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Bhiwani News: महात्मा गांधी समेत कई महापुरुषों ने हिंदी को बताया था हृदय की भाषा
Sat, 14 Sep 2024 04:44 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Sat, 14 Sep 2024 04:44 AM IST
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भिवानी की डॉ. सुधा चौहान।
भिवानी। स्वतंत्रता के बाद नए भारत के निर्माण में हिंदी भाषा की भूमिका को सर्वाधिक महत्व दिया गया। महात्मा गांधी ने इसे हृदय की भाषा कहा तो सुभाष बोस ने राष्ट्रभाषा पद की अधिकारी एवं प्रांतीय सौहार्द की भाषा के रूप में इसे सराहा। लाल बहादुर शास्त्री ने हिंदी पढ़ना और पढ़ना-पढ़ाना हम सबका कर्तव्य बताया। संविधान समिति ने वर्ष 1949 में हिंदी को राज्य भाषा का दर्जा दिया तो वर्ष 1954 से हिंदी भाषा दिवस मनाने का सिलसिला शुरू हुआ।
भारत में आज के परिदृश्य में हिंदी राष्ट्रीय स्तर पर संवेदन एवं संप्रेषण की भाषा है। राष्ट्र को वैचारिक एवं भावात्मक स्तर पर जोड़ने वाली कड़ी है लेकिन स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी हिंदी हमारी उच्च शिक्षा, अनुसंधान, शासन, प्रशासन की भाषा नहीं बन पाई है। हालांकि महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों में युवाओं में अंग्रेजी के प्रति अधिक रुझान नजर आता है, क्योंकि अंग्रेजी उन्हें आजीविका के लिए अधिक महत्वपूर्ण लगती है।
हिंदी को हृदय की भाषा होने के साथ व्यवसाय की भाषा भी बनाना होगा। तभी युवा-वर्ग में इसका बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार हो पाएगा। इस दिशा में आज प्रयास शुरू हो चुके हैं। प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह भाषा अपना वर्चस्व बना रही है। अनुवादक, इंटरप्रेटर, संवाददाता, पत्रकार इत्यादि नए व्यवसाय युवाओं की खास पसंद बन रहे हैं। भारतीय विद्यार्थियों को एक सुरक्षित भविष्य के लिए दोनों भाषाओं हिंदी एवं अंग्रेजी में स्वयं को पारंगत करना चाहिए।
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भारतीयों के लिए द्विभाषी होना दोहरा वरदान होगा। हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों में निपुण होना राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता का कौशल दे सकता है। हिंदी भाषा में लिखे साहित्य का वर्तमान परिदृश्य समृद्ध है। स्थापित रचनाकारों के साथ-साथ नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली लेखक समक्ष आ रहे हैं।
राजनीतिक कारणों से कई बार हिंदी भाषा का विरोध भी होता है लेकिन सत्य यही है कि अंग्रेजी के साथ यदि कोई भी भारतीय भाषा राष्ट्रीय स्तर पर लेखन, संप्रेषण और संवाद का माध्यम है तो वह है हिंदी। अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर हिंदी को उसका गौरवमय स्थान देने की जरूरत है। वैश्विक परिदृश्य में भारतीयों और भारतीयता की पहचान हिंदी ही है एवं रहेगी। - डॉ. रश्मि बजाज, कवयित्री और प्राध्यापिका।
जिस प्रकार एक मां पूरे परिवार को एकता के सूत्र में बांध कर रखती है, उसी तरह हमारी हिंदी भाषा मां के समान है। जो पूरे राष्ट्र को अपने में समाए हुए है। हिंदी एक ऐसी कड़ी है, जिसके टूटने पर सारा राष्ट्र बिखर सकता है। हिंदी शारदा है, शक्ति है, मां है और पूरा राष्ट्र एक परिवार है। - डॉ. सुधा चौहान, लेखिका।
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भारत में आज के परिदृश्य में हिंदी राष्ट्रीय स्तर पर संवेदन एवं संप्रेषण की भाषा है। राष्ट्र को वैचारिक एवं भावात्मक स्तर पर जोड़ने वाली कड़ी है लेकिन स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी हिंदी हमारी उच्च शिक्षा, अनुसंधान, शासन, प्रशासन की भाषा नहीं बन पाई है। हालांकि महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों में युवाओं में अंग्रेजी के प्रति अधिक रुझान नजर आता है, क्योंकि अंग्रेजी उन्हें आजीविका के लिए अधिक महत्वपूर्ण लगती है।
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हिंदी को हृदय की भाषा होने के साथ व्यवसाय की भाषा भी बनाना होगा। तभी युवा-वर्ग में इसका बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार हो पाएगा। इस दिशा में आज प्रयास शुरू हो चुके हैं। प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह भाषा अपना वर्चस्व बना रही है। अनुवादक, इंटरप्रेटर, संवाददाता, पत्रकार इत्यादि नए व्यवसाय युवाओं की खास पसंद बन रहे हैं। भारतीय विद्यार्थियों को एक सुरक्षित भविष्य के लिए दोनों भाषाओं हिंदी एवं अंग्रेजी में स्वयं को पारंगत करना चाहिए।
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भारतीयों के लिए द्विभाषी होना दोहरा वरदान होगा। हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों में निपुण होना राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता का कौशल दे सकता है। हिंदी भाषा में लिखे साहित्य का वर्तमान परिदृश्य समृद्ध है। स्थापित रचनाकारों के साथ-साथ नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली लेखक समक्ष आ रहे हैं।
राजनीतिक कारणों से कई बार हिंदी भाषा का विरोध भी होता है लेकिन सत्य यही है कि अंग्रेजी के साथ यदि कोई भी भारतीय भाषा राष्ट्रीय स्तर पर लेखन, संप्रेषण और संवाद का माध्यम है तो वह है हिंदी। अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर हिंदी को उसका गौरवमय स्थान देने की जरूरत है। वैश्विक परिदृश्य में भारतीयों और भारतीयता की पहचान हिंदी ही है एवं रहेगी। - डॉ. रश्मि बजाज, कवयित्री और प्राध्यापिका।
जिस प्रकार एक मां पूरे परिवार को एकता के सूत्र में बांध कर रखती है, उसी तरह हमारी हिंदी भाषा मां के समान है। जो पूरे राष्ट्र को अपने में समाए हुए है। हिंदी एक ऐसी कड़ी है, जिसके टूटने पर सारा राष्ट्र बिखर सकता है। हिंदी शारदा है, शक्ति है, मां है और पूरा राष्ट्र एक परिवार है। - डॉ. सुधा चौहान, लेखिका।