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हरियाणा में बढ़े कंक्रीट के जंगल: पक्षियों का व्यवहार बदला, भोजन ढूंढ़ने में आ रही परेशानी; गुम हुआ कलरव
Sat, 06 Jun 2026 10:16 AM IST
Nivedita
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Sat, 06 Jun 2026 10:16 AM IST
सार
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रोहतक के जंतु विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. मंजू छिकारा के अध्ययन में सामने आया है कि बढ़ता शहरीकरण पक्षियों की आवाज को दबा रहा है।
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हरियाणा में बदला पक्षियों का व्यवहार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हरियाणा में बढ़ते शहरीकरण और तेज होते यातायात का असर अब पक्षियों पर भी साफ दिखाई देने लगा है।
हालिया शोध में सामने आया है कि शोर-शराबे वाले इलाकों में पक्षियों की भोजन तलाशने की क्षमता घट रही है। वे पहले की तुलना में अधिक बेचैन हो गए हैं। शोर के कारण उन्हें भोजन खोजने में ज्यादा कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं शोर की वजह से उनकी आवाज बढ़ गई है, मगर उनके आपसी संवाद की प्रभावशीलता कम हो रही है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि ध्वनि प्रदूषण पक्षियों के सामान्य व्यवहार और उनके अस्तित्व के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में शहरों में क्वाइट जोन विकसित करने, हरित क्षेत्रों को बढ़ाने और वेटलैंड्स के संरक्षण की आवश्यकता बढ़ गई है।
यह अध्ययन राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रोहतक के जंतु विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. मंजू छिकारा ने किया है। उनका यह अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फौना एंड बायोलॉजिकल स्टडीज में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के दौरान उन्होंने रोहतक, गुरुग्राम और झज्जर के विभिन्न क्षेत्रों को शामिल किया गया।
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अधिक शोर वाले स्थानों में रोहतक की दिल्ली रोड, झज्जर रोड और बाजार क्षेत्र व गुरुग्राम की एमजी रोड और बस स्टैंड शामिल थे। इसके विपरीत अपेक्षाकृत शांत क्षेत्रों में भिंडावास वेटलैंड, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय परिसर और अन्य पार्कों को शामिल किया गया है। अध्ययन के अनुसार शहरी क्षेत्रों में शोर का स्तर 79 से 83 डेसिबल तक था, जबकि पार्क और वेटलैंड्स में यह 38 से 44 डेसिबल तक रहा।
अध्ययन में गौरैया, मैना, कबूतर, बुलबुल और कौए जैसी सामान्य पक्षियों का 4 से 8 सप्ताह तक सुबह छह से नौ बजे और शाम चार से सात बजे तक अवलोकन किया गया। अध्ययन के दौरान फोकल एनिमल सैंपलिंग विधि से पक्षियों के व्यवहार को रिकॉर्ड किया गया है।
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हालिया शोध में सामने आया है कि शोर-शराबे वाले इलाकों में पक्षियों की भोजन तलाशने की क्षमता घट रही है। वे पहले की तुलना में अधिक बेचैन हो गए हैं। शोर के कारण उन्हें भोजन खोजने में ज्यादा कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं शोर की वजह से उनकी आवाज बढ़ गई है, मगर उनके आपसी संवाद की प्रभावशीलता कम हो रही है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि ध्वनि प्रदूषण पक्षियों के सामान्य व्यवहार और उनके अस्तित्व के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में शहरों में क्वाइट जोन विकसित करने, हरित क्षेत्रों को बढ़ाने और वेटलैंड्स के संरक्षण की आवश्यकता बढ़ गई है।
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यह अध्ययन राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रोहतक के जंतु विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. मंजू छिकारा ने किया है। उनका यह अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फौना एंड बायोलॉजिकल स्टडीज में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के दौरान उन्होंने रोहतक, गुरुग्राम और झज्जर के विभिन्न क्षेत्रों को शामिल किया गया।
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अधिक शोर वाले स्थानों में रोहतक की दिल्ली रोड, झज्जर रोड और बाजार क्षेत्र व गुरुग्राम की एमजी रोड और बस स्टैंड शामिल थे। इसके विपरीत अपेक्षाकृत शांत क्षेत्रों में भिंडावास वेटलैंड, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय परिसर और अन्य पार्कों को शामिल किया गया है। अध्ययन के अनुसार शहरी क्षेत्रों में शोर का स्तर 79 से 83 डेसिबल तक था, जबकि पार्क और वेटलैंड्स में यह 38 से 44 डेसिबल तक रहा।
अध्ययन में गौरैया, मैना, कबूतर, बुलबुल और कौए जैसी सामान्य पक्षियों का 4 से 8 सप्ताह तक सुबह छह से नौ बजे और शाम चार से सात बजे तक अवलोकन किया गया। अध्ययन के दौरान फोकल एनिमल सैंपलिंग विधि से पक्षियों के व्यवहार को रिकॉर्ड किया गया है।
गौरेया व बुलबुल सबसे ज्यादा प्रभावित
अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष पक्षियों में भोजन संबंधी व्यवहार में देखा गया है। उच्च शोर वाले इलाकों में पक्षी प्रति मिनट औसतन केवल 2.1 बार भोजन तलाशने का प्रयास करते हैं, जबकि शांत व प्राकृतिक स्थलों में यह संख्या प्रति मिनट 4.9 तक पहुंचती है। साथ ही भोजन में लगाया गया समय भी आधे से कम हो गया है।शोर वाली जगह पर 3.2 मिनट भोजन पर लगाते हैं, जबकि शांत वाली जगह में वह तसल्लीपूर्ण भोजन करते हैं। बिना शोर वाली जगह में वह भोजन में 7.1 मिनट का समय लगाते हैं। वहीं पक्षियों की सतर्कता बढ़कर 5.5 बार हो गई, जबकि शांत क्षेत्रों में यह केवल 2 बार थी। इसका मतलब है कि पक्षी भोजन की बजाय आसपास के खतरे और व्यवधानों पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। शोर का पक्षियों के संचार पर भी नकारात्मक असर देखा गया।
शोर वाले इलाकों में पक्षी ज्यादा बोलते हैं। प्रति मिनट 6.8 आवाजें। मगर गौर करने वाली बात यह है कि उनका संदेश कम पहुंचता है। इसे ध्वनिक मॉस्किंग कहा जाता है। संवाद सफलता दर यानी जब दूसरा पक्षी सुनकर प्रतिक्रिया दे। शोर वाली जगह पर यह दर 42 फीसदी रही, जबकि शांत जगहों पर 78 फीसदी तक पहुंचती है। प्रजातियों के अनुसार गौरैया और बुलबुल सबसे अधिक प्रभावित पाई गईं, जबकि कौआ और कबूतर ने अपेक्षाकृत बेहतर अनुकूलन क्षमता दिखाई।