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सात द्वीप, नौ खंड और शब्द की सत्ता : गुरु की महिमा अनंत : महाराज कंवर साहेब
Sun, 03 Aug 2025 11:17 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Sun, 03 Aug 2025 11:17 PM IST
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गांव दिनोद में स्थित राधास्वामी आश्रम सत्संग में लोगों को प्रवचन देते संत कंवर महाराज।
भिवानी। यह सृष्टि सात द्वीपों और नौ खंडों में विभाजित है, जिसका संचालन त्रिशक्ति करती हैं लेकिन इन त्रिशक्तियों के आराध्य भी ‘शब्द’ हैं और उस शब्द का रहस्य केवल सतगुरु जानते हैं। यह दिव्य सत्संग वाणी राधास्वामी सत्संग, दिनोद (भिवानी) में संत कंवर साहेब महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए फरमाई। उन्होंने गुरु की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि इस जगत में जितने भी संत हुए हैं, सभी ने गुरु की महत्ता को सबसे ऊपर माना है।
कंवर साहेब ने कहा कि जो सतगुरु से प्रीत करता है वही सच्चे अर्थों में जीवन की राह पर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि परमात्मा की पवित्रता को पाने के लिए स्वयं को भी पवित्र बनाना पड़ेगा। परमात्मा सबकी सुनता है और उसके दरबार में कोई भेदभाव नहीं है। उन्होंने फरमाया कि इस संपूर्ण सृष्टि का रचयिता, पालनहार और संहारकर्ता जिन शक्तियों को माना गया है, वे भी किसी और की आराधना करते हैं – और वह है ‘शब्द’। शब्द ही कण-कण का रचयिता है, और इस शब्द का असली भेद केवल सतगुरु ही जान सकता है। इसीलिए संतों ने ऊंचे स्वर में कहा है सात द्वीप नौ खंड में, गुरु से बड़ा न कोय।
महाराज ने कहा कि अगर ऐसा सतगुरु किसी को मिल जाए और फिर भी व्यक्ति में बदलाव न आए तो समझना चाहिए कि दोष व्यक्ति के अंदर ही है। जैसे खोटा लोहा पारस से भी सोना नहीं बन सकता, वैसे ही विषय-विकारों में लिप्त इंसान भी गुरु की कृपा को ग्रहण नहीं कर पाता। उन्होंने कहा कि दुनियादारी में लिपटा मन केवल सांसारिक बातों में रमा रहता है और हमने भी स्वयं को उसी ढंग से ढाल लिया है। जब तक मन को दुनियावी बातों से खाली नहीं करेंगे, तब तक गुरु के वचनों के लिए उसमें स्थान नहीं बनेगा।
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महाराज ने यह भी कहा कि जिस भाव से कोई व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर पहला कदम रखता है यदि वह वही भावना अंत तक बनाए रखे, तो न सिर्फ स्वयं का उद्धार होता है, बल्कि वह लाखों-करोड़ों का मार्गदर्शन भी कर सकता है। उन्होंने कहा कि दुखद यह है कि हम तन-मन को नुकसान पहुंचाने वाली चीजों की ओर आकर्षित हो जाते हैं, लेकिन आत्मा को मजबूत करने वाली भक्ति से दूर भागते हैं।
उन्होंने बताया कि भक्ति की शुरुआत अपनी शक्ति से ही होती है पहले खुद को सुधारें, समाज अपने आप सुधर जाएगा। परमात्मा ही निखालिश सत्य है और संत उसके दूत हैं, जो उसका संदेश लेकर आते हैं। जो इस संदेश से मुंह मोड़ते हैं, उनके लिए संत भी पीड़ा महसूस करते हैं।
अंत में कंवर साहेब ने कहा कि सच्चा शिष्य वही है जो तन, मन और धन सबकुछ गुरु को अर्पित कर दे। अच्छाई की शुरुआत घर से होती है। घर में प्रेम, सौहार्द, सेवा और सम्मान का वातावरण होना चाहिए। विशेष रूप से माता-पिता को भगवान मानकर सेवा करनी चाहिए। यही सच्ची भक्ति और सही जीवन का मार्ग है।
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कंवर साहेब ने कहा कि जो सतगुरु से प्रीत करता है वही सच्चे अर्थों में जीवन की राह पर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि परमात्मा की पवित्रता को पाने के लिए स्वयं को भी पवित्र बनाना पड़ेगा। परमात्मा सबकी सुनता है और उसके दरबार में कोई भेदभाव नहीं है। उन्होंने फरमाया कि इस संपूर्ण सृष्टि का रचयिता, पालनहार और संहारकर्ता जिन शक्तियों को माना गया है, वे भी किसी और की आराधना करते हैं – और वह है ‘शब्द’। शब्द ही कण-कण का रचयिता है, और इस शब्द का असली भेद केवल सतगुरु ही जान सकता है। इसीलिए संतों ने ऊंचे स्वर में कहा है सात द्वीप नौ खंड में, गुरु से बड़ा न कोय।
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महाराज ने कहा कि अगर ऐसा सतगुरु किसी को मिल जाए और फिर भी व्यक्ति में बदलाव न आए तो समझना चाहिए कि दोष व्यक्ति के अंदर ही है। जैसे खोटा लोहा पारस से भी सोना नहीं बन सकता, वैसे ही विषय-विकारों में लिप्त इंसान भी गुरु की कृपा को ग्रहण नहीं कर पाता। उन्होंने कहा कि दुनियादारी में लिपटा मन केवल सांसारिक बातों में रमा रहता है और हमने भी स्वयं को उसी ढंग से ढाल लिया है। जब तक मन को दुनियावी बातों से खाली नहीं करेंगे, तब तक गुरु के वचनों के लिए उसमें स्थान नहीं बनेगा।
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महाराज ने यह भी कहा कि जिस भाव से कोई व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर पहला कदम रखता है यदि वह वही भावना अंत तक बनाए रखे, तो न सिर्फ स्वयं का उद्धार होता है, बल्कि वह लाखों-करोड़ों का मार्गदर्शन भी कर सकता है। उन्होंने कहा कि दुखद यह है कि हम तन-मन को नुकसान पहुंचाने वाली चीजों की ओर आकर्षित हो जाते हैं, लेकिन आत्मा को मजबूत करने वाली भक्ति से दूर भागते हैं।
उन्होंने बताया कि भक्ति की शुरुआत अपनी शक्ति से ही होती है पहले खुद को सुधारें, समाज अपने आप सुधर जाएगा। परमात्मा ही निखालिश सत्य है और संत उसके दूत हैं, जो उसका संदेश लेकर आते हैं। जो इस संदेश से मुंह मोड़ते हैं, उनके लिए संत भी पीड़ा महसूस करते हैं।
अंत में कंवर साहेब ने कहा कि सच्चा शिष्य वही है जो तन, मन और धन सबकुछ गुरु को अर्पित कर दे। अच्छाई की शुरुआत घर से होती है। घर में प्रेम, सौहार्द, सेवा और सम्मान का वातावरण होना चाहिए। विशेष रूप से माता-पिता को भगवान मानकर सेवा करनी चाहिए। यही सच्ची भक्ति और सही जीवन का मार्ग है।