्र सिंह ग्रोवर, हरदयाल सिंह आदि माैजूद रहे।