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स्टेम सेल्स दान कर छोटे भाई ने बचाई बड़े भाई की जान

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 19 Nov 2021 01:36 AM IST
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Younger brother saved elder brother's life by donating stem cells
अभिषेक और छोटा भाई रोहित व साथ में उपचार करने वाले दोनों चिकित्सक। - फोटो : CharkhiDadri
चरखी दादरी। एप्लास्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त महराणा निवासी अभिषेक को गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल में उपचार के जरिये जीवनदान मिला है। इसमें चिकित्सकों के साथ मरीज के छोटे भाई रोहित का अहम रोल है। 16 वर्षीय रोहित ने बोन मेरो के प्रत्यारोपण के लिए स्टेम सेल्स दान की, जिसके जरिये अभिषेक की बीमारी का उपचार संभव हो पाया। रोहित का बोन मेरो अभिषेक के बोने मेरो से 100 फीसदी मैच हुआ जबकि बहन का बोन मेरो 80 फीसदी ही मेल खा पाया। चिकित्सकों ने छोटे भाई के स्टेम सेल्स दान करने के बाद प्रत्यारोपण कर दिया, जोकि सफल रहा।
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दरअसल, एप्लास्टिक एनीमिया में व्यक्ति का बोन मेरो काम करना बंद कर देता है और इसके लिए कोई सटीक दवा भी अभी तक नहीं है। मरीज को बुखार, हीमोग्लोबिन का निम्न स्तर, रक्तस्राव और कम प्लेटलेट की शिकायत हो जाती है। ऐसी ही स्थिति में महराणा निवासी अभिषेक को गुरुग्राम के अस्पताल में उपचार के लिए ले जाया गया था। हीमेटोलॉजी, हीमेटो ऑन्कोलॉजी एंड बीएमटी विभाग के प्रमुख निदेशक डॉ. राहुल भार्गव और हीमेटोलॉजी एंड बीएमटी विभाग के कंसल्टेंट डॉ. मीत कुमार के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने मरीज में बोन मेरो का सफल प्रत्यारोपण किया। अभिषेक ने बताया कि उसे लंबे से बुखार की शिकायत थी। उसने दादरी के ही एक डॉक्टर से संपर्क किया और उसे पता चला कि प्लेटलेट्स बहुत कम है। इसके बाद उसने भिवानी और फिर हिसार में डॉक्टरों से जांच करवाई जिसमें एप्लास्टिक एनीमिया से पीड़ित होने की पुष्टि हुई। परिजन उपचार के लिए उसे गुरुग्राम अस्पताल में ले गए। वहां चिकित्सकों ने बोन मेरा प्रत्यारोपण की सलाह दी, जिसके लिए उसकी बहन और छोटा भाई स्टेम सेल्स दान करने के लिए आगे आए। इसके बाद चिकित्सकों ने उपचार कर अभिषेक को जीवनदान दे दिया।
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लक्षण: थकान भी महसूस करता है मरीज
डॉ. राहुल भार्गव ने बताया कि एप्लास्टिक एनीमिया पूर्ण रूप से के डिसऑर्डर है और इसमें मरीज को नियमित रूप से खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। एप्लास्टिक एनीमिया के कारण मरीज थकान महसूस करता रहता है और उसे संक्रमण का सर्वाधिक खतरा रहता है जबकि अनियंत्रित रक्तस्राव भी होता रहता है। एप्लास्टिक एनीमिया का इलाज दवाइयों और खून चढ़ाने से होता है जिसमें सिर्फ स्टेम सेल का प्रत्यारोपण होता है जिसे बोन मेरो ट्रांसप्लांट कहा जाता है।
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इस बीमारी में बोन मेरो प्रत्यारोपण ही कारगर इलाज
डॉ. मीत कुमार ने बताया कि एप्लास्टिक एनीमिया की डायग्नोसिस बहुत मुश्किल है और सही समय पर डायग्नोसिस सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। डायग्नोसिस होने पर मरीज को इस बीमारी से निजात दिलाने के लिए बोन मेरो प्रत्यारोपण ही कारगर इलाज है। इस प्रक्रिया में शरीर से बीएमटी, आरबीसी, डब्ल्यूबीसी और प्लेटलेट निकाली जाती है। अलग अलग लोगों के स्टेम सेल्स को मरीज के शरीर में डाला जाता है और सफल प्रत्यारोपण के लिए मरीज की स्वीकार्यता जरूरी होती है।
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