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Bhiwani News: महिलाओं को आज भी हरियाली तीज पर झूला झूलना है याद
Wed, 07 Aug 2024 02:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Wed, 07 Aug 2024 02:19 AM IST
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भिवानी। देशभर में 7 जुलाई को हरियाली तीज का त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। महिलाओं को आज भी हरियाली तीज पर झूला झूलना याद आता है।
तीज का व्रत शादीशुदा महिलाओं के लिए खास महत्व रखता है। एक ऐसा समय भी था जब झूलों के बिना हरियाली तीज को अधूरा माना जाता था। आधुनिकता ने तीज के महत्व को कम कर दिया है। अब तीज एक त्योहार एक परंपरा नहीं बल्कि औपचारिकता बनकर रह गई है। केवल फिल्मों और नाटकों में ही महिलाएं झूला झूलती हुईं नजर आती हैं। तीज पर खाने के लिए जो पकवान चूल्हे पर बनाए जाते थे, उनकी जगह अब पीजा-बर्गर ने ले ली है।
पहले और अब के तीज में कितना फर्क
समय के साथ हमारे त्योहारों में भी बदलाव आया है। तीज हरियाणा का प्रमुख त्योहार था। पंडित लख्मीचंद ने तीज के उल्लास और आनंद से प्रेरित होकर रागनी लिखी थी, कि छोरी गावें गीत सुरीले घली झूल सावन की। 10 दिन पहले से ही तीज की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। कुंवारी लड़कियों के लिए सिंधारा और शादीशुदा महिलाओं की कोथली देने का प्रचलन था, परंतु नई पीढ़ी में अब वो आनंद और उत्साह देखने को नहीं मिलता। पहले घरों में मीठा तीज पर ही बनता था, लेकिन अब 12 महीने मिठाइयां भी उपलब्ध रहती हैं और बीमारियां बढ़ने के चलते लोग मीठे से उदासीन भी रहते हैं।
पहले बिना झूले के नहीं मनाते थे हरियाली तीज
पहले के समय में नई ब्याही महिलाएं सावन के शुरुआत होते ही अपने मायके आ जाती थीं। यहां पर वो अपनी सहेलियों के संग मिलकर सावन और तीज का त्योहार मनाती थीं। इसकी तैयारी एक महीने पहले ही शुरू हो जाती थी। नीम, बरगद या पीपल के पेड़ में झूला बांध कर उसे फूलों से सजा कर तैयार करती थीं।
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घरों के चूल्हे पर नहीं बनते परंपरागत पकवान
हरियाली तीज के कुछ दिन पहले ही महिलाएं एक दूसरे के घरों में एकजुट हो कर परंपरागत पकवान बनाने लग जाती थीं। बेसन पापड़ी, पकौड़े, मीठे पूड़े, माल पूड़े, खीर, गुलगुले और सुहालियां पकवान खासतौर पर महिलाएं तीज के दिन खाने के लिए बनाती थीं। अब इन पकवानों को घर बनाने के बजाय बाजार से ही खरीदकर लाया जाता है।
मुझे वो दिन बहुत याद आता है, जब हम बड़ी बेसब्री से तीज का इंतजार किया करते थे। गांव में एक खुले जगह पर नीम या पीपल के पेड़ में झूला बना कर झूलते थे। हरियाली तीज पर झूला झूलना और सहेलियों संग मजाक मस्ती करना आज भी याद आता है। - इंदू, बुजुर्ग महिला
पींग अब पेड़ों की जगह घरों में ही लगने लगी हैं। गीत-मल्हारों की जगह फिल्मी नगमे आ गए। गुलगुले और सुहालियों की जगह पिज्जा और बर्गर ने ले ली है। पहले और अब की हरियाली तीज में बहुत अंतर आ गया है। - डॉ. हरिकेश पंघाल, प्रवक्ता मनोविज्ञान, वैश्य महाविद्यालय
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तीज का व्रत शादीशुदा महिलाओं के लिए खास महत्व रखता है। एक ऐसा समय भी था जब झूलों के बिना हरियाली तीज को अधूरा माना जाता था। आधुनिकता ने तीज के महत्व को कम कर दिया है। अब तीज एक त्योहार एक परंपरा नहीं बल्कि औपचारिकता बनकर रह गई है। केवल फिल्मों और नाटकों में ही महिलाएं झूला झूलती हुईं नजर आती हैं। तीज पर खाने के लिए जो पकवान चूल्हे पर बनाए जाते थे, उनकी जगह अब पीजा-बर्गर ने ले ली है।
पहले और अब के तीज में कितना फर्क
समय के साथ हमारे त्योहारों में भी बदलाव आया है। तीज हरियाणा का प्रमुख त्योहार था। पंडित लख्मीचंद ने तीज के उल्लास और आनंद से प्रेरित होकर रागनी लिखी थी, कि छोरी गावें गीत सुरीले घली झूल सावन की। 10 दिन पहले से ही तीज की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। कुंवारी लड़कियों के लिए सिंधारा और शादीशुदा महिलाओं की कोथली देने का प्रचलन था, परंतु नई पीढ़ी में अब वो आनंद और उत्साह देखने को नहीं मिलता। पहले घरों में मीठा तीज पर ही बनता था, लेकिन अब 12 महीने मिठाइयां भी उपलब्ध रहती हैं और बीमारियां बढ़ने के चलते लोग मीठे से उदासीन भी रहते हैं।
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पहले बिना झूले के नहीं मनाते थे हरियाली तीज
पहले के समय में नई ब्याही महिलाएं सावन के शुरुआत होते ही अपने मायके आ जाती थीं। यहां पर वो अपनी सहेलियों के संग मिलकर सावन और तीज का त्योहार मनाती थीं। इसकी तैयारी एक महीने पहले ही शुरू हो जाती थी। नीम, बरगद या पीपल के पेड़ में झूला बांध कर उसे फूलों से सजा कर तैयार करती थीं।
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घरों के चूल्हे पर नहीं बनते परंपरागत पकवान
हरियाली तीज के कुछ दिन पहले ही महिलाएं एक दूसरे के घरों में एकजुट हो कर परंपरागत पकवान बनाने लग जाती थीं। बेसन पापड़ी, पकौड़े, मीठे पूड़े, माल पूड़े, खीर, गुलगुले और सुहालियां पकवान खासतौर पर महिलाएं तीज के दिन खाने के लिए बनाती थीं। अब इन पकवानों को घर बनाने के बजाय बाजार से ही खरीदकर लाया जाता है।
मुझे वो दिन बहुत याद आता है, जब हम बड़ी बेसब्री से तीज का इंतजार किया करते थे। गांव में एक खुले जगह पर नीम या पीपल के पेड़ में झूला बना कर झूलते थे। हरियाली तीज पर झूला झूलना और सहेलियों संग मजाक मस्ती करना आज भी याद आता है। - इंदू, बुजुर्ग महिला
पींग अब पेड़ों की जगह घरों में ही लगने लगी हैं। गीत-मल्हारों की जगह फिल्मी नगमे आ गए। गुलगुले और सुहालियों की जगह पिज्जा और बर्गर ने ले ली है। पहले और अब की हरियाली तीज में बहुत अंतर आ गया है। - डॉ. हरिकेश पंघाल, प्रवक्ता मनोविज्ञान, वैश्य महाविद्यालय