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कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया की अस्थियां खेतों में विसर्जित
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कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया की अस्थियों को खेतों में विसर्जित करते ग्रामीण।
- फोटो : Fatehabad
गोरखपुर। कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया की अस्थियों को गंगा हरिद्वार न ले जाकर खेतों में विसर्जित कर एक नया अध्याय शुरू किया गया। गोरखपुरिया की ये अंदरूनी भावना थी कि उसकी अस्थियों को पानी में न डाला जाए, ताकि पानी प्रदूषित न हो। मालूम हो कि 23 अक्तूबर को कामरेड कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया का हृदयगति रुकने से निधन हो गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कि 38 साल की सुनीता सिवाच ने 73 वर्षीय अपने पिता कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया को कंधा दिया, जब उनके पार्थिव शरीर को उनके अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया। यही नहीं, परिवार में सुनीता और उसकी बहनों के साथ परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अंतिम संस्कार की चिता जलाई गई। उन्होंने कहा कि मेरे पिता ने हमेशा लैंगिक समानता के लिए लड़ाई लड़ी। व्यक्तिगत जीवन में भी मेरे पिता ने न केवल बेटियों को सम्मान दिया, बल्कि हमें महिलाओं के अधिकारों के बारे में जागरूक करने के लिए प्रोत्साहित किया। समाज और महिलाओं को पर्दा प्रथा छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके आग्रह के बाद, उनके परिवार की महिलाओं ने लगभग 35 साल पहले से ही पर्दा प्रथा को छोड़ना शुरू कर दिया था। इसलिए गाव की महिलाएं भी उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए श्मशान घाट गईं।
गोरखपुरिया के करीबी सहयोगी बलबीर सिंह, मंगतराम नंबरदार और कप्तान आर्य कहते हैं कि वह कभी भी अंधविश्वास में विश्वास नहीं करते थे और नदियों और नहर के पानी के प्रदूषण को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे। उनके बड़े बेटे मिल्टू राम ने स्थानीय श्मशान घाट से उनके अंतिम अवशेष (हड्डियों और राख के हिस्से जिन्हें फूल कहा जाता है) एकत्रित किए। उनकी शोक सभा गोरखपुर गाव में 1 नवम्बर को कामरेड पृथ्वी सिंह स्मारक भवन में की जाएगी।
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प्राप्त जानकारी के अनुसार कि 38 साल की सुनीता सिवाच ने 73 वर्षीय अपने पिता कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया को कंधा दिया, जब उनके पार्थिव शरीर को उनके अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया। यही नहीं, परिवार में सुनीता और उसकी बहनों के साथ परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अंतिम संस्कार की चिता जलाई गई। उन्होंने कहा कि मेरे पिता ने हमेशा लैंगिक समानता के लिए लड़ाई लड़ी। व्यक्तिगत जीवन में भी मेरे पिता ने न केवल बेटियों को सम्मान दिया, बल्कि हमें महिलाओं के अधिकारों के बारे में जागरूक करने के लिए प्रोत्साहित किया। समाज और महिलाओं को पर्दा प्रथा छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके आग्रह के बाद, उनके परिवार की महिलाओं ने लगभग 35 साल पहले से ही पर्दा प्रथा को छोड़ना शुरू कर दिया था। इसलिए गाव की महिलाएं भी उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए श्मशान घाट गईं।
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गोरखपुरिया के करीबी सहयोगी बलबीर सिंह, मंगतराम नंबरदार और कप्तान आर्य कहते हैं कि वह कभी भी अंधविश्वास में विश्वास नहीं करते थे और नदियों और नहर के पानी के प्रदूषण को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे। उनके बड़े बेटे मिल्टू राम ने स्थानीय श्मशान घाट से उनके अंतिम अवशेष (हड्डियों और राख के हिस्से जिन्हें फूल कहा जाता है) एकत्रित किए। उनकी शोक सभा गोरखपुर गाव में 1 नवम्बर को कामरेड पृथ्वी सिंह स्मारक भवन में की जाएगी।
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